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भारतीय कालगणना

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भारतीय कालगणना 

ग्रीक गणितज्ञों ने जूलियन कलेण्डर बनाया था। रोमन सम्राट जूलियस सीजर ने इसे जारी किया था। जो एक जनवरी को अस्तित्व में आया था। यह पूर्व में गढ़े गये रोमन कलेण्डर का सुधार मात्र था। क्रिश्चियन समुदाय ने काल निर्धारण का आधार उसे ही मान लिया था। पर हर साल उन्हें क्रिशमस की तिथि तय करने में कठिनाई होती थी । जूलियन कलेण्डर केवल 10 माह का था । 15 अक्टूबर 1582 को दो माह और जोड़कर उसको ही तनिक संशोधित किया गया था। इसे पोप ग्रेगरी ने प्रतिष्ठापित किया । इस तरह क्रिश्चियन लोगों को सहजता से यह स्वीकार्य हो गया । इसे ही ग्रेगोरियन या जार्जियन कलेण्डर कहते हैं। भारतीय लोग सहज रूप से इसे अंग्रेजी कलेण्डर कह देते हैं, जो कि काल गणना के मानकों से बहुत अछूता है। 

एक बड़ा विश्व समुदाय यह मानता है कि इस कलेण्डर में भले कई सुधार किये गये तद्यपि इसके सृजन का कोई तार्किक, वैज्ञानिक अथवा सृष्टि से सम्बन्धित आधार नहीं है। इसलिए यह ग्रेगोरियन कलेण्डर पूरी तरह सुविधा और सत्ता समूहों के हठ पर टिका है। जबकि भारतीय वैदिक ऋषियों द्वारा प्रस्तुत की गयी काल गणना सर्वथा कालजयी और वैज्ञानिक तर्कों पर खरी है। तथापि दासत्व के कलंक ने सनातन संस्कृति की काल गणना को संसार में सर्वस्वीकार्यता नहीं मिलने दी । जिस तरह भारत की सर्वथा समृद्ध संस्कृत भाषा, समुन्नत वैदिक साहित्य और विविध विधाओं ,कलाओं को नकारा गया उसी तरह काल गणना के सनातन वैज्ञानिक सिद्धान्त को अस्वीकार्य ठहराया गया। भारतीय नववर्ष सृष्टि का नववर्ष है । यह बात  तार्किकता के सभी आकलनों पर पूर्णतः खरी है।

  वर्ष 2026 की 19 मार्च को सनातन संस्कृति तदैव भारतीय हिन्दू नववर्ष की प्रतिपदा है। यही सम्वत 2083 का प्रथम दिवस है। नवीन संवत्सर का नाम पिंगल है। चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा नवसंवत्सर का प्रथम दिन होता है। भारतीय गणितज्ञों, विद्वानों के परामर्श से इस पावन देश में छह प्रकार के संवत्सर प्रस्तुत किये गये। वैसे प्राचीन काल से 60 संवत्सर बने और प्रायः अस्वीकार्य हुए। इनमें विक्रम संवत सर्वाधिक मान्य किया गया। यद्यपि भारत सरकार ने शक संवत्सर को व्यवस्थागत अंगीकार किया । तथापि लोक व्यवहार के साथ शास्त्रीय गणना में विक्रम संवत की स्वीकार्यता है। शक और विक्रम दोनों संवत्सर की प्रतिपदा एक ही दिन पड़ती है। इतना ही नहीं अपितु भारत के सभी छह संवत्सर उसी प्रतिपदा से प्रारम्भ होते हैं। 

   भारतीय कालगणना इतनी सुस्पष्ट है कि सृष्टि के प्रथम दिन यानि जबसे सृष्टि का शुभारम्भ हुआ तब से सटीक गणना प्रस्तुत की जाती है। समय की जितनी सूक्ष्मतम गणना भारतीय ऋषियों ने प्रस्तुत की है उतनी अब तक कोई नहीं कर सका। हमारे ऋषियों ने ग्रहों, नक्षत्रों के आकार, उनकी गति और उनकी आयु तक की गणना करने के सूत्र सृजित किये हैं। नवयुग के खगोल विज्ञानी अब तक भारतीय ऋषियों की ओर से प्रस्तुत किये गये शोधों के निष्कर्षों पर निर्भर रहकर नाविन्य अनुसंधान करते आ रहे हैं। पाश्चात्य विज्ञानी सेकेण्ड को कालगणना की सूक्ष्मतम इकाई कहते हैं जबकि भारतीय ऋषियों ने एक सेकेण्ड के 1687 अंश तक सूक्ष्म इकाई बतायी है। जिसे त्रिशरेणु कहा जाता है। काल गणना की न्यूनतम से शीर्ष तक की जितनी सरलतम इकाईयां भारतीय शास्त्रों में मिलती हैं उतनी अन्यत्र अब तक सुलभ नहीं हो पायी हैं। भारत में जो छह संवत्सर यदा कदा प्रचलन में लाये गये वह हैं युधिष्ठिर संवत, विक्रम, शालिवाहन, विजयाभिनन्दन, नागार्जुन और कल्कि।

कालगणना में मुख्यतया प्रहर, दिन रात अहोरात्रि, पक्ष अयन संवत दिव्य वर्ष मनवंतर, युग, कल्प और ब्रह्मा की गणना की जाती है। युग का अर्थ सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग से है। इन युगों का आविर्भाव बार बार होता है। इसी पुनरागमन को काल का चक्रीय क्रम कहते हैं। सूर्य उदित होकर अस्त फिर उदित होता है । यही चक्रीय क्रम है। इसका अर्थ यह नहीं कि समय भी चक्रीय है। घटनाक्रम चक्रीय होता है जबकि काल अर्थात समय सीधी रेखा में गतिमान रहता है। घटनाक्रम चक्रीय है तथापि हर बार घटना नवीन होती है। चक्रीय अवधारणा के अनुसार ब्रह्मा की आयु का यह दूसरा खण्ड है। ब्रह्मा समय की शीर्षतम इकाई है। यह काल खण्ड श्वेतवराह कल्प का है। वैवस्वत मनवंतर का 28 वाँ कलियुग है। कलियुग की समाप्ति के बाद फिर सतयुग आएगा। तब त्रेता, द्वापर और तदन्तर 29 वाँ कलियुग होगा । उस कलियुग के अंत और फिर चक्रीय क्रम की चतुर्युगी अर्थात् सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग का क्रम पूरा होगा। भारतीय काल गणना के अनुसार धरती और जीवन की शुरुआत लगभग चार अरब वर्ष पहले हुई थी।

विक्रम संवत ईसा से 58 वर्ष पहले प्रारम्भ हुआ था। यह तथ्य पूरी तरह प्राचीन हिन्दू पंचांग पर आधारित है। भारत में प्रचलित सभी संवत्सरों में विक्रम संवत की स्वीकार्यता का बड़ा कारण इसकी काल गणनाओं का नितान्त त्रुटिरहित होना माना जाता है। विक्रम संवत के आधार पर सात दिन और 12 माह का प्रचलन प्रारम्भ हुआ। जिसे बड़ी स्वीकार्यता मिली। विक्रम संवत की गणना के इस आधार को बाद में यूनानियों, अंग्रेजों के साथ ही अरब जगत ने भी अंगीकार कर लिया। भारत के कई पंचांगों ने तो इसी विशेषता को अपने पंचांगों में अपना लिया। विक्रम संवत के अनुसार चैत्र मास को प्रथम मास मानने का वैज्ञानिक कारण है। बसन्त के आगमन के साथ प्रकृति का नवीन रूप सामने आता है। मानव ही नहीं जीव जन्तुओं, पक्षियों यहाँ तक कि जलचरों को नवजीवन मिलता है। पेड़ पौधों पर नयी पत्तियाँ फूल फल आने लगते हैं। सर्वत्र नवजीवन की लहरियां उफान पर होती हैं। ऐसे समय को भारतीय ऋषियों ने सर्वोत्तम माना और नवरात्रि के पर्व के साथ पूरी उमंग वर्षारम्भ में भर दी। जिसे समाज ने हर्ष पूर्वक स्वीकार कर किया। ऐसे ऋषियों के प्रति मानव सर्वदा कृतज्ञता व्यक्त करता रहेगा।

फाल्गुन में प्रकृति का एक चक्र पूरा होता है। यह मार्च का महीना होता है। यद्यपि अंग्रेजों के नववर्ष का पहला दिन एक जनवरी होता है पर उन्हें स्वीकारना पड़ा कि भारतीय गणना सर्वोत्तम है । इसीलिए वित्तीय नववर्ष 31 मार्च के बाद एक अप्रैल से शुरू किया जाने लगा। भारत में यह परम्परा पहले से रही है। नववर्ष से सभी व्यवसायिक गतिविधियों में भी नया उत्साह भर जाता है। इक्कीस मार्च को पृथ्वी सूर्य का एक चक्कर पूरा कर लेती है। भारतीय ऋषियों ने इसे पृथ्बी के नववर्ष के शुभारम्भ का दिन कहा है। अंग्रेज नये वर्ष का स्वागत 31 दिसम्बर की आधी रात को करते हैं। भारत में वर्ष के शुभारम्भ पर सूर्य की प्रथम किरणों के साथ नववर्ष का प्रथम दिन माना जाता है। भारत में नये दिन का प्रारम्भ प्रातः से होता है। आधी रात से नहीं । भारतीय पंचांग की तिथि का परिवर्तन नयी किरणों के फैलने के साथ होता है। हिन्दू पंचांग सौर, चन्द्र, नक्षत्र और सावन मास पर आधारित होता है। इस तरह भारतीय पंचांग गणना सभी अवधारणाओं को समाहित करती है। भारतीय अवधारणा में वर्ष को संवत्सर कहते हैं। सनातन संस्कृति के ऋषियों ने 60 संवतसरों को चक्रीय क्रम में रखा है। प्रत्येक का नामकरण किया है। इसी तरह 14 मनवन्तर होते हैं। इन सभी का नामकरण है। एक मनवन्तर में 30 करोड़ 68 लाख 20 हजार वर्ष होते हैं।

चार युगों की गणना के अनुसार सतयुग में चार चरण होते हैं। सतयुग की अवधि 17 लाख 28 हजार वर्ष होती है। त्रेता युग में तीन चरण होते हैं। इस प्रकार कुल 12 लाख 96000 वर्ष का त्रेता युग होता है। द्वापर में दो चरण होते हैं। इस तरह इसमें आठ लाख 64000 वर्ष होते है। कलियुग एक चरण का अर्थात चार लाख 32000 वर्ष का होता है। तीन चक्र जब इन चार युगों के बीत चुके होते है तब  एक महायुग कहा जाता है। ऐसे 71 महायुग पूरे होने पर एक मनवन्तर पूरा होता है।