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क्या बदल गया है बॉलीवुड ?

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क्या बदल गया है बॉलीवुड ?

अकादमिक हलकों में ‘बॉलीवुड’ शब्द का प्रयोग करने से बचा जाता है। इसे श्रेयकर नहीं माना जाता। इसका कारण साफ है। बॉलीवुड शब्द के प्रयोग से सम्पूर्ण भारतीय सिनेमा को इसमें फिट कर दिया जाता है। ये शब्द एक ऐसा कोरा संकेतक बन गया है जिससे भारतीय सिनेमा में आने वाली कोई भी चीज संकेतित की जा सकती है। ए अथीक, द क्रॉसओवर ऑडियंस, मीडिएटेड मल्टीकल्चरललिज्म एंड द इंडियन फिल्म में कहते हैं कि यदि बॉलीवुड अपने आप में भारतीय सिनेमा ना भी हो, तो भी इसे भारतीय सिनेमा के निर्यात ब्रांड के रूप में देखना ही चाहिए। 

बॉलीवुड का परवर्ती विस्तार उदारीकरण के युग में एक विशिष्ट उत्पाद के रूप में उभरा ,यह सिनेमाघरों की सीमाओं से परे नानाविध पर्दों पर और हजारों अलग अलग टुकड़ों में उदाहरण के लिए विज्ञापन, रिंगटोन, रियलिटी टीवी के उप-उत्पादों जैसे की फैबुलस लाइव्स ऑफ बॉलीवुड वाइव्स जैसे धारावाहिकों में देखा जा सकता है।

अब ये बॉलीवुड बदलता हुआ सा दिखाई देता है। इसका बड़ा कारण दर्शकों के पास भांति-भांति के स्क्रीन पर पहुँचता हुआ प्रयोगात्मक सिनेमा, ये सिनेमा ‘लोकल’ है। लोकल का आशय लोक में उपजी कहानियों से है। भाषा की सीमाओं से परे ये सिनेमा एक साथ विभिन्न भारतीय भाषाओं में प्रदर्शित होता है और सोशल मीडिया पर संवाद का हिस्सा बनता है।

सोशल मीडिया का ये समय हमारे सामने बहुतरे नए  ऑडियो-विसुअल कंटेंट को लाता है जो सांगठिक फिल्म समीक्षकों के दायरे से मुक्त है। पेशेवर फिल्म समीक्षकों के लिए इतनी बड़ी संख्या के ऑडियो विसुअल उत्पादन की समीक्षा कर पाना संभव भी नहीं अतः बॉलीवुड संकेतक फिल्मों की समीक्षाएँ तो प्रिंट मीडिया में दिखती हैं पर इसके पहचान से मुक्त सामग्री की जानकारी सोशल मीडिया पर ही प्राप्त की जा सकती है। कुछ समय पहले ही सोशल मीडिया पर एक फिल्म की समीक्षा ने केंद्र में आना शुरू किया, फिल्म का नाम है बारामूला:- 7 नवंबर 2025 को प्रदर्शित बारामूला शहर में एक पूर्व विधायक के बेटे सहित कई स्कूली बच्चों के रहस्यमय ढंग से गायब होने से शुरू होती है। इन घटनाओं में एक अजीब सफेद फूल (व्हाइट ट्यूलिप) का मिलना आम बात है, जिसे देखकर बच्चे खुद-ब-खुद किसी के पीछे चले जाते हैं। इन हाई-प्रोफाइल किडनैपिंग मामलों को सुलझाने के लिए डीएसपी रिदवान सैय्यद (मानव कौल) को बारामूला भेजा जाता है। वह अपनी पत्नी गुलनार (भाषा सुंबली) और दो बच्चों के साथ पुलिस द्वारा दिए गए एक पुराने सरकारी बंगले में रहने लगता है। जैसे-जैसे रिदवान मामले की जांच करता है, उसे पता चलता है कि ये सामान्य किडनैपिंग नहीं हैं, बल्कि अलौकिक शक्तियों से जुड़ी हुई हैं। जिस घर में रिदवान का परिवार रहता है, वहां गुलनार और उसके बच्चों को अजीबोगरीब साए और आवाजें सुनाई देती हैं। ये डरावनी घटनाएँ और बच्चों के गायब होने का रहस्य आपस में जुड़े हुए हैं। फिल्म धीरे-धीरे इन वर्तमान घटनाओं को 1990 के उस दर्दनाक अतीत से जोड़ती है, जब कश्मीरी पंडितों का नरसंहार हुआ था और उन्हें पलायन करना पड़ा था। घर के सायों का रहस्य खुलने पर पता चलता है कि वे उन पीड़ितों की भटकती आत्माएं हैं, जिन्हें न्याय नहीं मिला। फिल्म इस बात को दर्शाती है कि न्याय न मिलने पर पीड़ितों की आत्माएं किस तरह अलौकिक शक्तियों का रूप ले लेती हैं और अपने न्याय के लिए संघर्ष करती हैं। यह फिल्म हॉरर और थ्रिलर के माध्यम से कश्मीर के संवेदनशील मुद्दे और कश्मीरी पंडितों की अनकही पीड़ा को सूक्ष्मता से सामने लाती है। यह फिल्म नेटफ्लिक्स पर उपलब्ध है।

इस फिल्म को मेरे भीतर देखने की जिज्ञासा फेसबुक पर ‘नीलनाग’ नाम के एक फेसबुक अकाउंट पर आई  एक कविता से जागी। कविता कुछ इस प्रकार है:-

सारे कश्मीर पर आत्माओं का घेराव है।

हमारे पूर्वजों का क्रंदन वहाँ है वायुमंडल में अटका 

बर्फ गिरती है जब भी 

खून बिछता है उस पर तिलक - सा उनका 

जो वे लगाते हैं जीवित बचे कुछ सदस्यों की याद में 

सत्य और न्याय स्वतरू सिद्ध होगा 

कर्मफल की गोली विषाक्ततम है एके फोर्टी सेवन से भी।

आएगी वह हत्यारों के पास 

कि यह है उन बर्बरों के अंत का आरंभ 

कि धरा का अपना पुष्प होगा पुष्पित पुनः।

ये फ़िल्म और इसके ऊपर लिखी समीक्षा दो बातों की और संकेत करता है प्रथम ये की बॉलीवुड के परवर्ती विस्तार के इस दौर में सिनेमा विकेंद्रित हो रहा है। दूसरा विकेंद्रीकरण के इस दौर में फिल्म समीक्षाएँ अपने भीतर रचनात्मक और अकादमिक गुण लिए हुए हैं। ये बेहतर लिखी फ़िल्म समीक्षाएँ ही आगे चल कर बेहतर  दर्शक वर्ग और सिनेमाई विमर्श को जन्म देती हैं। 

बारामूला अपनी सिनेमाई शैली में कई तरह के प्रयोग करती है जैसे कि फिल्म में रंगों का प्रयोग कम है और ये फिल्म पार्श्व ध्वनि में लोक गीतों का प्रयोग करती है। अंतिम दृश्य अलग समय में एक ही स्थान पर घाट रही दो घटनाओं को संपादन कला के माध्यम से बखूबी जोड़ता है।

भारतीय सिनेमा में बदलते हुए कश्मीर को दिखाने की शुरुआत फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स (2022)’से हुई 1990 से पहले की फ़िल्मों में कश्मीर को मात्र एक लोकेशन के रूप में चित्रित किया जाता रहा। इसके माध्यम से दर्शकों के भीतर कश्मीर को लेकर एक उमंग उत्साह की निर्माती होती थी (कश्मीर की कली, सिलसिला, बॉबी) ये कश्मीर को दूर से देखने का एक तरीका था। 1190 के बाद कश्मीर पूर्णतः बदल गया। इसके बाद कश्मीर के ऊपर जो फिल्में बनीं, उसमे कश्मीर के आतंकवाद और उसकी समस्या पर बात की गई। हालांकि 1990 के बाद की कश्मीर केंद्रित फिल्मों ने आतंकवाद को ग्लोरिफाई भी किया। इन सभी फिल्मों से 1990 में कश्मीरी पंडितों के सामूहिक नरसंहार और निर्वासन जैसी महत्वपूर्ण घटनाएँ सिनेमा के कथानक में शामिल ही ना थी। ‘बारामूला’ और ‘द कश्मीर फाइल्स’ ने इस चाल को तोड़ा और कथानक के केंद्र में उनको स्थापित किया जो बरसों से शोषण का शिकार होते रहे हैं। ये कल्पनाशील और लोकप्रिय शैली के विपरीत वृत्तचित्रात्मक था जिसने बड़ी ही सहजता से तथ्यों और सन्दर्भों के माध्यम से कश्मीर में दशकों तक फैले आतंकवाद और अस्थिरता की मूल समस्या को उजागर किया।

2025 में ही प्रदर्शित शिवाजी सावंत के मराठी उपन्यास ‘छावा’ पर आधारित फिल्म ‘छावा’ भारतीय जनमानस से कोई हुए आख्यान को प्रस्तुत करती है। ये फिल्म मराठा साम्राज्य के दूसरे छत्रपति, संभाजी महाराज के जीवन और बलिदान को दर्शाती है। फिल्म उनके संघर्ष, गोरिल्ला युद्ध तकनीकों और मुगलों के खिलाफ लड़ाई पर केंद्रित है। फिल्म के एक्शन सीक्वेंस और युद्ध के दृश्य अच्छी तरह से कोरियोग्राफ किए गए हैं। ए.आर. रहमान का संगीत और बैकग्राउंड स्कोर कई  जगहों पर कहानी के भावनात्मक प्रभाव को बढ़ाने में सफल  रहा।

2025 में प्रदर्शित कांतारा चैप्टर 1 क्षेत्रीय सिनेमा की तरह ही भाषा, संस्कृति और इलाके के अंतः मिश्रण को ध्वनित करते हैं। भारतीय संदर्भों में क्षेत्रीय सिनेमा का इस्तेमाल बॉलीवुड से भिन्नता को दर्शाने के लिए किया जाता रहा है। यह फिल्म कर्नाटक की लोककथाओं, विशेषकर तुलुनाडु क्षेत्र की संस्कृति और श्दैवश् की पूजा से प्रेरित है, जो फिल्म का केंद्रीय आधार है. कहानी में प्रकृति, मानव, और देवी-देवताओं के बीच के गहरे संबंध को दिखाया गया है, जो सदियों पुरानी लोककथाओं का हिस्सा है।

जाहिर सी बात है इस सिनेमा का ‘लोकल’ इसकी  ‘ग्लोबल’ सफलता का कारण है।

इस बात को समझना भी जरूरी है की भारतीय सिनेमा अपने भीतर कुछ महत्वपूर्ण लक्षणों को लिए हुए है जाहिर है ये लक्षण ही उसे विषय के दूसरे सिनेमा से भिन्न बनाते हैं। उक्त फिल्मो की भी आख्यान प्रस्तुति में वही लक्षण देखे भी जा सकते है। ये फिल्में अपनी मौलिक कहन शैली को अपनाकर बड़े ही सचेत ढंग से भारतीय जनमानस में लंबे समय से कौंध रहे मुद्दों को ना सिर्फ उठाती है बल्कि उसका विश्लेषण भी करतीं हैं।


लेखक महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, फिल्म अध्ययन विभाग में प्रभारी है।