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भारत की सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक नवसम्वत्सर

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भारत की सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक नवसम्वत्सर 

भारतीय नव वर्ष विक्रमी संवत का शुभारंभ भारत की संस्कृति और इतिहास का गौरवपूर्ण दिवस है। इसी दिन बासंतिक नवरात्र का भी शुभारंभ होता है। यह विडंबना ही है कि भारत में सभी पर्व त्योहार व विवाह आदि मंगल कार्य विक्रमी संवत की तिथियों के अनुसार ही किए जाते हैं, लेकिन इन तिथियों या चैत्र, बैसाख, ज्येष्ठ आदि 12 महीनों की जानकारी बहुत कम लोगों को रहती है। एक ओर तो आधुनिक जीवन शैली में भी इनको अव्यावहारिक मानकर इनको चलन से बाहर माना जा रहा है जबकि दूसरी ओर मंगल कार्यों के लिए उपयुक्त मुहूर्त की गणना कर इन्हें सम्पन्न किया जाता है। इसके लिए पंचांग दिखवाया जाता है। कुंभ जैसे हिंदू संस्कृति के बहुआयामी प्रतीक महा आयोजन की तिथियां यानी तारीखें भी पंचांग के आधार पर ही तय की जाती हैं। 

इससे जुड़ा एक बड़ा रोचक प्रसंग काफी चर्चित है कि यह पंचांग किस तरह भारत के लोगों को एक सूत्र में बांधे रखता है। भले ही वे अनेक विविधताओं से भरे हैं। ब्रिटिश शासन काल में एक बार कुंभ का आयोजन प्रयागराज में हो रहा था। उसमें देश के कोने-कोने से लाखों लोग एकत्र हुए थे। प्रतिदिन श्रद्धालुओं का रेला उसमें और शामिल होता जाता था। जिधर दूर-दूर तक नजर जाए मानव समुद्र हिलोरा मारता दिखता था। इसके बावजूद शांतिपूर्ण तरीके से संगम में स्नान व कोसों दूर तक फैले कुंभ क्षेत्र में सांस्कृतिक व धार्मिक क्रियाकलापों का आयोजन अनुशासित रूप में निरंतर चलता रहता था। इस आयोजन को देखने के लिए कुछ अंग्रेज पत्रकार भी वहां पहुंचे। उनके लिए किसी धार्मिक आयोजन में इतनी विशाल भीड़ अकल्पनीय थी कि एक निश्चित अवधि में निश्चित तारीखों पर देश भर से लाखों लोग कैसे इकट्ठे हो गए, इन सबको इसकी सूचना देना कितना कठिन रहा होगा कि लाखों लोग एक साथ वहां पहुंच गए। 

उन्होंने जिज्ञासावश किसी व्यक्ति से पूछा और कहा कि इसका प्रचार करने में तो बहुत धन खर्च होता होगा और देश के कोने-कोने तक इसकी सूचना पहुंचाने में भी काफी समय लगता होगा। तब प्रचार और सूचना संचार के साधन भी आज जैसे कहां थे कि एक एसएमएस क्लिक करने से देश भर में सूचना पहुंच गई। अंग्रेज पत्रकार परेशान कि इसका राज क्या है। तब उस आदमी ने जवाब दिया कि यह काम तो हमारा एक पैसे का पंचांग कर देता है। पंचांग में तिथियां, मुहूर्त सब तय रहता है। हमको प्रचार करने की या सूचना पहुंचाने की जरूरत ही नहीं पड़ती। सबको अपने-अपने घर में रखे पंचांग से पता चल जाता है कि कब क्या होना है। पत्रकार इस जानकारी से बड़ा हैरान हुआ कि यह छोटा सा पंचांग भारतीयों को इस कदर एक सूत्र में बांधे रखता है। 

वास्तव में यही भारत की सांस्कृतिक एकता का सूत्र रहा है एकः सूते सकलं। यानी विविध भाषा भाषी, विविधता खानपान और विभिन्न क्षेत्रों के बावजूद हमारी संस्कृति देशवासियों को एकात्मता के धागे में पिरोए रखती है। भारत की बहुसंस्कृतियों का देश कहकर लोगों को भ्रमित कर विखंडित करने का प्रयास यानी ‘डिवाइड एंड रूल’ अंग्रेजी शासनकाल से शुरू हुआ। उसी शैक्षणिक कुसंस्कार में ढले कुछ लोग जो अपने को प्रगतिशील और वामपंथी कहना पसंद करते हैं, आज भी इसी राग को अलापते हैं जिससे भारत की एकात्मता और सांस्कृतिक पहचान छिन्न-भिन्न होती दिखे जबकि भारत की कालगणना तो हमारी उसी एकात्म सांस्कृतिक चेतना का स्फुरण है जो हजारों वर्ष पूर्व हमारे ऋषियों ने जगाई। ऋग्वेद में 12 चंद्र मासों में पूरे साल को बांटे जाने का वर्णन है चैत्र, बैसाख, ज्येष्ठ आदि। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (इस साल 19 मार्च) को सृष्टि की शुरुआत का दिन भी माना गया है। ब्रह्म पुराण में इसका उल्लेख इस तरह आया है- चैत्र मासे जगत ब्रह्मा संसर्ज प्रथमोहनि/शुक्ल पक्षे समग्रेतु तदा सूर्योदय सति। यह संवत्सर का प्रारंभ यानि प्रथम दिन माना जाता है जो जीवन में सूर्योदय की प्रेरणा जगाता है ताकि जीवन में व्याप्त विकार, रोग, शोक, अज्ञान रूपी अंधकार दूर होकर सूर्य रश्मियों की भांति जीवन जगमगा उठे। आगे चलकर इसी दिन को विक्रमी संवत्सर का नाम मिला और भारतीय कालगणना में विक्रमी संवत का चलन शुरू हुआ जो उज्जयिनी के सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के नाम से पहचाना जाने लगा जिन्होंने आक्रमणकारी शकों को मार भगाया। उनके इसी पराक्रम को परिभाषित करने के लिए उन्हें शकारि विक्रमादित्य की उपाधि दी गई। देश व संस्कृति की रक्षा की प्रेरणा बने सम्राट विक्रमादित्य भारत की कालगणना में दर्ज कर दिए गए ताकि उनका स्मरण प्रतिवर्ष सम्वत्सर के दिन मानवीय गुणों व ऊर्जा का संचार करे। दरअसल संस्कृति और सभ्यता दो अलग-अलग मानक हैं। उन्हें एक करके देखना भ्रम पैदा करता है। भारत को बहुसांस्कृतिक देश कहा जाना देश की एकात्मता को खंडित करने के समान है। भारत विविधताओं में एकता वाला देश नहीं है, बल्कि जैसा हमारे ऋषियों ने कहा कि एको अहम बहुश्यामः। हम एक में से ही अनेक हुए हैं। एक ब्रह्म ही अनेक में रूपायित है। हमारी अनेकता में एकता नहीं है, हम एक में से अनेक हैं। यह जो ‘विविधता में एकता भारत की विशेषता’ नारा दिया जाता है, वह वास्तव में भारत को अंदर से तोड़ने का षड्यंत्र है कि हम भिन्न-भिन्न हैं। वास्तविकता यह है कि हम एक में से अनेक हुए हैं। इस बात को गंभीरता से समझने की आवश्यकता है। भारत विभिन्न सभ्यताओं का देश माना जा सकता है, लेकिन विभिन्न संस्कृतियों का नहीं। एक देश है एक संस्कृति एक हमारा नाता, कवि की ये पंक्तियां यही सन्देश देती हैं। एक कम्युनिस्ट बुद्धिजीवी की पुस्तक में लिखा गया है कि भारत तो अनेक पूर्वी पश्चिमी सभ्यताओं का मिश्रण है। हमारी प्राचीन सिंधु घाटी की सभ्यता विश्व को विकास और मानवता के उत्कर्ष का सन्देश है। इस प्रकार की  बातें ओपनिवेशक गुलाम मानसिकता को देशवासियों पर थोपने की कोशिश है जो भारत के स्वरूप को विखंडित और पिछलग्गू दिखाना चाहती है। हमारी प्राचीन सिंधु घाटी की सभ्यता विश्व को विकास और मानव जाति के उत्कर्ष का सन्देश है। सभ्यता तो जीवन शैली होती है जबकि संस्कृति जीवन मूल्यों का निर्धारण करती है। वास्तव में जीवन मूल्यों का संस्कार तो पूरे भारत में एक ही है, तभी तो उत्तर की गंगा का जल दक्षिण में रामेश्वरम पर चढ़ाकर जीवन को धन्य माना जाता है। 

हमारी इसी सांस्कृतिक चेतना को मानवीय चेतना कहा गया है। इसीलिए इस धरती से सर्वे भवंतु सुखिनः का उद्घोष हुआ। भारत वह देश है जिसने सारे विश्व को एक परिवार माना और हमारे ऋषियों ने कहा वसुधैव कुटुंबकम यानी पूरी वसुधा ही एक कुटुंब है। यजुर्वेद में पृथ्वी सूक्त में हमारे ऋषियों ने कहा माता भूमि पुत्रो अहम पृथिव्या। यह धरती हमारी मां है और समस्त मानव जाति इसकी संतान। मानवीय चेतना को समृद्ध करने, पोषित करने का एकात्मता का यह दृष्टिकोण भारत की धरती पर ऋषियों से प्रसूत है। सोच की यह व्यापकता हमारी संस्कृति ने हमें दी है। इसी सांस्कृतिक चेतना को निरंतर मजबूत किए जाने के लिए समय-समय पर सम्राट विक्रमादित्य जैसे प्रतिमान सामने आते रहे ताकि संस्कृति की प्रवाहमानता बनी रहे। आज की भाषा में कहें तो यह अपडेट होती रहे या नए दौर से कनेक्ट होती रहे। भारत की संस्कृति जड़ नहीं है। इसीलिए हमारी संस्कृति को चिर पुरातन और नित्य नूतन कहा जाता है। जो लोग हमें भ्रमित करने के लिए इसे पोगापंथ या दकियानूसी अथवा डोग्मा कहते हैं, वास्तव में वे भारत को ठीक से समझते ही नहीं या बड़ी चालाकी से हमें इससे दूर कर देना चाहते हैं। भारत की संस्कृति को जानने के लिए, समझने के लिए पहले भारत को जानना पड़ेगा। भारत को ‘इंडिया’ के नजरिए से नहीं जाना जा सकता। यह दृष्टिकोण अंग्रेजों ने बड़ी चालाकी से देशवासियों को अपने इतिहास और संस्कृति से काटने के लिए हमारे दिमाग में स्थापित करने की कोशिश की और आज भी उसी  गुलाम अंग्रेज मानसिकता के शिकार अनेक लोग भारत को उसी दृष्टिकोण से दुनिया के सामने प्रस्तुत करने की कोशिश करते हैं। कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी आपको यह कहते मिल जाएंगे कि हमें अंग्रेजों का शुक्रगुजार होना चाहिए कि उन्होंने हमें एक राष्ट्र के रूप में रहना सिखाया। उनको पता ही नहीं है कि भारत तो प्राचीन काल से एक राष्ट्र है। ऋग्वेद में राष्ट्र की संकल्पना को प्रस्तुत करते हुए कहा गया है ‘भद्रं इच्छन्ति ऋषयः स्वर विदः तपोदीक्षाम उपनिशे दुरग्रे/ ततो राष्ट्रे बलं ओजस जायतं तस्मै देवः उपनिशनते’ और   वयं राष्ट्रे जाग्रयाम पुरोहितः। जब अंग्रेजों के पुरखे भी नहीं पैदा हुए होंगे तब यह भारत राष्ट्र की संकल्पना हमारे ऋषियों ने की जो लोकमंगल के भाव से आपूरित है। भारत राष्ट्र की संकल्पना विश्व में मानवीय चेतना को एकात्म भाव से समृद्ध और पोषित करने के लिए प्रस्तुत की गई। यह जर्मन विद्वान फ्रिश्चे का ‘नेशन’ और ‘नेशनलिज्म’ नहीं है जिसमें से दुष्ट और अत्याचारी साम्राज्यवाद का जन्म हुआ जिसने सारी दुनिया में अनेक देशों और उनकी संस्कृति की पहचान मिटाने और मानवता को उत्पीड़ित करने का पाप किया। इसलिए भारत में फ्रिश्चे के राष्ट्रवाद को सामने रखकर भारत में राष्ट्र की संकल्पना को नहीं समझा जा सकता। फिर भी हमको यह सिखाया जाए कम्युनिस्ट विद्वानों के द्वारा कि भारत एक राष्ट्र था ही नहीं, इसे तो अंग्रेजों ने एक राष्ट्र के रूप में खड़ा किया। इससे बड़ा झूठ और क्या होगा। 

आधुनिक होने का अर्थ अपनी जड़ों से कटना नहीं होता। विक्रमी संवत हमें बस यही याद दिलाता है। नव संवत्सर से ही चैत्र नवरात्र प्रारंभ होते हैं। यह देवी दुर्गा की स्तुति, पूजा-अर्चना का महापर्व है। देवी को त्रिगुणमयी माना गया है। दुर्गा सप्तशती में देवी की आराधना करते हुए कहा गया है- हेतुः समस्त जगतां त्रिगुणापि दोषं/न ज्ञायसे हरिहरादिभिरप्यपारा / सर्वाश्रय अखिलमिदं जगदंशभूतं/ अव्याकृता हि परमा प्रकृति स्त्वमध्या। यानी हे देवी आप समस्त जगत की उत्पत्ति में कारण हैं, आप में सतोगुण रजोगुण और तमोगुण यह तीनों गुण मौजूद हैं। तो हमारे भी दोषों के साथ आपका संसर्ग नहीं जान पड़ता। भगवान विष्णु और महादेव आदि देवता भी आपका पार नहीं पाते। आप ही सब का आश्रय है। यह समस्त जगत आप का ही अंशभूत है क्योंकि आप सबकी आदिभूत अव्याकृता परा प्रकृति हैं। देवी हमारे जीवन और संस्कृति की आद्याशक्ति हैं। वह दैवीय शक्ति का संचार करती हैं और जितने प्रकार की आसुरी शक्तियां हैं जो मानवता के लिए विनाशकारी हैं, देवी उनको समूल नष्ट करती हैं। आसुरी शक्तियों को किसी जाति- मजहब से जोड़कर देखना उचित नहीं है। आसुरी शक्तियां प्रवृत्ति मात्र हैं, उन्हें अपने अंदर भी पनपने नहीं देना ही देवी की सच्ची आराधना है। यह विडंबना ही है की भारतीय संस्कृति को लांछित करने के लिए कुछ तथाकथित प्रगतिशील लोग महिषासुर दिवस भी मनाने लगे हैं। यह भी विडंबना है कि देवी के आराधक हमारे समाज में कंजक के रूप में कन्याओं का पूजन तो बड़े उल्लास से किया जाता है, लेकिन उसी कन्या के प्रति दैनिक जीवन में लड़कों के मुकाबले घृणित भेदभाव किया जाता है। स्त्रियों और बालिकाओं को दुराचार का शिकार बनाना या कोख में ही कन्या भू्रण की हत्या मानवता के प्रति सबसे बड़ा अपराध है। स्त्री का सम्मान और कन्याओं का प्रेम पूर्ण संरक्षण हम न सीख सके तो देवी की पूजा निरर्थक है। हमारे माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ का संदेश देकर इसी जीवन सूत्र को स्थापित करने का प्रयास किया है कि कन्याएं सिर्फ पूजने भर के लिए नहीं हैं। उन्हें प्यार और आदर से पालने पोसने से ही हमारी संस्कृति फलेगी फूलेगी। उनका न होना या उन्हें उत्पीड़ित किया जाना हमारे जीवन को विनाश के कगार पर ले जाएगा। नव संवत्सर का दिवस हमारे जीवन में आनंद, उल्लास और नई प्रेरणा लेकर आता है। यह दिन एक जनवरी को शुरू होने वाले नए साल पर मचने वाले मौज मजे के हुड़दंग का प्रतीक नहीं है। नवसम्वत्सर तो जीवन में गुण और संस्कार की नई कोपलें फूटने का संदेश देता है। नए सूर्योदय का उजास जीवन में भरता है ताकि हम मानवता की सेवा के लिए अपने को तत्पर करके महाकवि जयशंकर प्रसाद की ‘कामायनी’ में दिए गए इस संदेश को सार्थक करके मानवता के भाव बोध को और अधिक सशक्त कर सकें, कितनी सुंदर पंक्तियां मनु का संदर्भ लेकर महाकवि ने लिखी हैं। मनु को भारतीय संस्कृति में पृथ्वी पर प्रादुर्भूत प्रथम मानव के रूप में जाना गया है। उनके लिए यह दैवी संदेश इस धरा पर गुंजायमान हुआ जो भारत के जन जन के जीवन का संदेश बनना चाहिए- औरों को हंसते देखो मनु, हंसो और सुख पाओ/ अपने सुख को विस्तृत कर लो, जग को सुखी बनाओ। जग को सुखी बनाने का यह संकल्प ही भारतीय नव संवत्सर का उद्घोष है। शुभमस्तु।


लेखक कुशाभाऊ पत्रकारिता एवं संचार विवि., रायपुर, छत्तीसगढ़ के पूर्व कुलपति है।