मोतिहारी, बिहार
संघ शताब्दी वर्ष के निमित्त राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, चंपारण की ओर से रैमसन प्लाजा में आध्यात्मिक एवं धार्मिक नेतृत्व संवाद का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह-सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल जी मुख्य वक्ता रहे। आध्यात्मिक- धार्मिक संवाद में चंपारण विभाग के विभिन्न क्षेत्रों से मठों के महंत, साधु, सन्यासी, कथा वाचक विभिन्न आध्यात्मिक संगठनों प्रमुख गुरुद्वारा के ग्रंथी इत्यादि ने भाग लिया। संवाद कार्यक्रम में 57 मठों के महंत, 22 विभिन्न आध्यात्मिक संगठनों के प्रमुखों तथा कथावाचकों ने भाग लिया। संवाद का उद्देश्य सनातन परंपरा, भारतीय संस्कृति, सामाजिक समरसता तथा वर्तमान सामाजिक परिदृश्य में आध्यात्मिक नेतृत्व की भूमिका पर विचार-विमर्श रहा।
कार्यक्रम का शुभारंभ भारत माता के चित्र पर पुष्पार्चन के साथ हुआ। इसके पश्चात मंचासीन अतिथियों का परिचय दिया गया। सह प्रांत संघचालक प्रो. राजकिशोर जी ने संघ शताब्दी वर्ष के निमित्त विभिन्न कार्यक्रमों की जानकारी दी।
सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल जी ने भारतीय संस्कृति, सनातन जीवन-दृष्टि और समाजजीवन में आध्यात्मिक मूल्यों की भूमिका से जुड़े विषयों पर मार्गदर्शन किया। उन्होंने सनातन परंपरा और संत-समाज की महत्ता के संदर्भ में विचार प्रस्तुत किए। भारतीय परंपरा में साधु-संतों की भूमिका केवल आध्यात्मिक मार्गदर्शन तक सीमित नहीं रही है, बल्कि उन्होंने समाज को संस्कारित करने, जीवन मूल्यों को सुरक्षित रखने और लोकमंगल की भावना को जागृत करने में भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। संत-परंपरा भारतीय समाज की सांस्कृतिक चेतना की संवाहक रही है। ऐसे में संतों और सामाजिक-सांस्कृतिक क्षेत्र में कार्यरत संगठनों के बीच संवाद समाजहित के विभिन्न विषयों पर परस्पर समझ और समन्वय को मजबूत करने का माध्यम बन सकता है।
डॉ. कृष्ण गोपाल जी ने कहा कि सनातन परंपरा के मूल में सेवा, सदाचार, करुणा, आत्मानुशासन और लोक कल्याण जैसे जीवन मूल्य निहित हैं। इन मूल्यों का सामाजिक जीवन में आचरण ही समाज में सद्भाव, आत्मीयता और उत्तरदायित्व की भावना को सुदृढ़ करता है। आध्यात्मिक नेतृत्व का मार्गदर्शन इन मूल्यों को जनजीवन में प्रतिष्ठित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
बौद्धिक के पश्चात पूज्य साधु-संतों के साथ संवाद आयोजित हुआ। संवाद कार्यक्रम में विभिन्न संतों आध्यात्मिक एवं धार्मिक नेतृत्वकर्ताओं ने अपने-अपने विचार प्रस्तुत किये। मठ-मंदिर के कार्यों तथा समाज के प्रति उनके योगदान पर भी संतों और महात्माओं ने विचार रखे।
संतों ने अपने-अपने मठों, मंदिरों एवं आध्यात्मिक संगठनों की वर्तमान स्थिति तथा समसामयिक सामाजिक परिदृश्य से जुड़े विषयों पर विचार साझा किए। संतों ने आध्यात्मिक संस्थाओं की भूमिका, समाज के साथ उनके जुड़ाव और वर्तमान समय में धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण से संबंधित अनुभवों को सामने रखा। कार्यक्रम का समापन कल्याण मंत्र के साथ हुआ।



