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पंच परिवर्तन और नागरिक कर्त्तव्य: राष्ट्र निर्माण की चेतना

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पंच परिवर्तन और नागरिक कर्त्तव्य: राष्ट्र निर्माण की चेतना

भारत की आत्मा युगों से परिवर्तन की साधना करती रही है। जब-जब समाज दिशाहीन हुआ, तब-तब किसी न किसी रूप में राष्ट्रचेतना ने उसे नई राह दिखाई, और ऐसे ही कालखंड में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारतीय समाज की उस अंतर्निहित शक्ति को जाग्रत करने वाला प्रेरक दीपस्तंभ बनकर उभरा। संघ केवल एक संगठन नहीं, बल्कि राष्ट्रनिर्माण की सतत साधना है, जो व्यक्ति से समाज और समाज से राष्ट्र तक के उत्थान का मार्ग प्रशस्त करता है।

आज के परिवर्तनशील वैश्विक परिदृश्य में भारत के सामने सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक चुनौतियां खड़ी हैं। इन्हीं चुनौतियों का सकारात्मक और सशक्त उत्तर है, पंच परिवर्तन। सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्वदेशी जीवनशैली और नागरिक कर्त्तव्यबोध, ये पांच परिवर्तन राष्ट्र के पुनर्जागरण के प्राण तत्व व आधार स्तंभ हैं। ये परिवर्तन केवल विचार नहीं, बल्कि व्यवहार में उतरने वाली जीवन दृष्टि हैं, जो व्यक्ति को आत्मकेंद्रित से राष्ट्रकेंद्रित बनाती हैं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पंच परिवर्तन के माध्यम से समाज को आत्मावलोकन और आत्मनिर्माण की प्रेरणा देता है। यह आह्वान करता है कि राष्ट्र का निर्माण केवल नीतियों से नहीं, बल्कि संस्कारित नागरिकों के चरित्र से होता है। जब व्यक्ति अपने आचरण में परिवर्तन लाता है, तभी समाज में स्थायी और सकारात्मक बदलाव संभव होता है।

वस्तुतः संघ पंच परिवर्तन द्वारा भारत को उसकी सनातन चेतना से जोड़ते हुए एक सशक्त, समरस और आत्मनिर्भर राष्ट्र के निर्माण का संकल्प जगाते हैं, जहां विकास केवल भौतिक नहीं, बल्कि नैतिक और सांस्कृतिक भी हो।

 कदाचित यही कारण है कि भारतीय सभ्यता का इतिहास केवल घटनाओं का क्रम नहीं, बल्कि सतत परिवर्तन और आत्मपरिष्कार की जीवंत परंपरा है। यहां परिवर्तन को कभी भी जड़ों से विच्छेद के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि उसे मूल्य, संस्कार और कर्त्तव्य के माध्यम से समाज को सुदृढ़ करने का साधन माना गया। वर्तमान समय में ”पंच परिवर्तन“ का विचार इसी परंपरा का आधुनिक विस्तार है, जो नागरिक कर्त्तव्यों के साथ जुड़कर राष्ट्र निर्माण की एक नई और सार्थक दिशा प्रस्तुत करता है। 

हितोपदेश में कहा गया है कि ”उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।

न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः।।“

यह श्लोक स्पष्ट करता है कि केवल आकांक्षाओं से नहीं, बल्कि सक्रिय प्रयास से ही लक्ष्य प्राप्त होते हैं। पंच परिवर्तन भी इसी सक्रियता की मांग करता है, जहां नागरिक केवल दर्शक न रहकर राष्ट्र के निर्माण में सहभागी बनता है।

पंच परिवर्तन का मूल भाव व्यक्ति के भीतर से आरंभ होकर समाज और राष्ट्र तक विस्तार पाता है। इसका पहला स्वर आत्मबोध और स्वत्व की पहचान है। जब व्यक्ति अपनी सांस्कृतिक विरासत, इतिहास और मूल्यों को समझता है, तभी उसमें आत्मगौरव का भाव जाग्रत होता है। यह आत्मगौरव किसी अन्य के प्रति द्वेष नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व के प्रति सम्मान से उपजता है। ऋग्वेद का मंत्र, ”आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः,“

भारतीय दृष्टि की उदारता को प्रकट करता है। जब नागरिक अपने स्वत्व को पहचानता है, तब वह राष्ट्रहित में सोचने और कार्य करने के लिए प्रेरित होता है।

परिवार भारतीय समाज की रीढ़ रहा है या सामान्य शब्दों में कहे तो परिवार हमारे संस्कार की वह प्रथम पाठशाला है, जहां व्यक्ति में गुण और संस्कार रोपे जाते है। यही से व्यक्ति के चरित्र का निर्माण होता है। राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया परिवार से ही प्रारंभ होती है, क्योंकि यहीं से नागरिकता के प्रथम संस्कार पल्लवित होते हैं। परिवार में अनुशासन, सहअस्तित्व और कर्त्तव्यबोध का विकास ही आगे चलकर सामाजिक उत्तरदायित्व का आधार बनता है। भारतीय शास्त्रों में माता-पिता और गुरु को विशेष स्थान दिया गया है। महाभारत के वनपर्व के अध्याय 313 का 60वां श्लोक का अंश, ”माता गुरुतरा भूमेः ख्यातः पित्रा गरीयसी।“ यह संकेत करता है कि जिन संस्कारों से व्यक्ति का निर्माण होता है, वही आगे चलकर राष्ट्र के चरित्र का निर्माण करते हैं। एक संस्कारित परिवार से ही सुसंस्कृत समाज व समुन्नत राष्ट्र का निर्माण होता है। यह सर्वमान्य सत्य है कि भारतीय परिवार अपने कर्त्तव्यबोध व धर्म के कारण विश्वविख्यात हैं। सम्पूर्ण विश्व के सामने राम का धर्म, कृष्ण का धर्म, भीम का धर्म अनुकरण कर उदाहरण स्वरूप हमारा परिवार बन रहे हैं। वर्तमान में भारतीय परिवारों का अध्ययन पाश्चात्य देश कर रहे हैं।

प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग रही है। पंच परिवर्तन का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष पर्यावरण संरक्षण है, जो आज केवल वैचारिक नहीं, बल्कि अस्तित्व का प्रश्न बन चुका है। भारतीय दृष्टि में प्रकृति भोग की वस्तु नहीं, बल्कि सहचर और माता के समान है। ईशोपनिषद् का मंत्र,”ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्,“ मनुष्य को यह बोध कराता है कि यह सारा संसार किसी एक का निजी स्वामित्व नहीं है। और ‘माता भूमि पुत्रोऽहं पृथिव्याः’ अर्थात पृथ्वी मेरी माता है और मैं पृथ्वी का पुत्र/ पूत्री हूं।

जब नागरिक इस भाव से प्रेरित होकर जल, जंगल और भूमि की रक्षा करता है, तब वह न केवल वर्तमान, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के प्रति भी अपना कर्त्तव्य निभाता है।

सामाजिक समरसता भारत की आत्मा रही है। विविध भाषाएं, वेश, परंपराएं और विचार होते हुए भी भारत एक राष्ट्र के रूप में खड़ा है। पंच परिवर्तन का यह पक्ष हमें भेदभाव से ऊपर उठकर समरस समाज के निर्माण की प्रेरणा देता है। प्राचीन ग्रंथों में उल्लिखित, ”सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः,“ केवल प्रार्थना नहीं, बल्कि सामाजिक दृष्टिकोण है। जब नागरिक अन्याय, अस्पृश्यता और वैमनस्य के विरुद्ध खड़ा होता है, तब वह राष्ट्र की एकता को सुदृढ़ करता है। सामाजिक समरसता के बिना कोई भी राष्ट्र दीर्घकाल तक प्रगति नहीं कर सकता।

 ”स्व“ केवल आत्मबोध नहीं, बल्कि राष्ट्रबोध का सशक्त माध्यम है। भाषा, भूषा, भजन, भोजन, भवन और भ्रमण , ये सभी हमारे जीवन के बाह्य रूप नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की आत्मा हैं।

भाषा के माध्यम से विचारों का संप्रेषण होता है। मातृभाषा में व्यक्त भाव अधिक आत्मीय और प्रभावी होते हैं। संघ स्वदेशी भाषाओं को सम्मान देकर सांस्कृतिक आत्मनिर्भरता का संदेश देता है। भूषा व्यक्ति की पहचान होती है। भारतीय परिधान हमारी परंपरा, सरलता और मर्यादा के प्रतीक हैं, जो आत्मगौरव को जाग्रत करते हैं।

भजन मन को शुद्ध कर राष्ट्रसेवा की भावना से जोड़ते हैं। संघ के प्रार्थना गीत त्याग, समर्पण और एकता का भाव उत्पन्न करते हैं। भोजन केवल शरीर का पोषण नहीं, बल्कि सात्त्विक जीवन का आधार है। स्वदेशी, सादा और स्वास्थ्यवर्धक आहार आत्मनिर्भर समाज की नींव रखता है।

भवन हमारे संस्कारों के केंद्र होते हैं, सरल, उपयोगी और सामाजिक समरसता को बढ़ाने वाले। भ्रमण देश के विविध भूभागों से परिचय कराता है, जिससे ”विविधता में एकता“ का अनुभव होता है।

संघ का ”स्व आधारित“ दृष्टिकोण व्यक्ति को संस्कारवान नागरिक बनाकर राष्ट्र को सशक्त करने का मार्ग प्रशस्त करता है। आज के समय में अधिकारों की चर्चा जितनी प्रबल है, उतनी ही आवश्यकता कर्त्तव्यों की स्मृति की भी है। पंच परिवर्तन नागरिक कर्त्तव्यों को केंद्र में रखता है। संविधान ने नागरिकों को अधिकार दिए हैं, परंतु उनके साथ मूल कर्त्तव्यों का भी निर्देश किया है। कानून का पालन, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा, स्वच्छता, अनुशासन और राष्ट्रहित को सर्वाेपरि रखना, ये सभी नागरिक कर्त्तव्य हैं। गीता का श्लोक- ”कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन“ निष्काम कर्त्तव्य की भावना को पुष्ट करता है। जब नागरिक फल की अपेक्षा किए बिना अपने कर्त्तव्य का पालन करता है, तब राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया सुदृढ़ होती है।

 संघ द्वारा प्रतिपादित पंच परिवर्तन का सार यह है कि राष्ट्र निर्माण केवल शासन या संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का दायित्व है। छोटे-छोटे कार्य, जैसे समय पालन, ईमानदारी, सहयोग और संवेदनशीलता, राष्ट्र की नींव को मजबूत करते हैं। यह नई दिशा भौतिक विकास के साथ-साथ नैतिक और सांस्कृतिक उत्थान को भी महत्व देती है। आत्मनिर्भर भारत की कल्पना भी तभी साकार हो सकती है, जब नागरिक आत्मनिर्भर सोच और कर्त्तव्यनिष्ठ आचरण  अपनाए।

भारतीय दर्शन सदा व्यक्ति और समाज के संतुलन पर बल देता आया है। कठोपनिषद् का आह्वान-”उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत“ आज भी उतना ही प्रासंगिक है। यह हमें आलस्य और उदासीनता त्यागकर जागरूक नागरिक बनने का संदेश देता है। पंच परिवर्तन इसी जागरण का शास्वत स्वर है, जो हमें अपने दायित्वों का बोध कराकर राष्ट्र निर्माण की उज्ज्वल दिशा दिखाता है।

अंततः यह कहा जा सकता है कि पंच परिवर्तन और नागरिक कर्त्तव्य एक-दूसरे से अविभाज्य हैं। जब नागरिक अपने कर्त्तव्यों के प्रति सजग होता है, तब परिवर्तन स्वतः सकारात्मक दिशा में प्रवाहित होता है। और जब परिवर्तन जीवन पद्धति बन जाता है, तब राष्ट्र केवल प्रगति ही नहीं करता, बल्कि एक आदर्श के रूप में विश्व के सामने स्थापित होता है। यही पंच परिवर्तन और नागरिक कर्त्तव्य से उपजने वाली राष्ट्र निर्माण की सनातन चेतना और आशावादी दिशा है।

उस दया निधि, करुणानिधि, सर्व सर्व शक्तिमान से प्रार्थना है कि

वह शक्ति हमे दो दयानिधे।

कर्त्तव्यमार्ग पर डट जावे।।

पर पीड़ा पर उपकार में हम। 

ये जीवन सफल बना जावे।।


लेखिका किसान पी.जी. कॉलेज, सिंभावली (हापुड़) चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ के अंग्रेजी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर है।