• अनुवाद करें: |
विशेष

मीडिया उपभोग और अभिव्यक्ति में नागरिक विवेक और उत्तरदायित्व

  • Share:

  • facebook
  • twitter
  • whatsapp

मीडिया उपभोग और अभिव्यक्ति में नागरिक विवेक व उत्तरदायित्व 

मानव प्रारंभ से ही अन्य जीवों से भिन्न रहा है। उसमें कुछ नया जानने और समझने की उत्कंठा अत्यंत आरंभिक काल से विद्यमान रही है। जानने की यह तीव्र इच्छा मानव की सबसे सशक्त प्रवृत्तियों में से एक है, जो उसे अन्य प्राणियों से अलग पहचान देती है। इसी विशेषता के कारण मानव न केवल अन्य जीवों और प्रकृति पर नियंत्रण स्थापित करने में सफल हुआ, बल्कि जहां पूर्ण नियंत्रण संभव नहीं हो सका, वहां उसने परिस्थितियों को अपने अनुकूल ढालने का प्रयास किया। ज्ञान की इस निरंतर खोज ने मानव को अपने अस्तित्व की रक्षा करते हुए विकास की लंबी यात्रा पर अग्रसर किया। आदिम मानव से लेकर आधुनिक सभ्यता तक का यह सफर उसी जिज्ञासा का परिणाम है। समय के साथ मानव ने न केवल स्वयं को बदला, बल्कि अपने चारों ओर ऐसी प्रणालियां विकसित कीं, जो उसकी सोच और निर्णय-प्रक्रिया में सहायक बन सकें। इसी क्रम में आज ऐसी मशीनें अस्तित्व में आ चुकी हैं, जो विश्लेषण करने, विकल्पों का मूल्यांकन करने और निर्णय तक पहुंचने में सक्षम हैं। इन प्रणालियों को मानव की कार्यशैली के अनुरूप तैयार किया जा रहा है, ताकि वे अनुभव से सीख सकें और जटिल परिस्थितियों में अधिक प्रभावी ढंग से कार्य कर सकें। यह समूची विकास-यात्रा मानव की उस मूल प्रवृत्ति को रेखांकित करती है, जिसने उसे केवल जीवित रहने तक सीमित नहीं रखा, बल्कि निरंतर आगे बढ़ने और नए क्षितिज तलाशने की प्रेरणा दी।

वर्तमान युग में फोन, लैपटॉप, मोबाइल और इंटरनेट जीवन के अनिवार्य अंग बन चुके हैं। इन उपकरणों के बिना आज के जीवन की कल्पना करना लगभग असंभव-सा प्रतीत होता है। सुबह आंख खुलते ही सूचनाओं की एक श्रृंखला सामने आ जाती है संदेश, अलर्ट और अपडेट लगातार ध्यान खींचते रहते हैं। यह सिलसिला दिन भर थमता नहीं। इस तेज रफ्तार सूचना प्रवाह का असर यह है कि पारंपरिक माध्यमों से मिलने वाली कई खबरें हमें सुबह ही पुरानी लगने लगती हैं। अनेक समाचारों को पढ़ने या देखने की उत्सुकता समाप्त हो जाती है। अखबारों की खबरें कई बार फीकी और दोहराव से भरी प्रतीत होती हैं। ऐसा महसूस होने लगता है मानो हम सूचनाओं की निरंतर बौछार के बीच खड़े हों। इस दौर में सूचनाओं की यह भरमार एक चुनौती बन चुकी है। हर ओर से आती जानकारियों के इस दबाव से स्वयं को अलग रखना या संतुलन बनाए रखना आसान नहीं रह गया है।

सोशल मीडिया पर हम प्रतिदिन अनेक प्रकार की जानकारियां साझा करते हैं। मोटे तौर पर इन जानकारियों को दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है। पहली श्रेणी में उपयोगकर्ता से जुड़ी सूचनाएं आती हैं, जबकि दूसरी श्रेणी में वे जानकारियां शामिल होती हैं जो हमारे पास पहुंचती हैं, हमारे उपकरणों से होकर गुजरती हैं, या जिन पर हम अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। सामान्य बोलचाल में इन सभी प्रकार की सूचनाओं को डेटा कहा जाता है। यदि इतिहास पर नजर डालें, तो एक समय था जब दुनिया की अधिकांश प्रतिस्पर्धा जीवाश्म ईंधनों को लेकर हुआ करती थी। पेट्रोल, डीजल और उनसे बनने वाले उत्पाद लंबे समय तक वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था के केंद्र में रहे। महंगाई, राष्ट्रों के बीच युद्ध, औद्योगिक और संरचनात्मक विकास, यहां तक कि कई देशों में सरकारों का बनना और गिरना इन सभी प्रक्रियाओं में तेल की भूमिका निर्णायक रही है। आज स्थिति बदल चुकी है। जिस स्थान पर कभी तेल हुआ करता था, वहां अब इंटरनेट और सूचनाएं आ खड़ी हुई हैं। वर्ष 2006 में क्लाइव हम्बी ने यह कहा था कि डेटा एक नए प्रकार का तेल है। यह कथन आज और अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है। वर्तमान समय में वैश्विक स्तर पर होने वाले अनेक परिवर्तन, टकराव और रणनीतियां इंटरनेट और सूचना के इर्द-गिर्द ही आकार ले रही हैं।

मीडिया उपभोग: सोशल मीडिया के व्यापक प्रचलन से पहले किसी समाचार को आम लोगों तक पहुंचाना एक कठिन और समय साध्य प्रक्रिया हुआ करती थी। उस दौर में जनसंचार मुख्यतः परंपरागत माध्यमों के जरिए होता था। इन माध्यमों पर कुछ सीमित लोगों का प्रभाव और नियंत्रण रहता था। अखबार, रेडियो और टेलीविजन में ऊँचे पदों पर बैठे लोग ही यह तय करते थे कि जनता तक कौन-सी जानकारी पहुंचे और किसे नजरअंदाज किया जाए। सामान्य रूप से यह धारणा बनती है कि हम अपनी सुविधा और रुचि के अनुसार मीडिया का उपयोग करते हैं, लेकिन यह पूरा सत्य नहीं है। वास्तविकता यह भी है कि मीडिया में प्रस्तुत सामग्री हमारी सोच, दृष्टिकोण और निर्णय लेने की प्रक्रिया को गहराई से प्रभावित करती है। इस प्रकार मीडिया केवल सूचना का माध्यम नहीं रहता, बल्कि वह समाज की समझ और प्राथमिकताओं को भी आकार देता है। सोशल मीडिया के आने से पहले किसी बड़ी खबर को दबाना या किसी छोटी घटना को प्रमुख समाचार बना देना अपेक्षाकृत आसान था। कंटेंट पर कुछ गिने-चुने लोगों का आधिकारिक नियंत्रण होता था, जो उत्पादक और नियामक की भूमिका में रहते थे, जबकि पूरा देश उपभोक्ता मात्र था। उस समय भ्रामक सूचनाएं और झूठी खबरें आज की तरह व्यापक रूप से प्रभावी नहीं थीं।

वर्तमान युग में मीडिया उपभोग: वर्तमान युग को सोशल मीडिया का युग कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी। भारत सरकार के आंकड़ों पर दृष्टि डालें तो लगभग 491 मिलियन लोग सोशल मीडिया से जुड़े हुए हैं। यह संख्या अपने आप में अत्यंत विशाल है, इतनी तो कई देशों की कुल जनसंख्या भी नहीं होती। यह तथ्य सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव और पहुंच को स्पष्ट रूप से रेखांकित करता है। जहां परंपरागत मीडिया में किसी भी सामग्री को प्रकाशित या प्रसारित करने का नियंत्रण कुछ सीमित हाथों में हुआ करता था और आम जनता केवल उपभोक्ता की भूमिका में रहती थी, वहीं सोशल मीडिया ने इस संरचना को पूरी तरह बदल दिया है। अब प्रत्येक व्यक्ति न केवल दर्शक है, बल्कि स्वयं सामग्री का सृजनकर्ता भी बन चुका है। कंटेंट की लोकप्रियता और लोगों की रुचि के आधार पर अनेक साधारण लोग सोशल मीडिया के माध्यम से देश और दुनिया में पहचान बना रहे हैं। सोशल मीडिया ने व्यक्ति को यह अवसर दिया है कि वह अपने माध्यम से यह देख सके कि उसके आसपास और समाज में क्या घट रहा है, और साथ ही अपनी बात, विचार और अनुभव भी दूसरों तक पहुंचा सके। इसने अभिव्यक्ति के नए रास्ते खोले हैं और संचार को अधिक सहभागी तथा व्यापक बना दिया है।

मीडिया उपभोग की बदलती संरचना: सोशल मीडिया के व्यापक विस्तार से पहले मीडिया उपभोग की संरचना अपेक्षाकृत सीमित और नियंत्रित थी। अख़बार, रेडियो और टेलीविज़न जैसे माध्यमों में संपादकीय जिम्मेदारी स्पष्ट थी। समाचारों के चयन, प्रस्तुति और सत्यापन की एक स्थापित प्रक्रिया हुआ करती थी। आम नागरिक उस समय मुख्यतः मीडिया का उपभोक्ता था।

आज भारत में करोड़ों लोग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से जुड़े हैं। यह केवल संचार का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक विमर्श, राजनीतिक संवाद और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का प्रमुख मंच बन चुका है। यहां व्यक्ति केवल दर्शक नहीं, बल्कि निर्माता और प्रसारक भी है।

ऐसे में नागरिक की भूमिका केवल सूचना ग्रहण करने तक सीमित नहीं रह जाती। अब वह यह भी तय करता है कि कौन-सी सूचना आगे जाएगी, किसे समर्थन मिलेगा और किसे नकारा जाएगा। यह शक्ति जितनी बड़ी है, उतना ही बड़ा उसका उत्तरदायित्व भी है।

भारतीय परंपरा में वाणी को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। कहा गया है कि वाणी से ही बंधन भी होता है और मुक्ति भी। आज डिजिटल युग में यह वाणी सोशल मीडिया पोस्ट, टिप्पणी और साझा की गई सामग्री के रूप में प्रकट होती है। यदि यह वाणी विवेकहीन हो जाए, तो वह समाज में वैमनस्य, भ्रम और अविश्वास को जन्म दे सकती है।

विवेकपूर्ण मीडिया व्यवहार की अनिवार्यता: आज आवश्यकता इस बात की है कि नागरिक मीडिया उपभोग करते समय केवल भावनाओं के प्रवाह में न बहें, बल्कि विवेक और तथ्य के आधार पर निर्णय लें। किसी भी सूचना को साझा करने से पहले उसके स्रोत, संदर्भ और प्रभाव पर विचार करना अनिवार्य है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की आत्मा है, किंतु यह स्वतंत्रता उत्तरदायित्व से अलग नहीं हो सकती। समाज, राष्ट्र और संस्कृति पर पड़ने वाले प्रभावों को नजरअंदाज कर की गई अभिव्यक्ति अंततः स्वतंत्रता को ही कमजोर करती है।

राष्ट्रीय दृष्टि से देखें तो मीडिया व्यवहार भी राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया का हिस्सा है। सजग, संतुलित और उत्तरदायी नागरिक ही एक स्वस्थ सूचना-परिस्थिति का निर्माण कर सकते हैं। यही वह आधार है जिस पर सामाजिक सौहार्द, राष्ट्रीय एकता और लोकतांत्रिक मूल्य टिके रहते हैं।

निष्कर्ष: मीडिया और तकनीक अपने आप में न तो सकारात्मक हैं और न नकारात्मक। उनका स्वरूप इस बात पर निर्भर करता है कि हम उनका उपयोग किस विवेक और किस उद्देश्य से करते हैं। आज के सूचना-प्रधान युग में सबसे बड़ी आवश्यकता तकनीकी दक्षता की नहीं, बल्कि नैतिक चेतना और नागरिक उत्तरदायित्व की है।

यदि हम मीडिया उपभोग और अभिव्यक्ति में संयम, सत्य और राष्ट्रहित को केंद्र में रखें, तो यही डिजिटल युग मानव विकास की अगली सकारात्मक छलांग सिद्ध हो सकता है। अन्यथा सूचना की यह शक्ति समाज को भ्रम और विभाजन की ओर भी ले जा सकती है। चुनाव हमारे विवेक के हाथ में है।


लेखक - आईआईएमटी कॉलेज ऑफ मैनेजमेंट, ग्रेटर नोएडा में सहायक प्राध्यापक है।