नई दिल्ली। केशव स्मारक समिति के तत्वाधान में आयोजित संगोष्ठी एवं पुस्तक चर्चा में विचारक एवं अभिलेखागार प्रमुख अजय कुमार जी ने कहा कि नारी सशक्तिकरण जैसे नारों की भारत की धरती पर कोई आवश्यकता नहीं है। सशक्त महिला भारत के मूल में है, भारत की परंपरा में है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि हम ज्ञान के लिए मां सरस्वती, धन-संपत्ति के लिए मां लक्ष्मी, और शक्ति के लिए मां दुर्गा की आराधना परंपरा से करते आए हैं। हमने महिला को पूजनीय माना है।
उन्होंने कहा कि संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार जी ने भी कहा था कि संघ का विचार कोई अलग या नया विचार नहीं है। लाखों वर्ष से चली आ रही परंपरा ही संघ का विचार है। केवल कार्य करने का तरीका नया है। संघ में स्त्री अलग है, ऐसा कोई विचार नहीं है। हमने कभी अलग करके नहीं देखा। जितने पुरुष संघ में हैं, उतनी ही महिलाएं भी संघ में हैं।
शनिवार को केशव कुंज स्थित केशव पुस्तकालय में शतायु संघ और महिला सहभागिता पर चर्चा का आयोजन किया गया था। इस अवसर पर संकलनकर्ता डॉ. शोभा विजेंद्र सहित विभिन्न संस्थानों के पुस्तकालय अध्यक्ष, कॉलेज प्राचार्य, शोधार्थी उपस्थित रहे।
डॉ. शोभा विजेंद्र ने कहा कि अक्सर देश में भी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संघ को लेकर चर्चाओं में, संघ के बारे में अल्प ज्ञान रखने वाले तर्क देते हैं कि संघ में महिलाओं का स्थान नहीं है, उन्हें चूल्हे चौके तक सीमित रखा है। पर, वास्तव में ऐसा नहीं है। संघ के विचार में महिलाएं अलग नहीं हैं। महिला राष्ट्र की चेतना को जगाने का काम करती है। संघ ने भी 100 वर्ष की यात्रा के दौरान उत्साहवर्धन किया है। संघ सनातन के विचार, इस देश के विचार को ही आगे बढ़ा रहा है, यही संघ का विचार है। अपनी जड़ों को मत भूलो, संघ यही आग्रह करता है।
उन्होंने कहा कि सरसंघचालक मोहन भागवत जी ने कई बार स्पष्ट किया है कि संघ में जितने स्वयंसेवक हैं, उतनी महिलाएं हैं। संघ में शामिल प्रत्येक स्वयंसेवक की मां, पत्नी और बहन संघ से जुड़ी होती है। संघ की दृष्टि में मातृशक्ति के बिना कोई भी कार्य संभव नहीं है। महिलाएं दशकों से संघ के वैचारिक, सांस्कृतिक, संगठनात्मक कार्यों में अग्रणी भूमिका निभा रही हैं।
पुस्तक में हर वर्ग, पृष्ठभूमि की महिलाओं के अनुभवों का संकलन किया गया है। इसमें संघ परिवार सं संबंधित और संघ परिवार से अलग विचार के संपर्क में आने वाली महिलाओं के अनुभवों को भी शामिल किया गया है।