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मतान्तरण का महाजाल : बरेली से 13 राज्यों तक फैला हनीट्रैप गिरोह

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बरेली, उत्तर प्रदेश 

रात के सन्नाटे में अचानक गुम हो जाते चेहरे और फिर महीनों बाद पता चलता कि वे किसी और नाम, किसी और पहचान के साथ जीवन जी रहे हैं। यह कोई रहस्यमयी उपन्यास नहीं अपितु भारत की धरती पर रचा गया सुनियोजित अपराध है। बरेली से उजागर हुए इस राज ने बता दिया कि कैसे संगठित गिरोह सोशल मीडिया, दोस्ती और लालच का जाल बुनकर युवाओं को फँसाता, फिर उन्हें जबरन मजहब बदलवाकर एक ऐसे अंधेरे में धकेल देता, जहां से वापसी नामुमकिन थी। यह गिरोह हनीट्रैप की आधुनिक तकनीक अपनाता था। सोशल मीडिया पर नकली प्रोफाइल बनाकर हिन्दू युवकों को फँसाया जाता। खासकर उन युवकों को जो लाचार होते। पहले दोस्ती, फिर रोमांस, फिर आर्थिक मदद और आखिर में मत बदलने का दबाव। जो झुक जाते, वे नेटवर्क का हिस्सा बना दिए जाते। जो विरोध करते, उन्हें ब्लैकमेल किया जाता अश्लील चैट, फोटो या वीडियो के सहारे। दरअसल, यूपी की बरेली पुलिस ने 26 अगस्त को छांगुर जैसा मतान्तरण सिंडिकेट का खुलासा किया। इस मामले में मदरसा संचालक समेत कुल 4 आरोपियों को अरेस्ट किया गया है। ये गैंग ऐसे लोगों को टारगेट करता था, जो आर्थिक या पारिवारिक रूप से कमजोर हों। पहले इनका ब्रेनवॉश किया जाता था। फिर मुस्लिम लड़कियों से शादी कराई जाती थी। आखिर में खतना करके पूरी तरह से मतांतरण करा दिया जाता था। ये सिंडिकेट देशभर में घूमकर मदरसे के नाम पर चंदा इकट्ठा करता था। कुल 21 बैंक खाते ट्रेस किए गए। भारत से प्रतिबंधित व्यक्ति जाकिर नाइक, पाकिस्तानी इंजीनियर समेत कई लोगों के इस्लामिक लिटरेचर-तकरीरें भी इनके पास से मिले हैं। पुलिस का दावा है कि ये लिटरेचर काफी भड़काऊ है। हाल ही में पुलिस की कार्रवाई से खुला यह रहस्य बताता है कि किस तरह भारत के युवकों को योजनाबद्ध तरीके से जाल में फंसाकर, उनकी कमजोरी का फायदा उठाकर, मतान्तरण के लिए मजबूर किया जा रहा था। यह कोई छोटा गिरोह नहीं अपितु एक संगठित सिंडिकेट है, जो दशकों से काम कर रहा है और जिसकी जड़ें खाड़ी देशों और बांग्लादेश तक फैली हैं। इस सिंडिकेट का सबसे खतरनाक हथियार था सोशल मीडिया और नकली पहचान। फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप पर फर्जी महिला की प्रोफाइल बनाकर युवकों से दोस्ती की जाती। भावनाओं का खेल खेला जाता, भरोसे का जाल बुना जाता और फिर मुलाकातें तय कर गुप्त रूप से उनकी तस्वीरें और वीडियो बनाए जाते। यही तस्वीरें बाद में ब्लैकमेलिंग का औजार बन जातीं। एक बार जाल में फँसने के बाद युवक के पास दो ही विकल्प रहते या तो अपमान और परिवार के सामने बदनामी झेलो, या फिर 'उनकी शर्तें' मान लो। और यही शर्तें थीं मत बदलना, नए नाम से पहचान बनाना और संगठन के लिए और हिन्दू युवकों को फँसाना।

सिंडिकेट की संरचना

पुलिस की जांच में सामने आया कि यह कोई बिखरा हुआ अपराध नहीं था अपितु एक पिरामिड संरचना वाला नेटवर्क था।

- टॉप लेवल (विदेशी फंडिंग) – संभवत: दुबई, कुवैत और बांग्लादेश से हवाला के जरिए मोटी रकम आती थी।

- मिड लेवल (संगठन संचालक) – बरेली और आस-पास के शहरों में बैठे मास्टरमाइंड इस रकम को बांटते, टारगेट तय करते और एजेंटों को काम सौंपते।

- लो लेवल (एजेंट) – यही वो लोग थे जो सीधे-साधे युवकों को जाल में फंसाने का काम करते। इनमें कई नकली पहचान बनाने वाले आईटी जानकार भी शामिल थे।

फंडिंग और विदेशी हाथ

पकड़े गए दस्तावेजों और डिजिटल साक्ष्यों से खुलासा हुआ है कि पिछले पाँच वर्षों में इस नेटवर्क को खाड़ी देशों से करोड़ों रुपये मिले। संभवत: बांग्लादेश के मदरसों और एनजीओ के जरिए यह पैसा भारत तक पहुँचाया जाता था। यही पैसा नकली आधार कार्ड, पासपोर्ट, ठिकानों की व्यवस्था और यहां तक कि मतान्तरण के बाद शादी व विदेश भेजने तक पर खर्च किया जाता।

कैसे हुआ खुलासा?

अलीगढ़ जिले में क्वार्सी थाना क्षेत्र के इंद्रपुरी में रहने वाले प्रभात उपाध्याय राजकीय इंटर कॉलेज जहांगीराबाद (बुलंदशहर) में टीचर हैं। इनकी मां अखिलेश कुमारी ने बताया मेरा बेटा जन्म से ही दृष्टिहीन है। उसने नर्सरी से एमफिल तक की पढ़ाई अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से की। 2014 में बीएड और फिर हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी से पीएचडी की। 2019 में सरकारी टीचर की नौकरी लग गई। पहले बरेली, फिर बुलंदशहर ट्रांसफर हुआ। इस बीच प्रभात की शादी अलीगढ़ की रहने वाली अंजली शर्मा से हुई। बाद में दोनों का तलाक हो गया। उन्होंने बताया मैंने कई बार अपने बेटे को मुस्लिम लोगों से बात करते हुए फोन पर सुना। मुझे ऐसा लगता था जैसे मेरा बेटा किसी गैंग में फंस गया है, जो उसे मुस्लिम बनाने पर तुले हैं। 3 अगस्त, 2025 को मेरा बेटा फोन पर अब्दुल मजीद से इसी तरह की बात कर रहा था। 15 अगस्त को छुट्टी पर बेटा घर नहीं आया। मोबाइल कॉल भी नहीं लगी। जब हमने उसकी तलाश शुरू की, तो वो बरेली के मदरसे में मिला। वहां हमें जानकारी हुई कि प्रभात को मतांतरण करके हामिद बना दिया गया है। अखिलेश कुमारी ने 25 अगस्त, 2025 को बरेली के भुता पुलिस स्टेशन में अब्दुल मजीद, महमूद बेग, सलमान और आरिफ पर प्राथमिकी दर्ज कराई। एसपी (साउथ) अंशिका वर्मा के नेतृत्व में पुलिस टीम ने लंबी जांच-पड़ताल की और 26 अगस्त को पुलिस ने ये केस खोल दिया। इसमें कुल 4 आरोपी पकड़े गए। पुलिस ने प्रभात को भी रिकवर किया और परिजनों के हवाले कर दिया। प्रभात उपाध्याय का मतांतरण हो चुका था। अब उसकी किसी मुस्लिम लड़की से निकाह कराने की तैयारी थी। सबसे आखिर में खतना होना था। पुलिस के अनुसार, यह गिरोह 13 राज्यों और 30 जिलों में फैला हुआ था। गिरफ्तार किए गए लोगों के 21 बैंक खाते मिले हैं, जिनमें बड़े पैमाने पर पैसों का लेन-देन हुआ है। माना जा रहा है कि यह गिरोह 2014 से सक्रिय था और इसने कई लोगों का मतांतरण कराया है। पुलिस ने मदरसे से मतांतरण से जुड़ी सामग्री और प्रमाण पत्र भी बरामद किए हैं। गिरफ्तार किए गए व्यक्तियों की पहचान फैजनगर स्थित मदरसे के मौलवी अब्दुल मजीद (35), सलमान (30), मोहम्मद आरिफ और फहीम के रूप में हुई है। पेशे से दर्जी सलमान मदद की पेशकश करने या मुस्लिम लड़कियों से परिचय कराने के बहाने हिंदू परिवारों से मिलता था। वहीं, पेशे से नाई फहीम इस काम में सलमान की मदद करता था। 

परेशान-लाचार परिवार रहते थे टारगेट पर

एसपी अंशिका वर्मा ने बताया पुलिस अब तक ऐसी 3 परिवार तक पहुंची है, जो मतांतरण सिंडिकेट के निशाने पर थे। इन सभी में एक बात कॉमन थी। वो ये कि तीनों परिवार लाचार या परेशान हालात में थे। सिंडिकेट ने इसी का फायदा उठाकर उन्हें अपने साथ जोड़ा। पहला पीड़ित सरकारी टीचर प्रभात उपाध्याय दृष्टिहीन था। पहली शादी टूट चुकी थी। सिंडिकेट ने उसको दूसरी शादी का सपना दिखाकर अपने साथ जोड़ा। उसे प्रभात से हामिद बना दिया। दूसरे पीड़ित ब्रजपाल के पिता की एक्सीडेंट में डेथ हो चुकी थी। ब्रजपाल खुद एक एक्सीडेंट के बाद असहाय हो गया था। एक बहन का तलाक हो चुका था। ब्रजपाल नीट क्लियर नहीं कर पाया था। ये सब परेशानियां उसको इस सिंडिकेट के टच में लाईं। ब्रजपाल मतान्तरण करके अब्दुल्ला बन गया। तीसरा पीड़ित एक नाबालिग लड़का है। पिता जीवित नहीं थे। कमाई के लिए ये लड़का सैलून पर नौकरी करता था। उसी सैलून पर काम करने वाले सिंडिकेट मेंबर ने आर्थिक तंगी देखकर इस लड़के को अपने जाल में फंसा लिया। पहले इस लड़के को ड्रग्स एडिक्ट बनाया गया। फिर खतना करने की तैयारी थी। उससे पहले ही पुलिस सिंडिकेट तक पहुंच गई।

कहां से आईं पाकिस्तानी किताबें?

ये गैंग शुरुआत में इस्लामिक लिटरेचर के जरिए लोगों का ब्रेनवॉश करता था। पुलिस को इनसे पाकिस्तानी इंजीनियर मोहम्मद अली मिर्जा की तकरीरें वाली सीडी मिली है। इसके अलावा जाकिर नाइक की 'मीडिया और इस्लाम जंग या अमन', 'हिंदू धर्म और मजहबें इस्लाम में यकसानियत' जैसे टाइटल की कई किताबें मिली हैं। पुलिस ने जब ये पूछा कि पाकिस्तानी किताबें कहां से आईं, इस पर सिंडिकेट के मेंबर कोई जवाब नहीं दे पाए।

कहाँ-कहाँ फैला जाल

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह नेटवर्क केवल बरेली या यूपी तक सीमित नहीं था। पुलिस रिपोर्ट के अनुसार इसके तार दिल्ली, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश, केरल और असम तक फैले हैं। लगभग 13 राज्यों में सक्रिय इस सिंडिकेट ने सैकड़ों हिन्दू युवकों को निशाना बनाया। कई मामलों में यह भी सामने आया कि एक बार मतान्तरण के बाद इन युवकों को आतंकी गतिविधियों और हवाला कारोबार तक में इस्तेमाल किया गया।

मतांतरण के बाद की योजनाएँ

मत बदलने के बाद इन युवकों को 'भाईचारे' के नाम पर संगठन से जोड़ा जाता और उनका इस्तेमाल दूसरे युवकों को फँसाने में किया जाता। जिनकी आर्थिक स्थिति कमजोर होती उन्हें पैसों और नौकरी का लालच दिया जाता और जिन्हें पढ़ाई में उज्जवल भविष्य की चाह होती उन्हें विदेश भेजने की तैयारी कराई जाती। यह सब दिखने में मदद जैसा लगता, लेकिन असल में इनका इस्तेमाल राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में प्यादों की तरह किया जाता।


पुलिस का खुलासा और खतरे की घंटी

बरेली में हालिया छापेमारी में दर्जनों मोबाइल, लैपटॉप, पासपोर्ट और हवाला से जुड़े दस्तावेज बरामद हुए। इनसे साबित हुआ कि सिंडिकेट वर्षों से सुनियोजित तरीके से काम कर रहा था। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि यह सिर्फ अपराध नहीं अपितु राष्ट्र और संस्कृति पर सीधा हमला है। अगर इस षड्यंत्र की परतें समय रहते न खुलतीं तो हजारों युवक अपनी पहचान, अपना मत और अपना भविष्य खो चुके होते। यह सिंडिकेट भारत के लिए सिर्फ एक 'कानूनी मामला' नहीं है अपितु सभ्यता पर हमला है। हिन्दू युवकों को जाल में फंसाना, उन्हें ब्लैकमेल करके मत बदलवाना और फिर उन्हें राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में इस्तेमाल करना यह स्पष्ट करता है कि यह महज अपराध नहीं। अब सवाल यह है कि समाज कितनी जल्दी जागता है और प्रशासन कितनी गहराई से इसे जड़ से उखाड़ने में सफल होता है।