लोकतंत्र को शर्मसार करता विपक्ष
विपक्ष जब जब मजबूत होता है, या जब जब हताश होता है, वह सरकार पर ज्यादा हमलावर होता है, और कई बार संसद भी नहीं चलने देता। पिछले दो चुनावों के मुकाबले अठाहरवीं लोकसभा के चुनाव में विपक्ष मजबूत भी हुआ है, लेकिन सत्ता से वंचित रहने के कारण हताश भी है। लोकसभा चुनावों से पहले विपक्ष कभी भी इतना एकजुट नहीं हुआ था, जितना इस बार हुआ था। इसका नतीजा यह निकला कि सौलहवीं और सत्रहवीं लोकसभा में स्पष्ट बहुमत पाने वाली भाजपा स्पष्ट बहुमत पाने से वंचित रह गई, लेकिन उस के राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिल गया। प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस पहले के दो चुनावों के मुकाबले ज्यादा मजबूत हुई। पिछले दो चुनावों में तो कांग्रेस को इतनी सीटें भी नहीं मिली थीं, कि वह विपक्ष का नेता बना पाती, जो सदन के सदस्यों की संख्या का दस प्रतिशत होना चाहिए। कांग्रेस थोड़ी खुश थी, लेकिन चुनावों से पहले बने इंडी एलायंस के लिए हताशा की बात थी, क्योंकि दो धु्रवीय चुनावों के बावजूद उसे हार का मुहं देखना पड़ा। इसलिए मोदी सरकार को अपने तीसरे कार्यकाल में संसद के भीतर मजबूत और हताश विपक्ष के कड़े मुकाबले का सामना करना पड़ रहा है। जब जब सरकार को कम बहुमत होता है, विपक्ष ज्यादा से हमलावर होने की कोशिश करता ही रहा है।
2024 के लोकसभा चुनावों से पहले गांधी परिवार के वारिस और प्रधानमंत्री पद के अघोषित उम्मीदवार राहुल गांधी ने विदेशों में भारतीय लोकतंत्र को शर्मसार करने वाले कई भाषण दिए। उन्होंने नरेंद्र मोदी को तानाशाह बताते हुए भारत में लोकतंत्र को खतरा बताया। यही नहीं उन्होंने भारत में लोकतंत्र की रक्षा के लिए अमेरिका और यूरोप से मदद भी मांगी थी। उन्होंने प्रधानमंत्री के अलावा लोकसभा स्पीकर और मुख्य चुनाव आयुक्त पर भी बेबुनियाद आरोप लगाए। आश्चर्यजनक यह है कि अमेरिका और ब्रिटेन में उनके भाषणों का आयोजन भारत विरोधी अमेरिकन और पाकिस्तानी लाबी करती है, इसके प्रमाण सामने आ चुके हैं। इससे पहले भारत के विपक्ष के किसी भी नेता ने कभी भी विदेशों में जाकर अपने देश की अंदरुनी राजनीति पर नकारात्मक बात नहीं की थी। एक बार अटल बिहारी वाजपेयी जब विदेश के दौरे पर थे, तो उनसे इंदिरा गांधी पर सवाल पूछा गया था, उन्होंने कहा था कि पक्ष और विपक्ष भारत के भीतर है, यहां पर मैं भारत का प्रतिनिधित्व कर रहा हूं। नरसिंह राव ने तो संयुक्त राष्ट्र में भारत का प्रतिनिधत्व करने के लिए विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी को भेजा था।
राहुल गांधी के नेतृत्व में समूचे विपक्ष ने 2024 का चुनाव लोकतंत्र और संविधान की रक्षा का एजेंडा बनाकर लड़ा। उनके इस मनघडंत नैरेटिव को देश की जनता ने ठुकरा दिया। इतना ही नहीं, इस चुनाव में उन्होंने हिन्दुओं को बांटने के लिए जातिवाद का जहर भी फैलाकर जनता को झूठे नैरेटिव से भ्रमित किया कि अगर नरेंद्र मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बन गए तो यह आखिरी चुनाव होगा, लोकतंत्र खत्म हो जाएगा, देश के संविधान को बदल दिया जाएगा और आरक्षण खत्म कर दिया जाएगा। इससे हिन्दू समाज का एक वर्ग नरेंद्र मोदी को लेकर भ्रमित भी हुआ, जिस कारण भाजपा की सीटें 303 से घट कर 240 रह गई और कांग्रेस की सीटें 52 से बढ़कर 99 हो गई। जिसे राहुल गांधी अपनी जीत बताने लगे, उन्होंने कोशिश की थी कि चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार एनडीए छोड़ कर उनके साथ आ जाएं और उन्हें प्रधानमंत्री बनवा दें, लेकिन वह इसमें असफल हुए।
इसके बावजूद अठाहरवीं लोकसभा के पहले सत्र में वह विजयी मुद्रा में प्रवेश हुए थे। उन्हें यह समझने में कई महीने लग गए कि उनकी सीटें जरुर बढी हैं, लेकिन 99 सीटें 240 से बहुत कम होती हैं। उन्होंने लोकसभा में कहा कि ”सरकार भले ही आप की है, प्रधानमंत्री भले ही आप हैं, लेकिन होगा वह, जो वह चाहेंगे।“ भले ही सरकार अपने एजेंडे से टस से मस नहीं हुई है, लेकिन पिछले तीन सत्रों से अपने अमर्यादित व्यवहार से उन्होंने लोकसभा को ठप्प करके रखा हुआ है। विपक्ष के नेता का पद बहुत ही सम्माननीय होता है, उन्हें गरिमामयी ढंग से पेश आना चाहिए। उन पर जिम्मेदारी है कि वह विपक्ष के सदस्यों को भी मर्यादा में रहने को कहें। लेकिन वह खुद ही न सदन के नियम मानते हैं, न स्पीकर का आदेश मानते हैं। इससे पहले कभी नहीं देखा गया था कि विपक्ष का नेता अपनी पार्टी के सांसदों को सदन के काम में बाधा डालने के लिए आसन के सामने जा कर नारेबाजी करने के लिए उकसा रहा हो। वह खुद स्पीकर के बारे में भी अनाप शनाप बोलते रहते हैं, जबकि इससे पहले ऐसी परंपरा नहीं रही। यूपीए कार्यकाल में एक बार विपक्ष ने लोकसभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी की निष्पक्षता पर सवाल उठाया था, तो वह इतने नाराज हुए थे कि उन्होंने इस्तीफे की धमकी दे दी थी। तब विपक्ष के नेता लाल कृष्ण आडवानी खुद सोमनाथ चटर्जी से मिले और उन्होंने उनके प्रति विश्वास प्रकट किया। जबकि राहुल गांधी विपक्ष के नेता हैं, तो वह खुलेआम स्पीकर पर आरोप लगाते हैं और अपने सांसदों को उनके चेंबर में हल्ला करने के लिए भेजते हैं।
संसद के बजट सत्र के पहले पक्ष में तो हद ही हो गई, जब राहुल गांधी ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल एम.एम. नरवणे की अप्रकाशित किताब का मुद्दा उठाया। जवाहर लाल नेहरू के समय 1954 में एक नियम बनाया गया था किसी भी पूर्व सैनिक या ब्यूरोक्रेट की किताब बिना सरकार की अनुमति के प्रकाशित नहीं होगी। क्योंकि उनके पास देश के कई महत्वपूर्ण रहस्य होते हैं, जिन्हें राष्ट्रहित में सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। इसीलिए मंत्री बनाते समय राजनेताओं को पद के साथ-साथ गोपनीयता की शपथ भी दिलाई जाती है। नरवणे की किताब प्रकाशित होने से पहले उसके कुछ अंश एक पत्रिका में प्रकाशित होने बाद उनकी किताब का प्रकाशन रोक दिया गया था, लेकिन राहुल गांधी राष्ट्र सुरक्षा की धज्जियां उड़ाते हुए नरवने की अप्रकाशित पुस्तक के वे अंश पढना चाहते थे, जिसमें 31 अगस्त 2020 की घटना का जिक्र था, उस रात चीनी आर्मी उत्तरी क्षेत्र में आगे बढ़ रही थी और जनरल नरवने के अनुसार प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री ने भारतीय सेना को निर्देश देने में दो घंटे लगा दिए, आखिर में जो निर्देश दिए, उनमें फैसला सेना पर छोड़ दिया गया था। पहली बात तो यह है कि इन दो घंटों में जरुर सुरक्षा मामलों की केबिनेट कमेटी की बैठक हुई होगी, जरुर चीन से कूटनीतिक संबंध बनाकर पूछताछ की गई होगी, क्योंकि प्रधानमंत्री के सीधे आदेश का मतलब होता युद्ध की हरी झंडी। प्रधानमंत्री अचानक देश पर युद्ध नहीं थोंप सकते। फिर भी दो घंटे बाद जो निर्देश दिए गए थे, उसका मतलब भी सेना को फ्री हेंड देना था। उस समय उतरी कमांड के लेफ्टिनेंट जनरल प्रशांत जोशी ने भी एक किताब लिखी हैं, जिसमें उन्होंने लिखा है कि सरकार की तरफ से फ्री हेंड था और उसी का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने चीनी सेना को रोकने में सफलता हासिल की। खुद जनरल नरवने की प्रेस कांफ्रेंस का वीडियो भी उपलब्ध है, जिसमें उन्होंने कहा है कि भारत की एक ईंच भूमि पर भी चीन काबिज नहीं हुआ। सवाल पैदा होता है कि विपक्ष के नेता सरकार को नीचा दिखाने के लिए उन की अप्रकाशित पुस्तक के एक अंश को संसद में उठाकर क्या हासिल करना चाहते थे। यूपीए शासन के दौरान उन्होंने चीन की कम्युनिस्ट सरकार के साथ एक गोपनीय समझौते पर दस्तखत किए थे। संशय पैदा होता है कि क्या उस समझौते में उन्होंने देश दुनिया के सामने भारत की बजाए चीन का पक्ष रखने का वायदा किया था। क्या इसीलिए वह बार बार चीन का मुद्दा उठाकर देश को गुमराह करने की कोशिश करते हैं। क्या वह चीन के समर्थन में लाबिंग कर रहे थे।
इसके बाद बजट पर चर्चा के समय उन्होंने भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर भाषण देना शुरू कर दिया, जिसमें उन्होंने टेक्स्टाईल इंडस्ट्री, कपास उत्पादकों और दालों आदि के आयात की अनुमति देकर कृषकों के हितों को नुक्सान पहुंचाने का आरोप लगाए, उनमें ज्यादाटार आरोप आधारहीन तो थे ही, समझौते पर अभी अंतिम रूप से दस्तखत तक नहीं हुए हैं। इन दोनों ही मामलों में स्पीकर ने उन्हें बोलने की इजाजत इसलिए नहीं दी, क्योंकि दोनों ही विषय सदन में चल रही बहस के मुद्दे नहीं थे। सदन की नियमावली के नियम 167 के मुताबिक वह किसी भी विषय पर बहस का नोटिस दे सकते है, लेकिन उन्होंने नियम 167 में नोटिस देने की बजाए अन्य विषयों पर चर्चा के दौरान इन विषयों को उठाया था। इतना ही नहीं राहुल गांधी ने अपनी पार्टी की महिला सांसदों को प्रधानमंत्री की कुर्सी की घेराबंदी करने के आदेश भी दे दिए थे। महिला सांसदों ने प्रधानमंत्री की कुर्सी की घेराबंदी भी कर ली थी, अगर उस समय प्रधानमंत्री वहां आ जाते, तो सदन में कुछ भी अनहोनी हो सकती थी, क्योंकि ऐसी स्थिति में सत्ता पक्ष के सांसद भी शांत नहीं रहते। इसलिए स्पीकर और प्रधानमंत्री ने सदन की कार्यवाही को अगले दिन तक स्थगित करके अनहोनी होने और सदन की मर्यादा को तार तार होने से बचा लिया। अन्य विपक्षी दलों के नेता भी राहुल गांधी के मर्यादाहीन व्यवहार से क्षुब्ध हैं, समाजवादी पार्टी के राज्यसभा में नेता राम गोपाल यादव ने प्रधानमंत्री की कुर्सी की घेराबंदी और स्पीकर के चेंबर में किए गए हल्ले की आलोचना की है। यह साफ़ संकेत है कि अगर विपक्ष के नेता ने अपना व्यवहार नहीं बदला, तो वह विपक्ष की एकता बनाकर नहीं रख सकेंगे।




