संघ संस्मरण
मैं रहूँ न रहूँ राष्ट्र रहना चाहिए भाव से उपजता है राष्ट्रीय चरित्र – श्री गुरुजी
यह मेरा राष्ट्र है, मैं इसका अंश मात्र हूँ, इसकी भलाई मेरी भलाई है, मैं मरूँ, चाहे परिवार डूबे, किंतु राष्ट्र जिए, राष्ट्र अच्छा रहे'- यह भाव जब उत्पन्न होता है, तब राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण होता है। 'मेरे कार्य से भले लाभ न हो, पर कम से कम हानि तो न हो', यह भाव उत्पन्न होने पर चारित्र्य प्रकट होता है ।
जब यह विचार जाग्रत होता है और अहोरात्र राष्ट्र-चिंतन होता है, राष्ट्र को उठाने का, राष्ट्र को सुखी करने का, राष्ट्र के प्रत्येक व्यक्ति के प्रति कर्तव्यपूर्ति का विचार होता है। मैं अपने बारे में नहीं सोचूँगा, राष्ट्र सुखी है या नहीं केवल यही सोचूँगा, मैं रहा या न रहा, उससे क्या ? राष्ट्र रहना चाहिए- जब इस प्रकार का भाव जागृत होता है, तब इस राष्ट्र-प्रेम से परिपूर्ण राष्ट्र-कल्पना से विशुद्ध चारित्र्य उत्पन्न होता है।
||श्री गुरूजी समग्र, खंड-2, प्रथम संस्करण, सुरुचि प्रकाशन, पृष्ठ 78 ||




