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इतिहास

तादात्म्य और प्रेम राष्ट्रीय चरित्र का आधार – श्री गुरुजी

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 संघ संस्मरण

तादात्म्य और प्रेम राष्ट्रीय चरित्र का आधार श्री गुरुजी

जिसके अपने अंदर ही शुद्धता पवित्रता नहीं है, वह दूसरों को क्या देगा? जो वस्तु अपने पास है ही नहीं, वह हम दूसरों को कैसे दे सकेंगे? जिसकी जेब में एक पैसा नहीं है, वह दूसरों को सौ रुपए कहाँ से देगा? अतः उसकी बात का कोई परिणाम नहीं होता। उसका मूल खोजकर अंतर-बाह्य जीवन में शुद्धता लाना आवश्यक है। यदि राष्ट्रभक्त तथा राष्ट्रसेवी होने का दावा रखने वाले के जीवन में स्वार्थ, मद, लालसा, लोभ, मोह आदि दिखाई दिए तो यह समझना चाहिए कि राष्ट्र पर उसकी श्रद्धा कम है, विश्वास कम अतः राष्ट्रीय चारित्र्य का मूलाधार तादात्म्य तथा प्रेम है।


||श्री गुरूजी समग्र, खंड-2, प्रथम संस्करण, सुरुचि प्रकाशन, पृष्ठ 77 ||