भारत अंखड है और हिन्दू राष्ट्र है – डॉ. मोहन भागवत
तीन दिवसीय व्याख्यानमाला ‘100 वर्ष की संघ यात्रा - नए क्षितिज’ का अंतिम दिन
नई दिल्ली
संघ शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित तीन दिवसीय व्याख्यानमाला ‘100 वर्ष की संघ यात्रा – नए क्षितिज’ के अंतिम दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने जिज्ञासाओं का समाधान किया। उन्होंने कहा कि “भारत अखंड है, यह जीवन का तथ्य है। पूर्वज, संस्कृति और मातृभूमि हमें एक करते हैं। अखंड भारत केवल राजनीति नहीं, बल्कि जनमानस की एकता है। जब यह भावना जागेगी तो सब सुखी और शांतिपूर्ण रहेंगे।” संघ के बारे में यह धारणा गलत है कि वह किसी का विरोधी है। हमारे पूर्वज और संस्कृति समान हैं। पूजा-पद्धति अलग हो सकती है, लेकिन पहचान एक है। भिन्न संप्रदायों में आपसी विश्वास कायम करने की आवश्यकता सभी पक्षों में है। मुसलमानों को यह आशंका छोड़नी होगी कि साथ चलने से उनका इस्लाम मिट जाएगा।
सरसंघचालक जी ने
आजादी की लड़ाई और विभिन्न सामाजिक आंदोलनों में संघ की भूमिका रेखांकित की।
उन्होंने कहा कि सामाजिक आंदोलन में संघ कभी अलग से अपना झंडा नहीं उठाता। स्वयंसेवकों
को खुली छूट है कि वह अच्छे काम जहां हो रहे हैं, वहां सहयोग करें।
आरएसएस कार्य पद्धति पर सरसंघचालक ने स्पष्ट किया कि “संघ की कोई अधीनस्थ संस्था नहीं है, सभी संगठन स्वतंत्र, स्वायत्त और आत्मनिर्भर हैं।” संगठन और दल के बीच कभी-कभी मतभेद दिख सकते हैं, परंतु यह केवल सत्य की खोज की प्रक्रिया है। संघर्ष को प्रगति का साधन मानते हुए सभी अपने-अपने क्षेत्र में निःस्वार्थ भाव से कार्य करते हैं। “हमारे यहां मतभेद हो सकते हैं, मनभेद नहीं”, यही विश्वास सबको एक गंतव्य तक ले जाता है।
संघ के विरोध में
मत रखने वाले
अन्य राजनीतिक दलों
को सहयोग और विरोधी विचारों वालों के प्रति रवैया पर उदाहरण देते हुए बताया कि
जयप्रकाश नाराय़ण से लेकर प्रणब मुखर्जी तक ने संघ के बारे में अपनी राय बदली है।
उन्होंने कहा कि “अच्छे कार्यों के लिए सहायता मांगने वालों को संघ हमेशा सहयोग
देता है। यदि सामने से रुकावट आती है, तो उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए संघ पीछे
हट जाता है।”
उन्होंने कहा कि “हमें नौकरी मांगने वाला नहीं, नौकरी देने वाले बनना है। आजीविका यानी नौकरी यह भ्रम खत्म करना होगा।” इससे समाज का उपकार होगा और नौकरियों पर दबाव घटेगा। कोई भी व्यवस्था 30 प्रतिशत को ही नौकरी दे सकती है। काम को छोटा-बड़ा मानने के कारण समाज का पतन हुआ, श्रम की प्रतिष्ठा स्थापित होनी चाहिए। युवाओं में अपने परिवार को खड़ा करने का सामर्थ्य है, इसी से हम विश्व को भी कार्यबल दे सकते हैं।
जनसंख्या और
जनसांख्यिकी बदलाव
सरसंघचालक जी ने
जन्म दर में संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर बल दिया और कहा कि जनसंख्या पर्याप्त
होनी चाहिये और नियंत्रित भी होनी चाहिये, 2.1 का जन्मदर रखने से जनसंख्या स्थिर
रहती है, ऐसा विशेषज्ञ मानते हैं। उन्होंने कहा, “जनसंख्या नियंत्रित भी रहे और
पर्याप्त भी, इसके लिए नई पीढ़ी को तैयार करना होगा।”
जनसांख्यिकी बदलाव
के विषय पर उन्होंने मतांतरण और घुसपैठ का विरोध किया। उन्होंने कहा कि जनसंख्यिकी
परिवर्तन से कई बार गंभीर परिणाम निकलते हैं, यहां तक कि देश का विभाजन भी होता।
उन्होंने स्पष्ट किया कि “संख्या से ज्यादा इरादे की चिंता होनी है।” मतांतरण लालच
या जबरदस्ती से नहीं होना चाहिए। यदि ऐसा हो तो उसे रोका जाना आवश्यक है। वहीं
घुसपैठ पर चिंता जताई और कहा कि “अपने देश के लोगों को रोजगार देना चाहिए, अवैध
रूप से आने वालों को नहीं।
देश विभाजन और अखंड
भारत
सरसंघचालक जी ने
कहा कि संघ ने देश विभाजन का विरोध किया था। देश विभाजन के दुष्परिणाम आज हम अलग
हुए देशों में देख रहे हैं। भारत अखंड है, यह जीवन का तथ्य है। पूर्वज, संस्कृति
और मातृभूमि हमें एक बनाते हैं। अखंड भारत केवल राजनीति नहीं, बल्कि जनमानस की
एकता है। जब यह भावना जागेगी तो सब सुखी और शांतिपूर्ण रहेंगे।
डॉ. मोहन भागवत जी
ने हिन्दू-मुस्लिम एकता को समान पूर्वज और संस्कृति पर आधारित करते हुए कहा कि संघ
के बारे में एक गलत धारणा विकसित की गई है कि हम किसी के विरोधी हैं। इस धारणा का
पर्दा हटाकर संघ को देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “हम हिन्दू कहेंगे, आप उसे
भारतीय मानें – अर्थ एक ही है। हमारे पूर्वज और संस्कृति समान हैं।” पूजा-पद्धति
अलग हो सकती है, लेकिन हमारी पहचान एक है। उन्होंने कहा कि दोनों ओर से विश्वास
कायम होना चाहिए – हिन्दुओं में शक्ति जागरण करने की आवश्यकता है और मुसलमानों में
यह आशंका दूर करनी चाहिए कि साथ आने से उनका इस्लाम चला जाएगा। उन्होंने कहा कि हम
भले ही ईसाईयत या इस्लाम को मानने वाले हो सकते हैं, लेकिन हम यूरोपीय और अरबी
नहीं है और इन धर्मों के नेतृत्व वालों को यह बात अपने लोगों को सिखानी चाहिए।
उन्होंने कहा कि
देश में स्थानों के नाम आक्रांताओं पर नहीं होने चाहिए, इसका अर्थ यह नहीं कि
मुसलमानों के नाम पर नहीं होने चाहिए। बल्कि अब्दुल हमीद, अशफाकुल्ला खान और एपीजे
अब्दुल कलाम जैसे व्यक्तित्वों पर होने चाहिए, जो हमारे लिए प्रेरणादायी हैं।
संघ हिंसा वाला करने वाला संगठन होता तो 75 हजार स्थान पर नहीं पहुंच सकता था। संघ का स्वयंसेवक किसी हिंसा में लिप्त हो, ऐसा कोई उदाहरण नहीं है। इसके उलट संघ के सेवा कार्यों को देखना चाहिए, जो संघ के स्वयंसेवक बिना भेदभाव के करते हैं।
आरक्षण
आरक्षण पर कहा कि
“आरक्षण का विषय तर्क नहीं, संवेदना का है। अन्याय हुआ है तो उसका परिमार्जन होना
चाहिए।” उन्होंने स्पष्ट किया कि संविधान सम्मत आरक्षण का संघ ने पहले भी समर्थन
किया है और आगे भी करता रहेगा। जब तक लाभार्थियों को इसकी आवश्यकता लगेगी, संघ
उनके साथ खड़ा रहेगा। अपने लोगों के लिए छोड़ना ही धर्म है।”
उन्होंने कहा कि
“1972 में धर्माचार्यों ने स्पष्ट किया था कि छुआछूत और अस्पृश्यता का हिन्दू धर्म
में कोई स्थान नहीं है। यदि कहीं जातिगत भेदभाव का उल्लेख मिलता भी है तो उसका
अर्थ गलत समझा गया, मानना चाहिए।” उन्होंने कहा कि हिन्दुओं में एक ग्रंथ नहीं और
सब उसके अनुसार चलते रहे हैं, ऐसा भी नहीं है।
उन्होंने कहा कि
हमारे यहां आचरण के दो प्रमाण हैं – एक शास्त्र है और दूसरा लोक है। लोक जो चाहता
है, वह होता है। भारत का लोक जातिगत भेदभाव का विरोध करता है। संघ भी सभी समुदायों
के नेतृत्व करने वालों को साथ आने के लिए प्रेरित करता है और वे मिलकर अपने और
सम्पूर्ण समाज की चिंता करें।
उन्होंने कहा कि
धार्मिक और सामाजिक कार्यक्रम लोगों में गुणवत्ता और संस्कार बढ़ाने वाले होने
चाहिए और संघ इस दिशा में प्रयास करता है।
भाषा
सरसंघचालक जी ने
भाषा पर कहा कि “भारत की सभी भाषाएँ राष्ट्रीय हैं, लेकिन आपसी संवाद के लिए एक
व्यवहार भाषा चाहिए और वह विदेशी नहीं होनी चाहिए।” आदर्श और आचरण सभी भाषाओं में
समान हैं, इसलिए विवाद की आवश्यकता नहीं। “हमें अपनी मातृभाषा जाननी चाहिए, प्रदेश
की भाषा में बोल-चाल आना चाहिए और एक साझा व्यवहार की भाषा अपनानी चाहिए।” यही
भारतीय भाषाओं की समृद्धि और एकता का मार्ग है। इसके अलावा हम दुनिया की भाषा
सिखें, इसमें कोई मनाही नहीं है।
संघ की
परिवर्तनशीलता
सरसंघचालक ने कहा
कि संघ एक परिवर्तनशील संगठन है। हम केवल तीन बातों पर अडिग हैं। उन्होंने कहा,
“व्यक्ति निर्माण से समाज के आचरण में परिवर्तन संभव है और वह हमने करके दिखाया
है। समाज को संगठित करो, सब परिवर्तन अपने आप होते हैं। हिन्दुस्तान हिन्दू
राष्ट्र है। इन तीन बातों को छोड़कर संघ में सब बदल सकता है। बाकी सभी बातों में
लचीलापन है।”
शिक्षा में संस्कार
तकनीक और आधुनिकता का शिक्षा से विरोध नहीं है। शिक्षा केवल स्कूलिंग या इनफॉरमेशन तक सीमित नहीं है। शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य को संस्कारित कर वास्तविक मनुष्य बनाना है। हर जगह अपने मूल्यों और संस्कृति की शिक्षा दी जानी चाहिए। यह धार्मिक शिक्षा नहीं है। हमारे धर्म अलग हो सकते हैं, लेकिन समाज के स्तर पर हम सब एक हैं। अच्छे संस्कार और शिष्टाचार सार्वभौमिक मूल्य हैं। भारत की साहित्यिक परंपरा बहुत समृद्ध है। इसे अवश्य पढ़ाया जाना चाहिए, चाहे वह मिशनरी स्कूल हो या मदरसा।
मथुरा काशी
मथुरा और काशी के
प्रति हिन्दू समाज के आग्रह का सम्मान होना चाहिए। साथ ही स्पष्ट किया कि राम
मंदिर आंदोलन में संघ ने सक्रिय भागीदारी की थी, लेकिन अब किसी अन्य आंदोलन में
संगठन प्रत्यक्ष रूप से शामिल नहीं होगा। उन्होंने कहा, “राम मंदिर बनाने का आग्रह
हमारा था और संघ ने इस आंदोलन का समर्थन किया। अब बाकी आंदोलनों में संघ नहीं
जाएगा। लेकिन हिन्दू मानस में काशी-मथुरा और अयोध्या का महत्व है। दो जन्मभूमि हैं
और एक निवास स्थान है। यह स्वाभाविक है कि हिन्दू समाज इसका आग्रह करेगा।”
सरसंघचालक ने कहा
कि संघ में सेवानिवृत्ति की कोई अवधारणा नहीं है। “मैंने कभी नहीं कहा कि मैं किसी
आयु में रिटायर हो जाऊंगा या किसी को होना चाहिए। संघ में हम सब स्वयंसेवक हैं।
यदि मैं 80 वर्ष का हो जाऊं और मुझे शाखा चलाने का कार्य सौंपा जाए तो मुझे करना
ही होगा। हम वही काम करते हैं जो संघ हमें सौंपता है। सेवानिवृत्ति का प्रश्न यहां
लागू नहीं होता।”
संघ में केवल एक
व्यक्ति पर निर्भरता नहीं है। उन्होंने कहा, “यहां 10 लोग और हैं जो यह दायित्व
संभाल सकते हैं। हम जीवन में कभी भी सेवानिवृत्त होने को तैयार हैं और तब तक काम
करने को भी जब तक संघ चाहेगा।”
महिलाओं की भूमिका
समाज संगठन के
प्रयास में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी है। “1936 में राष्ट्र सेविका समिति का गठन
हुआ, जो महिला शाखाएं संचालित करती है। यह परंपरा आज तक चल रही है। संघ प्रेरित
अनेक संगठनों का नेतृत्व महिलाएं ही करती हैं। महिलाएं और पुरुष हमारे लिए पूरक
हैं।” संघ का कार्यक्षेत्र भारत तक मर्यादित है, विदेशों में स्वयंसेवक संघ की
कार्यपद्धति के आधार पर वहां के कानूनों के अनुसार काम करते हैं।
मंदिरों पर अधिकार
उन्होंने कहा कि
“सभी मंदिर सरकार के पास नहीं, कुछ निजी और ट्रस्ट के पास हैं। उनकी स्थिति अच्छी
रहनी चाहिए।” देश का मन तैयार है कि मंदिर भक्तों को सौंपे जाएं, लेकिन इसके लिए
व्यवस्था भी बननी चाहिए। “जब मंदिर मिलें तो पूजा-पद्धति, धन और भक्तों के हित में
व्यवस्थाएँ स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक तैयार हों। ताकि न्यायालय निर्णय दे
तो हम तैयार रहें।”
गृहस्थ स्वयंसेवकों
की भूमिका पर सरसंघचालक ने कहा, “संघ में गृहस्थ स्वयंसेवक शीर्ष पद तक पहुँच सकते
हैं। भैयाजी दाणी लंबे समय तक सरकार्यवाह रहे और गृहस्थ थे।” उन्होंने स्पष्ट किया
कि संघ में वर्तमान में 5 से 7 लाख स्वयंसेवक हैं और करीब साढ़े 3 हजार प्रचारक सक्रिय
हैं। शीर्ष स्तर पर पूर्ण समय संघ को देना होता है। “गृहस्थ हमारे पथ प्रदर्शक
हैं, हम तो उनके मजदूर हैं।”
संघ की सदस्यता की
कोई प्रक्रिया नहीं होती है। संघ के स्वयंसेवकों को ढूंढकर या संघ की वेबसाइट पर
जाकर संघ से जुड़ सकते हैं।
मतांतरण पर विदेशों
से धन
मतांतरण पर विदेशों
से आ रहे धन पर सरसंघचालक ने अंकुश लगाए जाने की बात कही। उन्होंने कहा, “सेवा के
लिए विदेशों से धन आए तो ठीक है, पर उसका उपयोग उसी उद्देश्य में होना चाहिए।
समस्या तब होती है, जब यह धन मतांतरण में लगाया जाता है। “इस पर अंकुश जरूरी है,
उसकी स्क्रूटनी और प्रबंधन सरकार की जिम्मेदारी है।”
सरसंघचालक ने कहा कि भारत हिन्दू राष्ट्र है और इसकी घोषणा करने की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा, “हिन्दू राष्ट्र ऋषि-मुनियों ने घोषित कर दिया है। वह किसी अधिकृत घोषणा का मोहताज नहीं है, वह सत्य है। मानने से आपका लाभ है, ना मानने से आपका नुकसान है।”