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आपातकाल की पत्रकारिता - प्रो. अरुण कुमार भगत

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आपातकाल की पत्रकारिता - प्रो. अरुण कुमार भगत

सन् 1975 के आपातकाल में प्रेस की आजादी पर लगाए गए प्रतिबंधों को भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में स एक काला अध्याय माना जाता है। इस दौरान सरकार ने पत्रकारिता की आवाज पूरी तरह दबाने की कोशिश की। लेकिन आपातकाल के दौरान भी निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता जिन्दा रही और लोकतंत्र के प्रहरी की अपनी भूमिका निभाने में सफल रही। लोकतंत्र में प्रेस की स्वतंत्रता छीनने की कोशिशों को जनता ने देखा, समझा और इसका जवाब भी दिया। इसकी कीमत इंदिरा गांधी को अपनी सत्ता खोकर चुकानी पड़ी। आपातकाल के बाद हुए चुनावों में कांग्रेस बुरी तरह पराजित हुई और इंदिरा गांधी सत्ता से बाहर हो गयीं।

वर्ष 1974 तक पत्रकारिता के माध्यम से सत्ता और सरकार की सर्वत्र आलोचना हो रही थी। देश में भ्रष्टाचार, शैक्षणिक अराजकता, महंगाई और कुव्यवस्था के विरोध में समाचार-पत्रों में बढ़-चढ़ कर लिखा जा रहा था। गुजरात और बिहार में छात्र आंदोलन ने जन-आंदोलन का रूप ले लिया था जिसके नेतृत्व का भार लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने अपने कंधों पर ले लिया। उन्होंने पूरे देश में संपूर्ण क्रांति आंदोलन का आह्वान कर दिया था। यूं तो सन् 1975 से पहले भी देश में आपातकाल लगा था। सन् 1962 में साम्यवादी चीन के आक्रमण के समय और फिर उसके नौ साल बाद सन् 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय भी देश में आपातकाल की घोषणा करनी पड़ी थी। मगर उस वक्त प्रेस की आवाज दबाने की कोशिश नहीं की गयी थी। लेकिन वर्ष 1975 में जो हुआ, लोकतंत्र में उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी उस वक्त सत्ता के सिंहासन पर विराजमान थी। देश नीतियों पर नहीं, उनकी मर्जी पर ज्यादा चलता था। सत्ता की हनक उनके दिमाग पर सवार थी। ऐसे में राजनारायण बनाम इंदिरा गांधी मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इंदिरा गांधी के चुनाव को रद्द घोषित कर दिया। 12 जून 1975 का दिन ऐतिहासिक रहा। उस दिन एक प्रधानमंत्री के खिलाफ हाईकोर्ट का फैसला आया। कोर्ट ने इंदिरा गांधी को चुनावों में धांधली का दोषी पाया। अदालत ने उनके खिलाफ फैसला सुनाते हुए उनका चुनाव रद्द कर दिया। जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी को अगले छह सालों तक लोकसभा या विधानसभा का चुनाव लड़ने पर भी रोक लगा थी। इससे इंदिरा गांधी की संसद की सदस्यता खतरे में पड़ गयी। साथ ही उनके चुनाव लड़ने पर भी रोक लग गयी थी। फैसले से तिलमिलायी इंदिरा गांधी इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गयीं। 24 जून को सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर स्थगन आदेश तो दे दिया, लेकिन ये पूर्ण नहीं आंशिक स्थगन आदेश था। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था कि इंदिरा गांधी संसद की कार्यवाही में तो हिस्सा ले सकती हैं, लेकिन वोट नहीं डाल सकती। इसके बाद विपक्ष इंदिरा गांधी पर और ज्यादा हमलावर हो गया। इंदिरा गांधी के खिलाफ पूरे देश में माहौल बन रहा था। प्रेस भी प्रधानमंत्री पर लगातार प्रहार कर रहा था। ऐसे में इंदिरा गांधी को अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए था। लेकिन सत्ता के मद में चूर इंदिरा गांधी ने अपनी कुर्सी बचाने के लिए एक ऐसा कदम उठाया, जो भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में कलंक माना जाता है। 25-26 जून की आधी रात को देश में आपातकाल की घोषणा कर दी गयी। पूरा लोकतंत्र जंजीरों में जकड़ दिया गया।

इस आपातकाल में सबसे ज्यादा प्रहार प्रेस की आजादी पर ही हुआ। 26 जून को प्रेस सेंसरशिप लागू कर दी गयी। इस प्री-सेंसरशिप के बहाने पत्रकारिता की आवाज घोंट देने का कुत्सित प्रयास किया गया। अखबारों के दफ्तरों में अधिकारी नियुक्त कर दिए गए। बिना सेंसर अधिकारी की अनुमति के अखबारों में राजनीतिक खबरों को छापने पर रोक लगा दी गयी। सेंसरशिप का विरोध जताने के लिए कुछ अखबारों ने संपादकीय की जगह खाली छोड़ दी। ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता छीनने का प्रतीकात्मक विरोध था। कुछ अखबारों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में महापुरुषों की उक्तियां छापकर अपना विरोध जताया। एक अखबार ने तो शोक संदेश के कॉलम में छापा 'लोकतंत्र की 26 जून. 1975 को मृत्यु हो गयी।

प्रेस की स्वतंत्रता को पूरी तरह दबाने की कोशिश आपातकाल के दौरान की गयी। दिसंबर, 1975 को राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 123 के तहत अपनी शक्ति का प्रयोग करते हुए तीन अध्यादेश जारी किए। इनमें आक्षेपणीय प्रकाशन निवारण अध्यादेश, संसदीय कार्यवाही (प्रकाशन संरक्षण) अधिनियम निरस्त अध्यादेश और प्रेस परिषद अधिनियम अध्यादेश शामिल था। प्रेस सेंसरशिप और इन तीनों अध्यादेशों के माध्यम से सरकार ने प्रेस की आजादी को खत्म करने की ही कोशिश की थी। दरअसल, सरकार के मन में ये भय था कि प्रेस उसकी छवि जनता के बीच खराब कर सकता था। इसलिए प्रेस पर लगाम लगाने की हर संभव कोशिश की गयी थी। हाल यहां तक बुरा हुआ कि तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ल ने 28 जून, 1975 को संपादकों की एक बैठक बुलाकर उन्हें चेतावनी दी थी कि वे संपादकीय का स्थान रिक्त न छोड़े और उनमें कुछ ऐसा न लिखें जो सरकार विरोधी हो। यहां तक की आपातकाल के विरोध में लिखने की भी मनाही कर दी गयी।

प्रसिद्ध पत्रकार कुलदीप नैयर सहित लगभग 250 पत्रकारों को पूरे आपातकाल के दौरान गिरफ्तार कर लिया गया। 50 से ज्यादा पत्रकारों, कैमरामैन की सरकारी मान्यता रद कर दी गई। प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया भंग कर दिया गया। इतना ही नहीं आयकर, बिजली, नगरपालिका के बकाये की आड़ में अखबारों पर छापे डाले गए। बैंकों को कर्ज देने से रोका गया।

भारत में दूरदर्शन और रेडियो तो पहले से ही सरकारी नियंत्रण में थे। प्रेस सेंसरशिप और तीनों अध्यादेशों के बाद देशभर की पत्र-पत्रिकाओं पर अंकुश लगाने के तरीके जनविरोधी सरकार ने ढूंढ लिए थे। ऐसे में सरकार के पक्ष की खबरें तो लोगों तक पहुंच जाती थी। लेकिन सरकार विरोधी खबरें लोगों तक नहीं पहुंच पा रही थीं। ज्यादातर अखबारों में सरकारी विज्ञप्तियों को सहारे ही खबरों को छापने का विकल्प रह गया था। एक पक्षीय खबरों के ही छपने के कारण पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े होने लगे थे। लेकिन एकतरफा संचार का खामियाजा सरकार को भी भुगतना पड़ा। सरकार के विरोध की खबरें न छपने के कारण सरकार फील गुड फैक्टर की गलतफहमी में रह गयी और चुनाव होते ही जनता ने उसे जमीन पर औंधे मुंह गिरा दिया।

आपातकाल में सेंसरशिप के खौफ के कारण अनेक पत्र-पत्रिकाओं का असामयिक निधन हो गया। इंडियन एक्सप्रेस' और 'स्टेटसमैन' को परेशान करने के अनेक मामले सामने आए। आपातकाल के दौरान 3801 समाचार पत्रों के डिक्लेरेशन जब्त कर लिए गए। 290 अखबारों के विज्ञापन बंद कर दिए गए। जे.पी. आंदोलन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की व्यापक भागीदारी थी। इसलिए संघ से जुडी और उसकी विचारधारा का अनुसरण और अनुपालन करने वाली पत्र-पत्रिकाओं पर सबसे ज्यादा असर हुआ। पांचजन्य, आर्गेनाइजर, मदरलैंड (दैनिक), तरुण भारत विवेक विक्रम, राष्ट्रधर्म, युगधर्म इत्यादि को सील कर दिया गया था। इसके विपरीत संघ परिवार की ओर से बिहार में लोकवाणी, छात्रशक्ति, भारती इत्यादि पत्र भूमिगत तौर पर छप रहे थे तो हरियाणा में 'दर्पण' ने धूम मचा रखी थी। सरकार के इस दमन चक्र के बीच भी पत्रकारों ने अपनी हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने आपातकाल के खिलाफ संघर्ष किया। 3 जुलाई, 1975 को दिल्ली के प्रेस क्लब में लगभग 100 पत्रकारों ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए प्रेस पर सेंसर की निन्दा की और इसे हटाए जाने की मांग की।

आपातकाल के दौरान एक और जहां सत्ता और सरकार की चापलूसी करने वाले पत्रकार थे, वहीं दूसरी ओर प्रेस की आजादी के लिए संघर्ष करने वाले पत्रकारों की भी कमी नहीं थी। वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर देवेंद्र स्वरूप, श्याम खोसला, सूर्यकांत बाली, के. आर. मलकानी जैसे पत्रकारों ने तो जेल की यातनाएं भी भोगीं। इसके विपरीत ऐसे पत्रकारों की भी कमी नहीं थी, जिन्होंने सेंसरशिप को स्वीकार किया। यही स्थिति साहित्यकारों के साथ भी थी।

पत्र-पत्रिकाओं पर सेंसरशिप लगी तो पत्रकारिता के वास्तविक नायकों ने दूसरा रास्ता अपनाया। भूमिगत बुलेटिनों ने स्वतंत्र पत्रकारिता की कमी पूरी करने की कोशिश की। सरकार की नजरों से दूर, चोरी-छिपे ये पत्र छापे जाते और लोगों तक पहुंचाए जाते। इस कारण लोगों तक सही खबरें पहुंच पाती। आपातकाल के दौरान भूमिगत रुप से

दर्जनों समाचार बुलेटिनों का प्रकाशन शुरु हो गया था। प्रत्यक्ष रुप से प्रकाशित और वितरित होने वाले पत्र-पत्रिकाओं पर सेंसरशिप की लगाम कसने के कारण भूमिगत संचार-व्यवस्था समानांतर रुप से खड़ी हो गयी थी। जनता के बीच सरकार ने सूचना-संप्रेषण प्रक्रिया को छिन्न-भिन्न कर दिया था। एकतरफा संवाद ही संप्रेषित हो रहे थे। ऐसे में जनसरोकारों से जुड़े राष्ट्र के प्रति समर्पित और हिम्मती पत्रकारों ने गुप्त रुप से नियमित समाचार बुलेटिनों का प्रकाशन किया। इसके साथ ही पूरे देश में अलग-अलग स्थानों से विभिन्न प्रकार के हँडबिल, पर्चे, बुकलेट, पैफलेट इत्यादि निकालकर पुलिसिया दमन का कच्चा चिट्ठा खोल दिया गया। भूमिगत प्रचार तंत्र की उपलब्धि के संबंध में श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने लिखा है कि सेंसर और प्रचार-तंत्र के एकाधिकार से श्रीमती गांधी जनता को विपक्ष से पूरी तरह काट देना चाहती थीं। लेकिन हुआ इसका ठीक उलटा। सरकार के प्रचार तंत्र की विश्वसनीयता खत्म हो गयी। वहीं भूमिगत साहित्य ने विपक्ष को जनता से जोड़े रखा। भूमिगत प्रचारतंत्र का एक विस्तार विदेशों में था। इसी कारण सरकार का तानाशाही चरित्र विदेशों में छिप नहीं सका। विदेशों में रहने वाले लाखों भारतीयों, बुद्धिजीवियों और नेताओं ने तानाशाही के विरुद्ध भारतीय जनता के संघर्षका समर्थन किया।

इस प्रकार आपातकाल में यदि प्रत्यक्ष तौर से निकलने वाली पत्र-पत्रिकाओं पर सरकार ने अंकुश लगा दिया तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा समाजवादी पृष्ठभूमि से जुड़े कुछ पत्रकारों ने गुप्त रूप से पत्रिकाओं का प्रकाशन शुरू कर दिया था। इसके अतिरिक्त आपातकाल विरोधी साहित्य के रूप में सरकार के अत्याचारों से अवगत कराने के लिए कुछ बुकलेट, पैफलेट, हँडबिल, पर्चे इत्यादि बड़ी संख्या में निकलने लगे थे। भय और आतंक के उस माहौल में अंधेरे के विरुद्ध लड़ाई में ऐसी गुप्त पत्र-पत्रिकाएं प्रकाश स्तंभ का काम करती थीं। लोकनायक जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेताओं के संदेश भी इन पत्रकों में छपते थे, जो त्रासदी के उस कालखंड में कार्यकर्ताओं का उत्साहवर्धन करते थे और आंदोलनकारी परिवारों के लिए संबल का कार्य करते थे। कुल मिलाकर आपातकाल की भूमिगत पत्रकारिता ने एक समानांतर संचार व्यवस्था खड़ी कर दी थी।

(लेखक, बिहार लोक सेवा आयोग के सदस्य है)