प्राचीन भारतीय महान वैज्ञानिक आर्यभट्ट
पांचवी शताब्दी में भारत में एक महान गणितज्ञ तथा खगोल वैज्ञानिक आर्यभट्ट हुए थे जिनके अति उच्च स्तरीय मौलिक शोध ने भारत को गणित तथा खगोल के वैश्विक गुरु के रूप में स्थापित किया था। इनके जन्म तथा बचपन संबंधित विस्तृत जानकारी इनकी स्वयं की रचनाओं में उल्लिखित नहीं मिलती है। इन्होंने केवल मात्र इतना उल्लेख अपनी एक रचना में किया है कि वे कलियुग के (युधिष्ठिर संवत के) 3600 वे वर्ष में 23 वर्ष के थे तथा उनका जन्म कुसुमपुरा (अर्थात पाटलिपुत्र) में हुआ था। इसके अनुसार उनका जन्म 499 ई. में हुआ था। इनके शिष्य प्रसिद्ध गणितज्ञ भास्कर (प्रथम) के उल्लेख के अनुसार इनका (आर्यभट्ट का) जन्म बुद्ध के काल में असमाकया परिवार में नर्मदा और गोदावरी के मध्य के क्षेत्र में युधिष्ठिर संवत 3554 में (अर्थात 476 ई. में) हुआ था।
एक अन्य मान्यता के अनुसार इनका जन्म वर्तमान केरल की प्राचीन राजधानी थिरूवंचिकुलम में हुआ था। कुछ ग्रंथों में उल्लेख मिलते हैं कि वे उच्च अध्ययन हेतु कुसुमपुरा (पाटलिपुत्र) गये थे और वहां कुछ समय रहे थे। यह भी उल्लेख मिलता है कि वे कुसुमपुरा की एक विश्वविख्यात अकादमिक संस्थान के अध्यक्ष थे। उन दिनों का विश्वविख्यात संस्थान नालंदा विश्वविद्यालय कुसुमपुरा (पाटलिपुत्र) में ही था तो कुछ लेखकों के अनुमान के अनुसार आर्यभट्ट नालंदा विश्वविद्यालय के कुलाधिपति रहे थे। यह भी उल्लेख मिलता है कि आर्यभट्ट ने तारेगना (बिहार) में सूर्यमंदिर में खगोल शोध हेतु एक विशाल प्रयोगशाला स्थापित की थी। उनका खगोल शास्त्र में किया गया शोध सूर्य सिद्धांत का आधार बना था जिसमें कई खगोलीय यंत्रों का उल्लेख भी मिलता है जैसे शंकु यंत्र, छाया यंत्र, धनुर्यंत्र, चक्र यंत्र, बेलनाकार यष्टि यंत्र, छत्र यंत्र तथा दो आकारों (धनुष आकार और बेलन आकार) की जलघड़ी।
आर्यभट्ट ने गणित तथा खगोल विज्ञान पर कई बहुत मौलिक पुस्तकें लिखी थी जिनमे उनके द्वारा गणित, बीजगणित, ज्यामिति, त्रिकोणमिति, गोल ठोस त्रिकोणमिति, द्विघात समीकरण, घात श्रेणियों और ज्या, कोज्या की सारणी पर किए शोध का आधुनिक गणित के विकास में बहुत महत्व है। इनकी पुस्तकों में से केवल अति प्रसिद्ध पुस्तक आर्यभटिय ही वर्तमान में उपलब्ध हो पायी है। इस अद्भुत पुस्तक की रचना उन्होंने 23 वर्ष की अवस्था में पूर्ण कर ली थी। खगोलीय गणित की इस अनुपम पुस्तक में वर्णित सिद्धांतों को निम्नांकित चार भागों में वर्गीकृत किया जाता है-
i) गीतिका पद: इस में पृथ्वी और अन्य ग्रहों की गति से संबंधित दस प्रसिद्ध सूत्र हैं। जो ग्रहों और सूर्य के मध्य गुरुत्वाकर्षण का बल प्रतिपादित करते हैं।
ii) गणित पद: इसमे उल्लेखित एक सौ अठारह संस्कृत श्लोकों में तैंतीस प्रसिद्ध श्लोक वर्ग, वर्गमूल, घन, घनमूल, त्रिभुज के क्षेत्रफल तथा समानांतर आधार के घन के आयतन, वृत्त के क्षेत्रफल तथा गोले के आयतन, समकोण त्रिभुज के आधार तथा लंब, समकोण त्रिभुज के विकर्ण, ज्या तथा कोज्या, भिन्न के दसमलव मान तथा कोट्टक गणित से संबंधित हैं। लगभग डेढ़ हजार वर्ष पूर्व महान गणितज्ञ आर्यभट्ट द्वारा प्रतिपादित ये सभी श्लोक आधुनिक गणित का आधार बने जिनमे उल्लिखित पाई (वृत्त की परिधि और व्यास का अनुपात) का मान विस्मयकारी रूप से दसमलव के चार अंकों तक शुद्ध पाया गया है। उन्होंने गणित पद-10 में स्थापित किया था कि 20,000 परिमाण के व्यास वाले वृत्त की परिधि का परिमाण 62,832 होगा। तदनुसार-
पाई = (62832)/(20000) = 3.1416 इस सूत्र को उन्होंने निम्नांकित श्लोक के रुप मे रखा था-
चतुरधिकम शतमस्टगुणम द्वासष्टीस्था सहस्रानाम।
आयुतद्वय विषकम्भस्यासंनो वृत्त परिणाह।।
अर्थात् ‘सौ में चार जोड़कर आठ से गुणा करो और फिर उसमें 62,000 जोड़ कर उस वृत्त की परिधि प्राप्त होगी जिसके व्यास का परिमाण 20,000 है’।
उन्होंने गणित पद-6 में स्थापित किया कि किसी समकोण वाले त्रिभुज का क्षेत्रफल ( आधार × शीर्ष से लंब) / 2
होता है तथा उसके ऊपर समरूप ठोस का आयतन (आधार के त्रिभुज का क्षेत्रफल × ठोस के शीर्ष से लंब)/2 के तुल्य होता है।
उनके द्वारा प्रतिपादित गणित पद-17 के अनुसार किसी समकोण त्रिभुज में विकर्ण का वर्ग = आधार का वर्ग + लंब का वर्ग
इस सिद्धांत को आर्यभट्ट की शिष्य परम्परा के एक शिष्य प्रसिद्ध गणितज्ञ बौधायन ने सुलभसूत्र द्वारा प्रमाणित किया। इस प्रसिद्ध सूत्र के जनक आर्यभट्ट थे तथा इसके प्रमाणित करने वाले बौधयन थे पर दुर्भाग्य से हमारे स्कूलों और महाविद्यालयों में अभी भी इस सूत्र को पाईथागोरस प्रमेय के नाम से पढाया जाता है।
आर्यभट्ट के गणित पद के नौवें श्लोक में प्रतिपादित किया गया था कि किसी वृत्त की परिधि के छटे भाग की जीवा उसके व्यास की आधी होती है। आधुनिक गणित तथा त्रिकोणमिति में इस सूत्र का व्यापक उपयोग किया जाता है। उनके गणित पद-11 द्वारा ज्या तथा कोज्या को बहुत आकर्षक ढंग से प्रतिपादित किया गया है।
तीसरी शताब्दी में बक्शाली ग्रंथों में प्रारंभ हुए स्थान-मान-तंत्र को आर्यभट्ट ने अपनी रचनाओं में बहुत विकसित किया। यद्यपि उन्होंने शून्य के चिन्ह का प्रयोग अपनी रचनाओं में नहीं किया परंतु फ्रांसीसी गणितज्ञ जार्ज इफराह ने तर्कों द्वारा सिद्ध किया है कि शून्य तथा दसमलव-स्थान-मान तंत्र का पूर्ण ज्ञान आर्यभट्ट की रचनाओं में उपलब्ध है। वास्तव मे आर्यभट्ट ने अपनी रचनाओं में ब्राह्मी संख्याओं का प्रयोग नहीं किया था। उन्होंने वैदिक काल से चले आ रहे संस्कृत-प्रचलन का पालन करते हुए संख्याओं को दर्शाते अंकों के स्थान पर अक्षरों का प्रयोग किया था। इस प्रकार उन्होंने ज्या और कोज्या सारिणी को स्मरणकारी रूप में प्रदर्शित किया था।
iii) कालक्रिया पद: इसमे समय की प्रकृति और इसके मापन पर आर्यभट्ट द्वारा रचित पच्चीस श्लोक हैं जिनमे समय मापन के दीर्घ और अति लघु दोनों प्रकार के मात्रको को प्रतिपादित किया गया है-
वर्ष द्वादश मासास्त्रिशमदिवसों भवित स मासस्तु।
शस्तिनडियो दिवस शस्तिस्तु विनाडिक नाडी।।
तथा
गर्वक्षराणी शस्तिविरनाडीकाक्षी शदेव वा प्राणः।
एवम काल विभागः क्षेत्रविभागस्था भगनात ।।
iv) गोल पद: इसमे मुख्यतः पचास श्लोक हैं जिनमें पृथ्वी के गोल होने को, इसके अक्ष पर पश्चिम से पूर्व की ओर घुर्णन को तथा इसके सूर्य के चारों ओर घूमने को प्रतिपादित किया गया है। इसके अतिरिक्त इन पदों में सूर्य तथा इसके चारों ओर ग्रहों की गति का भी विस्तृत उल्लेख है जिस से स्पष्ट है कि न्यूटन से लगभग डेढ़ हजार साल पहले आर्यभट्ट को ग्रहीय गति तथा गुरुत्वाकर्षण बल का पूर्ण ज्ञान था। इस तथ्य के आलोक में हमारे विद्यालयों में सुनाई जाने वाली न्यूटन के सर पर सेब गिरने पर उन्हें सबसे पहले गुरुत्वाकर्षण का ज्ञान होने की कहानी मिथ्या तथा मनगढ़ंत है।
आर्यभट्ट द्वारा सूर्य-ग्रहण तथा चंद्र-ग्रहण का विस्तृत वैज्ञानिक विश्लेषण किया गया था। उन्होंने बताया था कि सभी ग्रह तथा चन्द्रमा सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करके चमकते है और चंद्र ग्रहण उसपर पृथ्वी की छाया पड़ने के कारण दिखाई पड़ता है तथा सूर्यग्रहण पृथ्वी पर चन्द्रमा की छाया पड़ने के कारण दिखाई पड़ता है।
आर्यभट्ट तथा उनके शिष्यों द्वारा स्थापित कैलंडर गणनाएं भारत में पंचांग रचना हेतु व्यापक रुप में प्रयुक्त की जाती हैं। इस्लामिक देशों में भी उनका प्रयोग जलाली कैलंडर बनाने के लिए 1073 ई. में उमर खयाम आदि खगौलविंदो द्वारा प्रारंभ कर दिया गया था।
आर्यभट्ट को बीजगणित का संस्थापक भी माना जाता है तथा बीजगणित की विधि से गणित की जटिल समस्याओं को हल करने की कला उनके द्वारा रचित कई श्लोकों में प्रकट होती है जैसे आर्यभट्ट गणित पद-24 और 29 में जटिल गणितीय प्रश्न को बीजगणित विधि द्वारा हल किया गया है।
यद्यपि उनकी अन्य पुस्तक आर्य - सिद्धांत मूल रूप में उपलब्ध नहीं है परंतु उनके शिष्य परम्परा के वैज्ञानिकों के लेखों और पुस्तकों में इस पुस्तक को खगोलीय गणनाओं हेतु मार्ग दर्शक माना गया है। आर्यभट्ट ने सापेक्षता सिद्धांत का भी अपनी रचनाओं में उल्लेख किया है। जैसे-जैसे आगे जाती नौका में बैठा दर्शक किनारे की वस्तुओं को पीछे जाते देखता है उसी प्रकार स्थिर नक्षत्र पृथ्वी वासी को पश्चिम की ओर जाते दिखाई देते है।
आर्यभट्ट द्वारा खगोल विज्ञान पर रचित तीसरी महत्व पूर्ण पुस्तक भी मूलरूप में उपलब्ध नहीं है परंतु नौवीं शताब्दी में किया गया इसका अरबी में अनुवाद 'Al-nanf ' खगोलीय ज्ञान का भंडार माना जाता है जिसका उल्लेख पर्शियन विद्वान अबु रेहान एल- बू्रनी ने कई लेखों और पुस्तकों में किया है।
आर्यभट्ट ने अपनी सभी रचनाओं में उल्लेख किया है कि जो भी उन्होंने लिखा है वह सारा ज्ञान उनसे प्राचीन भारतीय विद्वानों के किये गये शोध पर आधारित है। अपनी रचनाओं में कई स्थानों पर उन्होंने 1200 ईसा पूर्व (लगभग तीन हजार वर्ष पूर्व) महर्षि लगध द्वारा रचित वेदांग ज्योतिष में प्रतिपादित गणितीय सूत्रों का भी उल्लेख किया है। इस से सिद्ध होता है कि पश्चिम में मानव सभ्यता विकसित होने से पूर्व ही प्राचीन भारत में गणित और विज्ञान बहुत विकसित हो गए थे।
आर्यभट्ट की 550 ई. में मृत्यु के कई शताब्दी बाद इनके द्वारा संस्कृत श्लोकों में रचित खगोलीय गणित के ग्रंथों का 800 ई. में अरबी में अनुवाद हुआ था जिसके आधार पर इस्लामिक खगोलीय गणित का उदय हुआ और बाद में इस ज्ञान का स्थानांतरण यूरोप में हुआ जिस से वैश्विक स्तर पर खगोलीय ज्ञान का प्रचार प्रसार हुआ।
उनके सम्मान में प्रथम भारतीय उपग्रह का नाम आर्यभट्ट-उपग्रह रखा गया। खगोल विज्ञान तथा खगोल-भौतिकी में उन्नत शोध हेतु नैनीताल (उत्तराखण्ड) में उन्हीं के नाम पर आर्यभट्ट शोध प्रयोग शाला (ARIES) स्थापित की गयी है। आर्यभट्ट द्वारा रचित गणित तथा खगोल -विज्ञान संबंधित सूत्रों का उल्लेख तथा विस्तृत विवेचन मेरी नव प्रकाशित पुस्तक,
"Historical, Cultural and Scientific Heritages of India" में किया गया है जिसे प्रगति प्रकाशन मेरठ द्वारा प्रकाशित किया गया है।




