नागपुर
भारतीय शिक्षण मंडल द्वारा धनवटे नेशनल कॉलेज, नागपुर में व्यास पूजन का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में भारतीय शिक्षण मंडल के संगठन मंत्री बी. शंकरानंद जी ने कहा कि व्यास पूजन केवल महर्षि वेदव्यास का स्मरण करने का कार्यक्रम नहीं है, बल्कि उनके विचारों, आदर्शों एवं जीवन मूल्यों को अपने जीवन में उतारने का संकल्प है। मनुष्य के जीवन को ज्ञान दिशा देता है और ज्ञान प्रदान करने वाला गुरु होता है, इसलिए भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान अनन्य एवं सर्वोच्च है।
उन्होंने कहा कि गुरु कोई पद, उपाधि अथवा प्रबंधन व्यवस्था नहीं है। सच्चा गुरु वही होता है जो जीवनभर सीखता रहता है और अपने ज्ञान, आचरण एवं व्यक्तित्व से समाज का विश्वास अर्जित करता है। गुरु वह है, जिसके सान्निध्य से व्यक्ति को अपने जीवन के उत्थान का विश्वास प्राप्त हो। ‘गुरु’ शब्द की व्यापकता इतनी है कि उसका पूर्ण अर्थ किसी अन्य भाषा में व्यक्त नहीं किया जा सका है और अनेक देशों ने इसे मूल रूप में ही स्वीकार किया है।
शंकरानंद जी ने श्रीकृष्ण जी का उल्लेख करते हुए कहा कि गुरु-शिष्य का संबंध अद्वितीय है। प्रत्येक व्यक्ति को सजीव एवं निर्जीव सभी माध्यमों से सीखने की दृष्टि, स्वभाव और मानसिकता विकसित करनी चाहिए। यदि विद्यालयों के साथ-साथ बैंक, उद्योग, व्यापारिक प्रतिष्ठानों तथा समाज के प्रत्येक संस्थान में भी गुरु-तत्त्व का सम्मान और व्यास पूजन प्रारंभ हो जाए, तो भारत को पुनः विश्वगुरु बनने से कोई नहीं रोक सकता।
उन्होंने यज्ञमय जीवन का अर्थ समझाते हुए कहा कि जीवन केवल अपने लिए नहीं, बल्कि परहित एवं लोकमंगल के लिए समर्पित होना चाहिए। स्वामी विवेकानंद के संदेश “Be Good, Do Good” का उल्लेख करते हुए स्वयं को श्रेष्ठ बनाने और समाज के लिए उपयोगी बनने का आह्वान किया। यज्ञ का वास्तविक स्वरूप अपने अहंकार अर्थात् ‘मैं’ का त्याग करना है।
उन्होंने कहा कि पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन जीने की पद्धति है। जब प्रत्येक कर्म को पूजा का भाव देकर किया जाता है, तब मनुष्य ‘नर’ से ‘नारायण’ बनने की दिशा में अग्रसर होता है। प्रत्येक उत्सव को आनंद, उत्साह एवं उत्कृष्टता के साथ मनाना चाहिए ताकि उसका वास्तविक उद्देश्य समाज तक पहुँच सके। कार्यक्रम अत्यंत प्रेरणादायी, चिंतनशील एवं भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रति श्रद्धा जागृत करने वाला रहा।



