पर्यावरण संरक्षण: अभियान नहीं, जनांदोलन
जहां है हरियाली, वहां है खुशहाली ।
छुट्टियां, हम सभी इस शब्द का अर्थ जानते हैं, लेकिन क्या कभी हमने इसके पीछे छिपे अर्थ को समझने की कोशिश की है? कभी मन में आया कि हमें छुट्टियों की आवश्यकता क्यों पड़ती है? कोविड-19 महामारी के दौरान दिल्ली और अन्य बड़े शहरों के लोगों के बीच एक नया चलन दिखाई दिया। लोग अधिक स्वच्छ हवा और बेहतर पर्यावरण की तलाश में पहाड़ों और जंगलों की ओर जाने लगे। तब क्या कभी यह सवाल मन में आया कि अधिक ऑक्सीजन लेने के लिए हमें कहीं और क्यों जाना पड़ता है?
छुट्टियां जीवन का विकल्प होनी चाहिए, हमारी जीवनशैली की अनिवार्यता या मजबूरी नहीं। यदि हम 1980 और 1990 के दशक के बीच के समय को देखें तो वर्ष में सामान्यतः एक बार, विशेषकर गर्मियों की छुट्टियों में, लोग घूमने या अपने गांव-घर और रिश्तेदारों के पास जाने निकलते थे। आज सप्ताहांत और विशेषकर ‘लॉन्ग वीकेंड’ पर बड़ी संख्या में लोग शहरों से बाहर निकलते हैं। पर्यटन और यात्रा के बढ़ते अवसर निश्चित रूप से सकारात्मक हैं, लेकिन इसके साथ यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि क्या हमारे शहरों में ऐसा पर्यावरण उपलब्ध है, जहां लोग प्रतिदिन स्वच्छ हवा, हरियाली, खुले स्थान और प्राकृतिक परिवेश का आनंद ले सकें? इन प्रश्नों के मूल में एक महत्वपूर्ण उत्तर है कि हमने अपने जीवन को प्रकृति से दूर कर लिया है।
हमने लंबे समय तक विकास को पर्यावरण से जोड़कर नहीं देखा। हरे-भरे शहर, नीला आकाश, स्वच्छ नदियां और उपजाऊ मिट्टी किसी पर्यटन स्थल की विशेषता ही नहीं, बल्कि हमारी दैनिक जीवनशैली का अनिवार्य हिस्सा होना चाहिए। आज हम छुट्टियों के लिए किसी हरे-भरे स्थान का विकल्प खोज लेते हैं, लेकिन यदि आने वाले समय में वे स्थान भी हमारे बड़े शहरों की तरह प्रदूषित और अनियोजित हो गए तो हम कहां जाएंगे?
इसलिए पर्यावरण संरक्षण कोई विकल्प नहीं, बल्कि हम सभी के भविष्य का प्रश्न है। यदि हवा स्वच्छ नहीं होगी, जल स्रोत सुरक्षित नहीं होंगे और मिट्टी की उर्वरता प्रभावित होगी, तो विकास की उपलब्धियां भी हमारे जीवन की गुणवत्ता को सुरक्षित नहीं रख पाएंगी। इसी संदर्भ में उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में युवाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। राज्य की बड़ी युवा आबादी यदि पर्यावरण संरक्षण को अपने जीवन का हिस्सा बना ले तो यह परिवर्तन केवल प्रदेश तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे देश के लिए उदाहरण बन सकता है।
पौधरोपण से संरक्षण तक: उत्तर प्रदेश में पौधरोपण महाअभियान, ‘एक पेड़ माँ के नाम’ और मिशन लाइफ (LiFE) जैसी पहल के माध्यम से युवाओं को पौधरोपण, पौधों की देखभाल और पर्यावरण संरक्षण से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश सरकार ने जुलाई 2026 में ‘एक पेड़ माँ के नाम’ पौधरोपण महायज्ञ-2026 की शुरुआत की।
पर्यावरण संरक्षण की वास्तविक सफलता केवल पौधा लगाने में नहीं, बल्कि उसके जीवित रहने और विकसित होने में है। इसलिए शैक्षणिक संस्थानों और युवा संगठनों को पौधरोपण के साथ सिंचाई, गुड़ाई, पौधों की निगरानी और संरक्षण का प्रशिक्षण भी देना आवश्यक है। युवाओं को यह समझना होगा कि उनकी जिम्मेदारी पौधा लगाने के साथ समाप्त नहीं होती; उसकी देखभाल और संरक्षण भी वर्षों की जिम्मेदारी है।
‘मिशन 10,000 पेड़’ से सामुदायिक भागीदारी: उत्तर प्रदेश वॉलंटरी हेल्थ इनिशिएटिव के ‘मिशन 10,000 पेड़’ जैसे तीन वर्षीय अभियान भी युवाओं को सामूहिक भागीदारी के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण से जोड़ने का प्रयास करते हैं। ऐसे अभियानों में केवल एक ही प्रजाति के पौधों पर निर्भर रहने के बजाय नीम, सागौन, अंजीर, महुआ, आम और जामुन जैसे स्थानीय एवं उपयोगी पौधों के रोपण और संरक्षण पर जोर दिया जाता है। इस प्रकार के प्रयास पर्यावरण संरक्षण को केवल सरकारी कार्यक्रम न बनाकर समुदाय और युवाओं की साझा जिम्मेदारी में बदलने की दिशा में महत्वपूर्ण हैं।
गंगा और युवा: नदी के साथ हरियाली की माला - गंगा नदी उत्तर प्रदेश की जीवन रेखा है। अपने लगभग 2,525 किलोमीटर के संपूर्ण प्रवाह में गंगा उत्तर प्रदेश में लगभग 1,140 किलोमीटर बहती है। ऐसे में नदी और उसके तटवर्ती पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षण प्रदेश के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
गंगा किनारे स्थानीय प्रजातियों-नीम, पीपल, बरगद, अर्जुन और शीशम के वृक्षों की हरित पट्टी विकसित करने के प्रयास नदी के तटवर्ती पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने में सहायक हो सकते हैं। ऐसे अभियानों को जनआंदोलन का स्वरूप देने के लिए विद्यालयों और महाविद्यालयों के विद्यार्थियों को पौधे गोद लेने, उनकी देखभाल करने और उनके विकास की निगरानी से जोड़ा जाना उपयोगी होगा।
बढ़ रहा है उत्तर प्रदेश का हरित आवरण: भारतीय वन सर्वेक्षण की इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट (ISFR) 2023 के अनुसार उत्तर प्रदेश का कुल वन एवं वृक्ष आवरण 2021 के 23,437.53 वर्ग किलोमीटर से बढ़कर 2023 में 23,996.72 वर्ग किलोमीटर हो गया। यानी इसमें 559.19 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि दर्ज की गई। 2023 में यह राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 9.96 प्रतिशत था। इसी अवधि में उत्तर प्रदेश का वन आवरण 14,927.37 वर्ग किलोमीटर से बढ़कर 15,045.80 वर्ग किलोमीटर हुआ, जबकि वृक्ष आवरण 8,510.16 वर्ग किलोमीटर से बढ़कर 8,950.92 वर्ग किलोमीटर हो गया।
यह वृद्धि उत्साहजनक है, लेकिन इसे केवल पौधरोपण की संख्या के आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए। पौधों की जीवित रहने की दर, स्थानीय प्रजातियों का चयन, संरक्षण और दीर्घकालीन निगरानी उतनी ही महत्वपूर्ण है। इसमें युवाओं और शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
स्कूलों से पर्यावरण चेतना की नई शुरुआत: जुलाई 2026 में ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान के तहत विद्यालयों की भागीदारी भी सामने आई। ऐसे अभियानों की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल लगाए गए पौधों की संख्या नहीं, बल्कि विद्यार्थियों में पर्यावरणीय जिम्मेदारी का विकास है।
उत्तर प्रदेश के विद्यालयों में ईको क्लब्स फॉर मिशन लाइफ (LiFE) पर्यावरणीय चेतना के महत्वपूर्ण केंद्र बनकर उभर रहे हैं। इनके माध्यम से विद्यार्थी जल संरक्षण, ऊर्जा बचत, प्लास्टिक नियंत्रण और पुनर्चक्रण जैसी गतिविधियों को अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाने के लिए प्रेरित किए जा रहे हैं।
यदि विद्यालय स्तर पर पर्यावरण शिक्षा को केवल पाठ्यक्रम तक सीमित न रखकर व्यवहार से जोड़ा जाए, तो इसका प्रभाव विद्यार्थियों के परिवार और समुदाय तक भी पहुंच सकता है।
‘ग्रीन चौपाल’ से गांवों तक हरियाली: इसी श्रृंखला में ग्रीन चौपाल जैसी पहल ग्रामीण समाज में पर्यावरणीय जागरूकता को बढ़ाने का प्रयास करती है। इसका उद्देश्य वन एवं वृक्ष आवरण बढ़ाने के साथ ग्रामीण समुदाय को पर्यावरण-अनुकूल गतिविधियों से जोड़ना है। गांवों के युवाओं को जैविक खेती, वर्षा जल संचयन, सौर ऊर्जा और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से जोड़ना विशेष रूप से उपयोगी हो सकता है। ग्रामीण युवा यदि पर्यावरण संरक्षण को स्थानीय रोजगार और उद्यमिता से जोड़ें तो हरित विकास की संभावनाएं और मजबूत होंगी।
गंगा उत्सव, गंगा शपथ, रिवेराथॉन, नदी स्वच्छता अभियान, गंगा क्वेस्ट, प्लास्टिक-फ्री कैंपस, प्लास्टिक-फ्री अवेयरनेस कैंपेन, स्वच्छता ही सेवा जैसे अभियानों और राष्ट्रीय सेवा योजना (NSS) जैसी व्यवस्थाओं के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण को जनभागीदारी से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। लेकिन एक बात स्पष्ट है-यदि इन प्रयासों को वास्तव में व्यापक जनआंदोलन बनाना है तो युवाओं को केवल सहभागी नहीं, बल्कि प्रेरक और नेतृत्वकर्ता बनना होगा।
युवाओं को पर्यावरण संरक्षण को किसी सरकारी अभियान या एक दिन की गतिविधि के रूप में नहीं, बल्कि अपने जीवन की कहानी के रूप में स्वीकार करना होगा। एक पौधा लगाना, पानी बचाना, प्लास्टिक का कम उपयोग करना, सार्वजनिक स्थानों को स्वच्छ रखना, ऊर्जा की बचत करना और दूसरों को इसके लिए प्रेरित करना ऐसे छोटे कदम मिलकर बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं।
डिजिटल युवा, हरित भविष्य: उत्तर प्रदेश की युवा शक्ति के पास सोशल मीडिया, तकनीक, नवाचार और संगठन क्षमता जैसी ताकतें हैं। यदि इन क्षमताओं को पर्यावरण संरक्षण से व्यापक रूप से जोड़ा जाए तो एक नई डिजिटल पर्यावरण क्रांति की शुरुआत हो सकती है। युवा सोशल मीडिया के माध्यम से स्थानीय पर्यावरणीय समस्याओं को सामने ला सकते हैं, पौधों की निगरानी के लिए डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल कर सकते हैं, जल संरक्षण अभियानों को जनभागीदारी से जोड़ सकते हैं और पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली को लोकप्रिय बना सकते हैं। आज की युवा पीढ़ी के पास वह क्षमता है कि वह किसी स्थानीय पर्यावरणीय पहल को कुछ ही समय में हजारों लोगों तक पहुंचा सकती है। आवश्यकता केवल सही दिशा और जिम्मेदार डिजिटल नेतृत्व की है।
भविष्य वही, जो प्रकृति के साथ हो: हमें ऐसा विकास चाहिए जिसमें आर्थिक प्रगति और पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे के विरोधी न हों। हमें ऐसे शहर चाहिए जहां स्वच्छ हवा और हरियाली सामान्य जीवन का हिस्सा हो। हमें ऐसी नदियां चाहिए जिनका पानी केवल तस्वीरों में नहीं, वास्तविक जीवन में भी स्वच्छ हो। हमें ऐसी मिट्टी चाहिए जो आने वाली पीढ़ियों की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित कर सके।
यदि उत्तर प्रदेश की युवा शक्ति पर्यावरण संरक्षण को अपनी प्राथमिकताओं में शामिल कर लेती है तो आने वाला समय निश्चित रूप से अधिक हरित और सुरक्षित हो सकता है। तब वह नीला आसमान, वही स्वच्छ और निर्मल पानी और वही शुद्ध हवा हमारी तलाश का विषय नहीं होंगे। हमें स्वच्छ हवा के लिए पहाड़ों की ओर भागने या प्रकृति के लिए किसी ‘लॉन्ग वीकेंड’ की प्रतीक्षा करने की जरूरत नहीं होगी। पर्यावरण संरक्षण हमारा भविष्य है और पर्यावरण संरक्षण में ही हमारा भविष्य है। अब यह कोई विकल्प मात्र नहीं, बल्कि एक अनिवार्य जिम्मेदारी बन चुका है।




