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सनातन संस्कृति की स्वीकार्यता

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सनातन संस्कृति की स्वीकार्यता

 

भारत की सत्य सनातन संस्कृति मानवता को प्रकाश देने वाली अमूल्य धरोहर है। यह संस्कृति सत्य, अहिंसा, करुणा, समरसता और धर्म के सार्वभौमिक सिद्धांतों पर आधारित है, जो जीवन को उच्च आदर्शों की ओर प्रेरित करती है। ऋषि-मुनियों की तपस्या, योग-ध्यान की साधना और वेदों की ज्ञानधारा ने इस संस्कृति को दिव्यता एवं गहराई प्रदान की है। सनातन संस्कृति न केवल आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग दिखाती है, बल्कि समाज में नैतिक मूल्यों, कर्तव्य-बोध और प्राकृतिक संतुलन को भी स्थापित करती है। यही संस्कृति भारत को विश्वगुरु बनने की शक्ति देती है और वैश्विक कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है। यही कारण है कि विश्व भर में सनातन संस्कृति की स्वीकार्यता लगातार बढ़ रही है। यह स्वीकार्यता केवल धार्मिक या आध्यात्मिक कारणों से नहीं, बल्कि उसके व्यापक, वैज्ञानिक, मानवीय और सार्वभौमिक दृष्टिकोण के कारण है। सनातन संस्कृति का अर्थ केवल पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं, बल्कि वह जीवन के हर क्षेत्र में संतुलन, समरसता और स्थिरता प्रदान करने वाला एक पूर्ण जीवन-दर्शन है।

ईश्वर को ही सृष्टि के रचयिता (ब्रह्मा), पालनकर्त्ता (विष्णु) तथा संहारकर्ता (महेश) माना गया है। 

”अस्य ब्रह्माण्डस्य समन्ततः स्थितान्यतादृशान्यन- न्तकोटिब्रह्माण्डानि सावरणानि ज्वलन्ति।“

अर्थात्, इस ब्रह्माण्ड (सृष्टि) के चारों ओर, इसी प्रकार के अन्य असंख्य करोड़ों ब्रह्माण्ड अपने आवरणों सहित प्रज्वलित हैं। यह अवधारणा आज का विज्ञान भी मानता हैं जो अन्य-अन्य रूपों में बतलाता रहता हैं। इसकी झलक सनातन संस्कृति में पृथ्वी लोक से उपर और नीचे बताया गयी हैं। उपरी सात लोक इस प्रकार है - भूर लोक, मुर लोक, स्वर लोक, महर लोक, ज्ञान लोक, तपो लोक, सत्य लोक और निचले सात लोक है -अतल लोक, वितल लोक, सुतल लोक, रसातल लोक, तथातल लोक, महातल लोक, पाताल लोक। लोक निर्माण में जो रचनात्मक शक्ति कार्य करती है वह सनातन धर्म की ईश्वरीय शक्तियों का संकलित रूप पुरुष अथवा प्रकृति हैं। पुरुष अथवा प्रकृति का स्वरूप त्रिगुणात्मक हैं। इनके तीन गुण हैं सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण। उसके ही आधार पर मानवीय गुण विकसित होते हैं और मनुष्य एक दूसरे से भिन्न होते हैं जैसे-जिस व्यक्ति का स्वरूप सात्विक हैं उसमें धर्म, ज्ञान, निः स्वार्थ भाव तथा विशिष्टता जैसे तत्व बहुलता में दिखते हैं। वहीं जिनमें रजो गुण की प्रधानता है वो धन और भक्ति के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। और जिनमें तमोगुण की प्रधानता रहती हैं अर्थात् तामसिक लोग अधर्मं, अज्ञान, लोभ, उदासीनता के धनी होते हैं।

ईश्वरीय सृजन के बाद इसके रख रखाव तथा सुचारू रूप से संचालित करने के लिए नैतिक व्यवस्थापक (Moral Governor) के कार्य की व्यवस्था की हैं। इसके तहत हमारे किए गए शुभ-अशुभ कार्यों का भी निर्धारण किया जाता रहा हैं। शुभ कर्मों के बदले शुभता या सुख तथा अशुभ कर्मों के बदले दुख प्रदान किया जाता है। इसे ही ईश्वर का अदृष्ट दंड प्रावधान अर्थात् कर्म सिद्धान्त कहा गया। इसी सिद्धान्त से प्रेरित होकर मनुष्य अपने कर्म को करता है जो आगे जाकर अपने स्वयं के जीवन के लिए उत्तरदायी होता हैं अर्थात् जैसे बीज को बोते हैं वैसे ही फल की भी प्राप्ति होती हैं। अन्य स्थानों पर फल की उत्पत्ति शक्ति-रूप में भी की गई हैं जो संचित कर्म के रूप में, प्रारब्ध कर्म के रूप में और सांचीयमान कर्म के रूप में प्राप्त होती हैं। संचित कर्म वह कर्म हैं जो अतीत के कर्मों से उत्पन्न होता हैं, परन्तु जिसका फल मिलना अभी शुरू नहीं हुआ हैं, वो कर्म अतीत से जुड़ा कर्म कहा गया हैं। प्रारब्ध कर्म वह कर्म है जिसका फल मिलना अभी शुरू हो गया है और अतीत जीवन से संबंधित हैं। वर्त्तमान जीवन के कर्मों का फल भविष्य में मिलना सांचीयमान कर्म बतलाया गया है। वर्त्तमान जीवन कुछ और नहीं अतीत के कर्मों का ही फल हैं तथा भविष्य वर्त्तमान जीवन के कर्मों का फल होगा। हिन्दुओं का मत है कि यदि हम दुखी हैं तो हमारे पूर्व जीवन के कर्मों से प्रभावित होकर है और यदि आगे के जीवन को सुखमय बनाना है तो अच्छे कार्यों के द्वारा समाज में परिवर्त्तन के लिए प्रयत्नशील रहना परमावश्यक हैं। जब कर्म राग, द्वेष एवं वासना से संचालित होते हैं या फिर वैसे कर्म जिसकी पूर्ति किसी उद्देश्य से की गईं हो, कर्म बंधन में आ जाते हैं। वहीं जो कर्म निष्काम होकर किए गए हों वे कर्म सिद्धांत से स्वंतत्र होते हैं, जिसे भगवान कृष्ण द्वारा गीता उपदेश में बताया गया हैं। 

पुनर्जन्म का विचार, कर्मवाद के सिद्धांत तथा आत्मा की अमरता से ही प्रस्फुटित होती हैं। आत्मा अपने कर्मों का हिसाब एक जीवन से दूसरे जीवन में प्रवेश कर फल को भोगकर करता है। पुनर्जन्म का सिद्धात, आत्मा की अमरता से फलित होता हैं। आत्मा नित्य और अविनाशी होने की वजह से ही मृत्यु के पश्चात् भी एक शरीर से दूसरे शरीर में प्रवेश कर सकती है। मृत्यु का अर्थ शरीर का अन्त है आत्मा का नहीं, इस प्रकार शरीर के अन्त के बाद आत्मा का दूसरा शरीर धारण करना ही पुनर्जन्म हैं। जीवात्मा को ईश्वर का अंश माना गया है। सनातन धर्म की स्वीकार्यता यह है कि संसार में रहकर सांसारिक विषयों के प्रति आसक्ति की भावना रखने के फलस्वरूप आत्मा बन्धन ग्रस्त हो जाती हैं तथा इस कारण जन्मों जन्म तक भटकना पड़ता है। ज्यों ज्यों आत्मा को आत्मज्ञान होता जाता है त्यों त्यों उसे यह विदित होता जाता है कि वह ईश्वर से अभिन्न हैं। जिस प्रकार मानव अपने प्रत्येक अवस्थाओं से होकर गुजरता है जैसे शैशवावस्था, युवावस्था, वृद्धावस्था, वैसे ही आत्मा भी प्रत्येक अवस्थाओं से गुजरता हैं जिसके बाद परमात्मा से साक्षात्कार होता है। ईश्वर के करीब होने का भान होना ही ईश्वरत्व की प्राप्ति होती हैं। जब तक आत्मा ईश्वर के साथ एकाकार का भाव नहीं ग्रहण कर लेती हैं तब तक उसे जन्म ग्रहण करते रहना आवश्यक हो जाता हैं। सनातनी इस सिद्धांत को बड़े ही आत्मीयता से स्वीकारते हैं और उससे प्रेरित होकर कार्यों को सम्पन्न करते हैं।

भगवद्गीता जो सनातनियों का प्रमुख आधार है उसमें इस सिद्धांत को बड़े ही सरल ढंग से महाभारत के रणक्षेत्र में समझाया गया हैं। सामान्य मनुष्य इस चक्र से अनभिज्ञ होता है परन्तु वहीं अवतारवादी पुरुष इन सारे चक्र को जानते- बूझते हुए अपनी लीलाओं को रचता हैं, जिस प्रकार राम-सीता ने रामायण रची तो वही कृष्ण-बलराम ने महाभारत इत्यादि। 

सनातन संस्कृति में अवतारवाद की स्वीकार्यता एक अलग प्रकार सें है जिनमें विष्णु के दशावतार प्रमुख हैं। जहां विष्णु के सारे अवतार अपनी एक सम्पूर्णता में जान पड़ते हैं। जिसका उद्देश्य है धर्म की स्थापना, सज्जन् स्त्री-पुरुषों का बचाव, दुर्जनों का खात्मा जिससे सृष्टि में संतुलन बना रहें। जिसे समय-समय पर भिन्न-भिन्न कर्मों के फल से समझाया गया हैं। इसके पीछे विश्व का कल्याण निहित हैं। इस स्वीकार्यता में  ईश्वर (उपास्य) और आत्मा (उपासक) के स्वरूप को जान लेने पर जोड़ देता हैं। ईश्वरीय ज्ञान नित्य हैं परन्तु जीवात्मा (Individual- self ) का ज्ञान अनित्य, आंशिक और सीमित है। उसके उलट ईश्वर अपने आप में हर प्रकार से परिपूर्ण हैं। जहाँ जीवात्मा शरीर में वास करती है और इसका सम्बंध होते हुए भी पूर्णतः भिन्न हैं। आत्मा का सम्बंध शरीर से कुछ व्यवहारिक गुणों की वजह से जान पड़ते हैं।

नैतिक स्थिति की दृष्टि से जीवात्मा तीन प्रकार की मानी गयी हैं वे हैं नित्य, मुक्त और बद्ध। नित्य जीव वे हैं जो निरन्तर मुक्त रहें हैं। ये कभी भी बन्धन ग्रस्त नहीं हो सके हैं, नारद मुनि और बालक प्रहलाद इस उच्च कोटि के उदाहरण हैं। मुक्त जीव उन आत्माओं को कहा जाता है जो कभी बन्धन ग्रस्त थे पर कालान्तर में मुक्त हो चुके हैं जैसे राजा जनक, गुरू वशिष्ट इसके उदाहरण माने जाते हैं। बद्ध जीव वो साधारण मनुष्य हैं जो निरन्तर जन्म और मृत्यु के बंधन में सदियों से चले आ रहे हैं। 

सनातन संस्कृति में मोक्ष की प्राप्ति की स्वीकार्यता, आत्मज्ञान तथा आत्मसाक्षात्कार से वशीभूत हैं। जिसके उत्तर में डॉ रामाकृष्णन ने कहां है ”ज्ञान की प्राप्ति सरलता से नहीं होती, इसको कठिन परिश्रम, बलिदान, अनुशासन, संघर्ष, तथा पीड़ा की सहनशीलता से प्राप्त किया जाता हैं“ ये सारी बातें धर्म और समाज में निहित नैतिक आयामों को बताते हैं। ज्ञान को भी बड़े ही विस्तृत भाव के साथ अपनाया जाता हैं जहां ज्ञान विचार भावना और इच्छाओं का मिलाजुला स्वरूप हैं। जो इस प्रखर ज्ञान के धारणा का रूप लेता हैं। डा. कृष्णन् का यह मानना है कि हमारा सत्य बोध तब तक अन्तिम नहीं होता जब तक वह पूर्ण न हो जाए, साथ ही इसकी पूर्णता हमारे समस्त विचार, अनुभूति तथा इच्छाओं से बंधी होती है। यही कारण है कि ज्ञान की महत्ता होने के बाबजूद हिन्दुत्व में नैतिकता के लिए स्थान रह ही जाता है।

मोक्ष की स्वीकार्यता जीवन का सबसे बड़ा सत्य तथा परमानन्द माना गया है। जहां सांख्य दर्शन ने ज्ञान को मोक्ष का साधन माना है और जिसे सिर्फ कर्म के द्वारा पाना सम्भव नहीं हैं। ज्ञान के प्रकाश से अज्ञान, इच्छा, धर्म और अधर्म से उत्पन्न दुःखों के कारण का विनाश होता हैं। मोक्ष को पाने के लिए चार मार्गों को बतलाया गया है (वे मार्ग है- राज योग, ज्ञान योग, कर्म योग और भक्ति योग), जिसे व्यक्ति जीवन में अपनाकर मोक्ष प्राप्ति की ओर अग्रसर होता है। यहां पर धर्म का दृष्टिकोण उदार और व्यापक हैं। राजयोग के अन्तर्गत भूमि नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार धारणा, ध्यान और समाधि हैं। ज्ञान-योग में ज्ञान के द्वारा मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। यहां ज्ञान का अर्थ दार्शनिक ज्ञान के रूप में लिया जाता हैं, जिसे अत्यन्त् कठिन मार्ग बतलाया गया हैं। यह प्रबुद्ध व्यक्ति का मार्ग होता हैं जो अपने ज्ञानार्जन से अपने मंजिल को तय करने की चेष्ठा करते हैं। इस मार्ग मे अपने विवेकानुरूप किसी न किसी रूप में कर्म योग, राज योग व भक्ति योग का पालन करना पड़ता हैं। कर्म मार्ग में ऐसे कर्म के लिए प्रेरित करता है जो निष्काम कर्म की श्रेणी में आते हैं, वहीं भक्ति मार्ग में व्यक्ति की निष्ठा ईश्वरीय शक्ति मैं होती हैं जैसे मीराबाई। 

सनातन संस्कृति में गुरु शिष्य परम्परा का विशेष स्थान है। प्रत्येक दर्शन में एक ऋषि गुरु के रूप में होते हैं, जो अपने सिद्धांतों को सूत्रबंध करते हैं और उनको प्रामाणिक माना जाता रहा है। इन्हीं सूत्रों और भाष्यों पर प्राचीन दर्शनशास्त्र आधारित हैं। जिसका उद्देश्य एक ही है, मनुष्यों को जीवन का उद्देश्य समझना और उन कर्मों की समाप्त करना जो दुख का कारण हैं जिसके नष्ट होने से दुःखों से मुक्ति मिलती हैं और मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता हैं। यहां दया, करूणा, संयम, सहनशीलता भी बतलाया जाता हैं जो हमें गलत कार्य के लिए पश्चाताप करने की प्रेरणा देते है। इतना ही नहीं जीवन के प्रत्येक मोड़ पर गिरकर फिर से उठकर खडे होने की ताकत देता हैं। समाज से बहिष्कृत एक पापी मनुष्य भी ईश्वर के शरण में अपने कर्मों का प्रायश्चित कर सकता है और भव सागर से पार पा सकता हैं।

सनातन परम्परा मानवीयता और जीवन मूल्य का विस्तृत उदाहरण हैं। माना जाता है भारत में सनातन के साथ ही मूल्य आधारित जीवन का प्रांरभ हुआ है जो कभी नष्ट नहीं होगा क्योंकि सनातन संस्कृति नित नूतन, चिर पुरातन संस्कृति है। जो प्राचीन भी है और परिवर्तनशील भी है। उदाहरण के लिए हम प्रकृति से यदि एक लोटा जल प्राप्त करते हैं तो उसके लिए प्राकृति के उस रूप को धन्यवाद देते हैं या अनुमति लेते हैं।  यथा अन्न की पहली मुठी पक्षियों की, दो चुटकी आटा चीटियों का, पहली रोटी गाय की, पहली थाली बुजुर्गों को और जो बच गया वह परिवार का, यही हमारी सनातन संस्कृति है और यही हमारे जीवन मूल्य भी। जो चिर काल से चले आ रहे हैं और साथ ही पीढी दर पीढ़ी हम इन्हें आदान-प्रदान भी कर रहें हैं।

इसकी यही अनुपमता और अनूठापन, इसकी विविधता में एकता के रूप को प्रस्तुत करते हैं। यह अपने में अनेक उपसंस्कृतियों और सम्प्रदायों को समेटे हुए हैं। इसे ही विविधता में एकता का समावेश कहा जाता है। भारतीय समाज सनातन संस्कृति की वेवाक झलक प्रस्तुत करती रहा है जो धार्मिक एवं सामाजिक रूप से समरसता और समानता की प्रेरणा देता है। यही विशेषताएं भारतीय समाज को विश्व पटल पर अपनी अलग पहचान दिलवाती है जो विश्व कल्याण के लिए संस्कृतिक संरक्षण एवं प्रगति में मदद करती हैं। हम यह भूल नहीं सकते कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश हैं जिसमें अनेक धर्म और संस्कृति मौजूद हैं जहां प्रत्येक धर्म की अपनी विशेषता हैं। भारतीय संविधान के अनुसार भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश बन पाया इसके पीछे भी सनातन संस्कृति ही है जो इसकी लचीलेपन में को दिखाती है। हैं।

भारतीय संस्कृति की इतनी अनूठी व विविध विशेषताओं के कारण ही न केवल भारत मे बल्कि सम्पूर्ण विश्व मे भारतीय संस्कृति की स्वीकार्यता बढ़ी है। इतना ही नही लोग भारतीय संस्कृति एवं मूल्यों को अपने दैनिक व्यवहार में भी अपना रहे है। भारत की सत्य सनातन संस्कृति का ज्ञान विज्ञान ,खगोल विज्ञान और आध्यात्मिक मनोविज्ञान आज आधुनिक शोध का विषय बन रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 21 जून को योग दिवस घोषित किया जाना सनातन संस्कृति की वैश्विक स्वीकार्यता का सर्वाेत्तम उदाहरण है। आयुर्वेद की लोकप्रियता निरंतर बढ़ रही है एवं प्रकृति के प्रति सम्मान को संपूर्ण विश्व गंभीरता से ले रहा है। भारतीय संस्कृति के मूल में निहित ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ और ‘सर्वे भवंतु सुखिनः’ पर सब की आस्था बढ़ती जा रही है। ऐसी आशा ही नही बल्कि पूरा विश्वास है कि भारत की सनातन संस्कृति युगों युगों तक विश्व को अपने ज्ञान एवं विज्ञान के प्रकाश से आलोकित करती रहेगी।


लेखक  दिल्ली विवि के दीनदयाल उपाध्याय कॉजेल में  सह प्राध्यापक है।