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पर्यावरण, स्वास्थ्य एवं सतत विकास

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पर्यावरण, स्वास्थ्य एवं सतत विकास 

मानवीय सहूलियतों और सुविधाओं की पूर्ति के लिए अनेकों नई संरचनाओं और उपयोगी उत्पादों का निर्माण होता रहता है, जिनसे आर्थिक व्यापार और सामाजिक विकास भी होता है। परन्तु इस प्रक्रिया में अक्सर प्राकृतिक संसाधनों से उद्योगों द्वारा कृत्रिम वस्तुएं निर्मित की जाती हैं, तो जाने-अनजाने कतिपय विशिष्ट प्राकृतिक संसाधन नष्ट हो जाते हैं और हमारे पर्यावरण का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ जाता। इन संश्लेषित उत्पादों को बनाते समय उत्सर्जित गैसों और जहरीले  रासायनिक अवशेषों से जल और वायु में प्रदूषण बढ़ता है और औद्योगिक कचरा सही तरह से निस्तारित नहीं होने पर स्वास्थ्य एवं स्वच्छता की अनेकों समस्याएं पैदा करता है। भवनों, दुकानों, घरों, सड़कों और अन्य आधारभूत संरचनाओं के लिए होने वाला उत्खनन भी पृथ्वी की प्राकृतिक संरचनाओं का सन्तुलन बिगाड़ देता है, जिसके कारण प्राकृतिक आपदाएं बढ़ती जा रही हैं। औद्योगिक इकाईयों, मोटर वाहनों, परिवहन के अन्य साधनों और युद्ध तथा विकास के अनेक उपकरणों से उत्सर्जित गैसें जलवायु परिवर्तन और वैश्विक ऊष्मीकरण के रूप में मनुष्य के स्वास्थ्य और सतत विकास के लिए एक बड़ी चुनौती बनती जा रहीं हैं।

इस अनूठी पृथ्वी की कोख में असंख्य जीवों और अजीवों का एक कार्यकारी तंत्र, जिसे हम पृथ्वी-तंत्र कह सकते हैं, पृथ्वी की उत्पति और इसके शीतली करण के साथ ही बहुत ही लम्बे काल खण्ड में विकसित हुआ है। पृथ्वी की आयु लगभग 4.54 अरब वर्ष मानी जाती है, और जीवन की शुरुआत लगभग 3.5 से 4 अरब साल आंकी जाती है। माना जाता है, कि पृथ्वी पर मनुष्य (होमो सेपिएन्स), लगभग 2 लाख से 3.5 लाख पूर्व अफ्रीका में पैदा हुए होंगे, जबकि मानव जैसे शुरुआती जीव होमो हैबिलस लगभग 23 लाख वर्ष पहले दिखे, जबकि मनुष्य के आदिम प्राइमेट (प्रारंभिक पूर्वज लगभग) लगभग 5.5 करोड़ वर्ष पहले ही अस्तित्व में आ गए थे। इससे पता चलता है कि पशुओं से मनुष्य बनने की प्राकृतिक प्रक्रिया कितनी लम्बी रही है। हमारा पर्यावरण हमारे आस-पास की नदियों, तालाबों, वन क्षेत्रों, खेतों, बाग-बगीचों, मिट्टी, हवा, जलवायु और जीवों तथा अजीवों के बीच की विशिष्ट संरचनाओं और उनके आपसी संबंधों के जटिल जाल से बनता है। हमारी सनातन संस्कृति में ये सभी प्राकृतिक संरचनाएं पृथ्वी जल, वायु, अग्नि, और आकाश जैसे पंचभूतों से निर्मित हुई मानी जाती हैं। आधुनिक विज्ञान में इस प्राचीन ज्ञान को आगे बढ़ाते हुए कुल 118 प्राकृतिक तत्वों और इनसे बने अनगिनत पदार्थों के भिन्न स्वरूपों से पर्यावरण की संरचना मानी गयी है। इस पृथ्वी-तन्त्र और उसके मूल तत्वों तथा पदार्थों के इन्हीं आपसी संबंधों को समझने के लिए पिछले कुछ दशकों में पर्यावरण विज्ञान का शास्त्र विकसित किया गया है। इन्हीं मूल तत्वों और विज्ञान के बहुस्तरीय सिद्धान्तों के आधार पर पृथ्वी के वातावरण से बाहर भी ग्रहों, उपग्रहों सहित पूरे ब्रह्माण्ड के स्वरूप को समझने का प्रयास भी किया जाता है। पृथ्वी का यह विशिष्ट पर्यावरण तन्त्र असंख्य छोटे-बड़े पारिस्थितिकीय तंत्रों के जटिल संजाल से  निर्मित होता हैं।

हमारे पर्यावरण में मिट्टी, पानी, समुद्र, पर्वत, नदी, नालों और वनों का जिस तरह एक संतुलित मात्रा और अपनी प्राकृतिक विविधता के साथ होना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक है, विविध तरह के जीव, जंतुओं, वनस्पतियों और सूक्ष्म जीवों का संरक्षण होना । पृथ्वी पर मौजूद हरे पेड़ों और फसलों तथा वनस्पतियों में ही प्रकृति ने यह क्षमता विकसित की है, कि वे पृथ्वी से पानी और वायु से कार्बन डाइऑक्साइड जैसी सांसो, वाहनों और कारखानों से उत्सर्जित होने वाली गैस को सूर्यदेव की ऊर्जा से बांध कर अपने लिए भी और सभी जीव जंतुओं के लिए कार्बनिक भोजन का निर्माण कर लें। पृथ्वी से ही खनिज पदार्थों को ग्रहण कर ये हरे पेड़-पौधे अन्य खाद्य पदार्थों का भी निर्माण करते हैं। समूचे जीव जगत के लिए भोजन का निर्माण करते हुए ये हरे वृक्ष और हरी वनस्पतियां, जिनमें सभी प्रकार की फसलें और औषधीय गुण वाले पौधे भी शामिल हैं, पानी में उपलब्ध प्राण वायु ऑक्सीजन को मुक्त कर वातावरण में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ा देते हैं। पौधे हमें भोजन के अतिरिक्त फल, फूल, औषधियां, रेशे, लकड़ी, ऊर्जा, तेल, सुगंध, सौन्दर्य प्रसाधन और प्राण वायु जैसी अमूल्य वस्तुएं देते हैं, और वह भी हमसे कुछ लिए बिना ही। परन्तु हम पेड़ो को विकास के नाम पर नष्ट कर देते हैं, और उनकी भरपाई प्रकृति में दुबारा नहीं हो पाती। एक वृक्ष पर सैकड़ों तरह के सूक्ष्म जीव, कीड़े, मकोड़े, पशु-पक्षी आदि भी रहवास पाते हैं ।

सूक्ष्म जीव हमारे लिए उपयोगी भी हैं, और नुकसानदेह भी । सूक्ष्मदर्शी के विभिन्न स्वरूपों के आविष्कार के पहले, हमारे लिए इन आंखों से न दिखने वाले भांति-भांति के असंख्य सूक्ष्म जीवों के बारे में जानना अत्यंत कठिन था । हमने पिछले कुछ वर्षों पूर्व देखा था, कि इनमें से कई इतने शक्तिशाली हैं, कि कोरोना नाम के एक वायरस ने कई वर्षों तक पूरे विश्व की गति को रोक रखा था । ये सूक्ष्म जीव मूलतः दो प्रकार के होते हैं। एक वे जो अपना भोजन सड़े - गले पदार्थों से लेते हैं, और उनमें मृत जैविक पदार्थों के कार्बनिक अवशेषों को गलाने की प्राकृतिक क्षमता होती है। उसी से वे अपने जीवन संचालन, वंश वृद्धि और अपने वृद्धि एवं जीवन यापन के लिए ऊर्जा प्राप्त करते हैं। ये न होते तो पृथ्वी पर मृत जीवों का ढेर लगा रहता और मनुष्य सहित अधिकांश जीवित जीवों का जीवन ही संभव नहीं हो पाता । कई सूक्ष्म जीव मिट्टी में रहकर पेड़ पौधों की उपज बढ़ा देते और उनकी बीमारियों से रक्षा करते हैं। इनके अलावे अनेकों प्रकार के सूक्ष्म जीव जो मृत तथा सड़े-गले जैविक पदार्थों को पचा कर भोजन तथा ऊर्जा प्राप्त करने की क्षमता खो चुके हैं, वे मनुष्य, पशु-पक्षी, अन्य जीवित जंतुओं और वनस्पतियों में प्रवेश कर उनकी जीवित कोशिकाओं से अपना भोजन ग्रहण कर लेते और उससे ऊर्जा प्राप्त कर अपना जीवन यापन करते हैं। वे जिन जीवों के शरीर में प्रवेश करते हैं, उन्हें रोग ग्रस्त कर देते और दवाओं से नियंत्रित नहीं हो पाने की दशा में उसकी मृत्यु का कारण भी बन सकते।

सर्दियों के आते ही हर साल शहरों में वायु प्रदूषण बढ़ जाता है। भारतीय शहरों में इस बढ़ते वायु प्रदूषण के बड़े कारणों में सड़कों पर बढ़ती हुई गाड़ियां, हीटर, कंप्यूटर और इन्फार्मेशन टेक्नोलॉजी से जुड़े सर्वर और उपकरण, तथा उद्योगों से निकलने वाला धुआं और धूल सब शामिल होते हैं। जहरीली गैसों और उन पर मौजूद पार्टिकुलेट मैटर के नुकसानदेह कण भी हवा में बढ़ते जा रहे हैं। व्यवस्था, प्रबन्धन और निगरानी की लापरवाही, शहरों की घनी और अंत हीन बसावट, शहरी इलाकों में वन क्षेत्रों और नदियों का संरक्षण न हो पाना और बढ़ते वाहनों और बेतरतीबी से बढ़ती जा रही औद्योगिक गतिविधियों के कारण शहरी क्षेत्रों में वायु प्रदूषण खतरनाक स्तर पर पहुंच कर सांस की बीमारियां, त्वचा रोग, हृदय संबंधी समस्याएं और अन्य बीमारियां लगातार बढ़ा रहा है। सर्दियों में ये प्रदूषक हवा के ओस बूंदों से और भारी होकर वातावरण के निचले हिस्से में आ जाते हैं, और हवा के बहाव के बहुत कम हो जाने से सीधे सांसों में प्रविष्ट होने लगते हैं। खेतों में प्रयोग होने वाले रासायनिक खाद और कीटनाशक भी जल, जमीन, मिट्टी, पानी और खाद्य पदार्थों को विषाक्त कर अनेक रोगों के कारण बन रहे हैं। 

हम विकास का लाभ तो चाहतें हैं, पर इससे उत्पन्न प्रदूषकों और कचरे के प्रबंधन की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहते। हम पेड़ो को नष्ट करते हैं, पर उन्हें लगाने और विकसित करने में रुचि नहीं लेते। लोकतंत्र में सबको खुश रखने का प्रयास शासन-प्रशासन को कड़े कदम नहीं उठाने देता और स्थितियां बद से बदतर होती जा रही हैं। इससे निपटने के लिए और सतत विकास की अवधारणा को अपनाने के लिए  हमें एक बड़े सांस्कृतिक और सामाजिक आंदोलन की आवश्यकता है।


लेखक धारणीय कृषि और पर्यावरण केन्द्र में पीएच.डी, FNAsc निदेशक (अवैतनिक) है।