जबलपुर, मध्य प्रदेश
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जबलपुर महानगर के तत्वाधान में साहित्यकार एवं इतिहासकार श्रेणी की प्रमुख जन गोष्ठी तथा ‘संघिका’ पुस्तक के प्रथम भाग का विमोचन कार्यक्रम श्री जानकीरमण महाविद्यालय में संपन्न हुआ। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य सुरेश जी सोनी, मुख्य अतिथि शरदचंद जी पालन, विशिष्ट अतिथि विभाग संघचालक कैलाश गुप्ता जी उपस्थित रहे।
मुख्य वक्ता सुरेश सोनी जी ने कहा कि संघ एक उद्देश्य के साथ प्रारंभ हुआ था और शताब्दी मनाना उसका लक्ष्य नहीं रहा। भारत का प्राचीन दर्शन और संस्कृति विश्व के लिए कल्याणकारी है, किंतु कालक्रम में यह खंडित हो गई, जिसे पुनः स्थापित करना संघ का उद्देश्य है। यह यात्रा अपने लक्ष्य की प्राप्ति तक निरंतर चलती रहेगी।
कार्यक्रम का शुभारंभ भारत माता की अर्चना एवं वंदे मातरम गायन से हुआ, जिसे श्री जानकी बैंड ने प्रस्तुत किया। अतिथि परिचय डॉ. अभिजात कृष्ण त्रिपाठी ने दिया। इस अवसर पर डॉ. आनंद सिंह राणा द्वारा लिखित, महाकौशल प्रांत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इतिहास पर आधारित पुस्तक ‘संघिका’ के प्रथम भाग का विमोचन किया गया। पुस्तक का परिचय एवं समीक्षा दीपक द्विवेदी ने प्रस्तुत की तथा कार्यक्रम की प्रस्तावना प्रो. अल्केश चतुर्वेदी ने रखी।
मुख्य अतिथि शरदचंद पालन ने राष्ट्र निर्माण में साहित्यकारों और इतिहासकारों की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया। कार्यक्रम में एकल गीत की प्रस्तुति नूपुर देशकर ने दी।
सुरेश सोनी जी ने कहा कि संघ का कार्य तब तक चलता रहेगा, जब तक समाज और संघ एकरूप नहीं हो जाते। शताब्दी वर्ष के निमित्त समाज के साथ व्यापक संपर्क और संवाद किया गया है। स्वामी विवेकानंद के उदाहरण का उल्लेख करते हुए कहा कि शिकागो सम्मेलन से पूर्व उन्होंने दो वर्षों तक भारत का भ्रमण कर समाज की वास्तविकता को समझा और निष्कर्ष निकाला कि व्यक्ति निर्माण, समाज की एकता और राष्ट्रभाव जागरण आवश्यक है। संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार ने इन विचारों को व्यवहार में उतारा।
सोनी जी ने स्वतंत्रता आंदोलन की विभिन्न धाराओं – क्रांतिकारी, अहिंसक एवं सैन्य प्रयासों – का उल्लेख करते हुए कहा कि समाज परिवर्तन के लिए केवल राजनीतिक संघर्ष पर्याप्त नहीं, बल्कि सामाजिक सुधार भी आवश्यक है। डॉ. हेडगेवार ने सभी धाराओं को समझते हुए संगठनात्मक कार्य को आगे बढ़ाया।
उन्होंने कहा कि आज समाज का मूल दोष आत्मकेंद्रित होना है, जबकि सनातन संस्कृति विश्व कल्याण की भावना पर आधारित है। संघ की शाखाएं इसी उद्देश्य को व्यवहार में लाने का माध्यम हैं और आज देशभर में 80,000 से अधिक स्थानों पर नियमित शाखाएं संचालित हो रही हैं। संघ की वैचारिक प्रेरणा से विभिन्न संगठन जैसे भारतीय मजदूर संघ, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, सेवा भारती आदि कार्य कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि दीर्घकालीन प्रयासों से समाज में जागरण आया है और सांस्कृतिक एकात्मता के प्रयासों से राम मंदिर जैसे कार्य पूर्णता तक पहुंचे हैं। यद्यपि लक्ष्य अभी पूर्णतः प्राप्त नहीं हुआ, किंतु अनुकूल वातावरण निर्मित हुआ है।
सुरेश सोनी जी ने हिन्दुत्व को विश्व के संकटों का समाधान बताते हुए कहा कि वेदों से लेकर भक्ति काल के संतों तक सभी ने संपूर्ण सृष्टि के कल्याण की भावना व्यक्त की है। “एकम् सत् विप्रा बहुधा वदंति” का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि सत्य एक है, अभिव्यक्तियां अनेक हैं। भारत की परंपरा विविधता में एकता की है, जहां भिन्न मतों के बावजूद समन्वय की भावना रहती है। भाषा को केवल अभिव्यक्ति का माध्यम बताते हुए कहा कि नरसी मेहता, त्यागराज, कबीर, सूरदास और शंकरदेव जैसे संतों का भाव एक ही रहा, भले ही उनकी भाषाएं अलग-अलग थीं। उन्होंने कहा कि यदि समाज जीवन से धर्म का लोप हो जाए तो मानव पशु के समान हो जाएगा, इसलिए धर्म का अधिष्ठान आवश्यक है। उन्होंने कहा कि भारतीयता की स्थापना के लिए पांच क्षेत्रों में परिवर्तन आवश्यक हैं।
उन्होंने पश्चिमी व्यक्तिवाद की तुलना भारतीय परिवार व्यवस्था से की और संयुक्त परिवार, सामूहिकता तथा “वसुधैव कुटुंबकम्” की भावना को भारतीय जीवन का आधार बताया। समरसता पर बल देते हुए कहा कि तत्वज्ञान में सभी एक हैं, किंतु व्यवहार में इसे लागू करना आवश्यक है। स्वदेशी जीवनशैली अपनाने, वेशभूषा, खान-पान और विचारों में स्व का आधार रखने पर जोर दिया। उन्होंने प्रत्येक व्यक्ति से पांच पेड़ लगाने, नदियों और तालाबों के प्रति श्रद्धा रखने तथा प्रकृति से जुड़ाव बनाए रखने का आह्वान किया। साथ ही नागरिक कर्तव्यों के पालन, स्वच्छता और राष्ट्रहित में निष्ठा के साथ कार्य करने की आवश्यकता पर बल दिया। कार्यक्रम के अंत में जिज्ञासा-समाधान सत्र में सुरेश सोनी ने साहित्यकारों एवं इतिहासकारों के प्रश्नों के उत्तर दिए।



