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भारत विश्व का मार्गदर्शन कर सके इसके लिए देश को आंतरिक तौर पर मजबूत करना होगा - दत्तात्रेय होसबाले जी

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रोहतक

संघ शताब्दी वर्ष के निमित्त रोहतक के गोहाना रोड स्थित शिक्षा भारती वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय में “सज्जन शक्ति की समाज परिवर्तन में भूमिका” विषय पर सामाजिक सद्भाव विचार गोष्ठी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी ने कहा कि भारत विश्व का मार्गदर्शन कर सके इसके लिए देश को आंतरिक तौर पर मजबूत करना होगा, आंतरिक ताकत देनी होगी और संघ पिछले 100 वर्षों से इसके लिए ही कार्यरत है। देश को आंतरिक तौर पर मजबूत करने के लिए समाज की सज्जन शक्ति को एकजुट होकर आगे आना होगा। सद्भाव के साथ सभी महापुरुषों की जयंती मिलकर मनानी होगी, तभी राष्ट्र मजबूत होगा और जात-पात की खाई को पाटा जा सकेगा।

विचार गोष्ठी के दौरान मंच पर उत्तर क्षेत्र संघचालक पवन जिंदल जी, प्रांत संघचालक प्रताप सिंह जी उपस्थित रहे। सरकार्यवाह जी ने कहा कि भारत प्राचीन काल में सोने की चिड़िया कहलाता था। इसलिए भारत ने विदेशी आक्रांताओं के आक्रमणों को भी झेला है। 1600 ई में जब इंग्लैंड में ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना हुई, उस समय भारत का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापार व्यवस्था में 23 प्रतिशत हिस्सा था। इससे पता चलता है कि प्राचीन काल में भारत आर्थिक तौर पर कितना समृद्ध था। उन्होंने कहा कि हमारी ज्ञान परंपरा, संस्कृति विश्व के सभी देशों से अच्छी थी। हम समस्त विश्व को एक कुटुम्ब तथा भारत के सभी धर्मों, परंपराओं, रीति-रिवाजों को अपना मानते हैं। एक चींटी में भी ईश्वर का अंश देखते हैं, लेकिन हम जाति-पाति, भिन्न-भिन्न पंथों में बंट गए और विदेशी आक्रांताओं ने इसका फायदा उठाया और हमें लंबे समय तक गुलामी झेलनी पड़ी। इसका परिणाम यह रहा कि देश की स्वतंत्रता के वर्षों बाद भी हम गुलामी की मानसिकता से बाहर नहीं निकल पाए हैं। हम अपना आत्मविश्वास खो बैठे हैं। इस आत्मविश्वास को पुन: प्राप्त करने के लिए समाज की सज्जन शक्ति को आगे आकर प्रयास करने होंगे। दत्तात्रेय होसबाले जी ने कहा कि आक्रांता बनकर किसी देश को लूटना, उसकी संस्कृति को खत्म करना, राक्षसी आनंद के लिए किसी को दबाना हमारी प्रवृत्ति नहीं है। क्योंकि हम तो पूरे विश्व को एक कुटुम्ब मानते हैं। हम तो अपने पैरों पर खड़े होकर दूसरों को आगे बढ़ाने, विश्व को मानवता सिखाने वाली संस्कृति के लोग हैं।

संघ पिछले 100 वर्षों से व्यक्ति निर्माण का कार्य कर रहा है ताकि समाज का हित किया जा सके। उन्होंने कहा कि सरकार का काम होता है बाहरी ताकतों से देश की रक्षा करना, देश में संतुलन बनाए रखना, और कानून व्यवस्था स्थापित करना। लेकिन युवाओं का मार्गदर्शन करना, उनमें संस्कारों का निर्माण करना, संस्कृति को बढ़ावा देना, कुरीतियों को खत्म करना, और अच्छे नागरिक तैयार करना, इन सबकी जिम्मेदारी समाज की होती है। इसके लिए समाज की सज्जन शक्ति को ही प्रयास करने होंगे। हमें विकास के साथ-साथ राष्ट्र धर्म और राष्ट्रहित को ध्यान में रखकर आगे बढ़ना होगा।

उन्होंने जापान का उदाहरण देते हुए बताया कि 1946 में दूसरे विश्व युद्ध के बाद जापान बिल्कुल पूरी तरह से धराशायी हो गया था, लेकिन युद्ध के महज 15 वर्षों बाद ही जापान विश्व के सामने फिर से खड़ा हो गया। इसके पीछे का प्रमुख कारण उन लोगों की देशभक्ति, शिक्षा व समाज की शक्ति है। उन्होंने कहा कि अपने देश पर इतने आक्रमण हुए, आक्रांताओं ने हमारी शिक्षा व्यवस्था, हमारी संस्कृति को खत्म करने के अनेकों प्रयास किए, लेकिन इतने आक्रमणों के बाद भी हम खत्म नहीं हुए तो इसके पीछे जो ताकत है, वह है हमारी परिवार व्यवस्था। विदेशी यात्रियों ने भी अपने यात्रा के अनुभवों में हमारी परिवार व्यवस्था का वर्णन प्रमुखता से किया है। क्योंकि हमारी परिवार व्यवस्था में बच्चों को स्किल व संस्कार दोनों चीजें एक साथ दी जाती रही हैं। हमारे युवाओं में प्रतिभा बहुत है, लेकिन आज हमारा युवा नशे की दलदल में फंसकर पथ भ्रष्ट हो रहा है। पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव में आकर अपनी संस्कृति से दूर होता जा रहा है। युवाओं को नशे से बचाने व संस्कारित करने के लिए सामाजिक, धार्मिक संगठनों व समाज की सज्जन शक्ति को एकजुट होकर कार्य करना होगा।

उन्होंने कहा कि देश एक बार फिर से विश्व का नेतृत्व करे, इसके लिए समाज की सज्जन शक्ति को देश को अंदर से मजबूत करना होगा। निजी स्वार्थों को छोड़कर, जात-पात, भाषा, पंथ से ऊपर उठकर राष्ट्र निर्माण, समाज परिवर्तन के कार्य करने होंगे। संघ इसके लिए निरंतर प्रयासरत है। इसके लिए संघ ने समाज परिवर्तन के लिए 5 संकल्प लिए हैं। इसमें सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण, स्व-बोध व देशी वस्तुओं का प्रयोग, कुटुम्ब प्रबोधन तथा नागरिक कर्त्तव्य हैं। यदि हमें देश को स्वाभिमानी व शक्तिशाली बनाना है तो इन पांच संकल्पों को पूरा करने के लिए दृढ़ संकल्प लेना होगा।



प्रश्नोत्तर-समाज में चिंतन-मंथन से होती है उन्नति

विचार गोष्ठी में प्रश्नों के उत्तर देते हुए सरकार्यवाह जी ने कहा कि समाज में चिंतन-मथन होते रहना चाहिए। इससे समाज की उन्नति होती है और संघ इसके लिए ही कार्यरत है। इसके अलावा संघ का कोई विशेष एजेंडा नहीं है, क्योंकि संघ की स्थापना के समय डॉ. हेडगेवार ने कहा था कि समाज का कार्य पूर्ण होने के बाद संघ को समाज में विलीन हो जाना है। अगर समाज एक बार जागृत हो जाए तो फिर संघ को अलग से काम करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

उन्होंने नैतिक शिक्षा और भगवद् गीता पर प्रश्न के उत्तर में कहा कि बच्चों को शिक्षा के साथ-साथ नैतिकता का पाठ पढ़ाया जा सके और धार्मिकता समझाई जा सके, इसके लिए नई शिक्षा नीति में प्रयास किए गए हैं। लेकिन वर्षों से जो पाठ्यक्रम हम पढ़ते आ रहे हैं, उसको दिमाग से निकलने में समय लगेगा। तब तक समाज के सभी बुद्धिजीवियों व शिक्षण संस्थाओं के संचालकों को अपने विद्यालयों में देशभक्ति, संस्कृति, और पंच परिवर्तन के बारे में जानकारी देनी होगी। युवाओं को नशे से बचाने के लिए सबको सामूहिक प्रयास करने होंगे क्योंकि यह एक तरह से अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र है। उन्होंने कहा कि दुनिया में कहीं भी भारत के नागरिक के साथ यदि कुछ गलत होता है तो संघ पीड़ित व्यक्ति के समर्थन में आवाज उठाता है।

उन्होंने एक प्रश्न के उत्तर में कहा कि सरकार में हमारे विचार के लोग अवश्य हैं, लेकिन संघ सरकार का रिमोट कंट्रोल नहीं है। सरकार संविधान के अनुसार अपना कार्य करती है। छुआछूत के सवाल पर सरकार्यवाह जी ने कहा कि 1969 में संघ के सरसंघचालक श्री गुरुजी ने संत समाज से छुआछूत के विरोध में एक प्रस्ताव पास करवाया था। समाज से छुआछूत खत्म हो, इसके लिए संघ एक कुआं-एक श्मशान-सब के लिए मंदिर प्रवेश अभियान चलाए हुए है।

समाज में माला के धागे की तरह काम करता है संघ

सरकार्यवाह जी ने कहा कि समाज में हो रहे अच्छे परिवर्तन के लिए संघ ने कभी श्रेय नहीं लिया। संघ तो समाज में माला के उस धागे की तरह कार्य करता है जैसे एक धागा फूलों को जोड़कर माला बना देता है, लेकिन वह किसी को दिखाई नहीं देता। ठीक उसी प्रकार संघ समाज से किसी प्रकार की कोई प्रशंसा नहीं चाहता।