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भारतीय ज्ञान परंपरा और नागरिक चेतना

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भारतीय ज्ञान परंपरा और नागरिक चेतना 

भारतीय ज्ञान परंपरा मानव सभ्यता की उन सतत प्रवाहित धाराओं में है, जिसने ज्ञान को केवल बौद्धिक उपार्जन नहीं, बल्कि जीवन जीने की समग्र पद्धति के रूप में विकसित किया। यह परंपरा व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और प्रकृति, सभी के बीच संतुलन स्थापित करती है। आज के भारत में, जब हम संविधान, लोकतंत्र, डिजिटल युग और वैश्विक उत्तरदायित्वों की बात करते हैं, तब यह प्रश्न और अधिक प्रासंगिक हो जाता है कि क्या भारतीय ज्ञान परंपरा आधुनिक नागरिक चेतना को दिशा दे सकती है। उत्तर न केवल सकारात्मक है, बल्कि यह भी स्पष्ट है कि बिना इस परंपरा के आधुनिक नागरिकता नैतिक रूप से अपूर्ण रह जाती है।

भारतीय चिंतन का मूल आधार ‘ऋत’ और ‘धर्म’ की अवधारणा है। ऋग्वेद में कहा गया है ”ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत।“ अर्थात् तप, अनुशासन और साधना से ही सत्य और नैतिक व्यवस्था का उद्भव होता है। आधुनिक नागरिक जीवन में कानून, संविधान और शासन-व्यवस्था तभी प्रभावी हो सकती है, जब नागरिकों के भीतर नैतिक अनुशासन और सत्यनिष्ठा हो। केवल दंड और नियम नागरिक चेतना का निर्माण नहीं कर सकते; इसके लिए आंतरिक मूल्य आवश्यक हैं, जिनकी जड़ें भारतीय ज्ञान परंपरा में हैं।

उपनिषदों का आत्मबोध नागरिक चेतना का गहरा आधार प्रस्तुत करता है। ईशावास्योपनिषद् का उद्घोष ”ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।“ यह भाव आज के संदर्भ में सार्वजनिक संसाधनों, पर्यावरण और डिजिटल स्पेस तक विस्तृत हो जाता है। जब नागरिक यह समझता है कि जल, जंगल, भूमि, डेटा और सार्वजनिक मंच किसी एक व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि सामूहिक उत्तरदायित्व हैं, तभी वह उत्तरदायी नागरिक बन पाता है। स्वामी विवेकानंद का यह आग्रह कि राष्ट्र निर्माण का आधार चरित्र निर्माण है, इसी आत्मबोध का सामाजिक विस्तार है। उनके अनुसार केवल शिक्षित नहीं, बल्कि साहसी, त्यागी और सेवाभावी नागरिक ही भारत को महान बना सकते हैं। स्वतंत्र भारत में यह परंपरा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संगठनों के माध्यम से सामाजिक स्तर पर आगे बढ़ी। डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का स्पष्ट मत था कि राष्ट्र का निर्माण सत्ता या शासन से नहीं, बल्कि समाज के चरित्र से होता है। यदि नागरिक अनुशासित, निःस्वार्थ और राष्ट्रनिष्ठ हों, तो किसी भी संविधान और व्यवस्था को सफल बनाया जा सकता है। संघ की शाखा-पद्धति व्यक्ति को समयपालन, सहयोग, समरसता और सेवा के संस्कार देकर नागरिक जीवन की प्रयोगशाला का रूप देती है। डिजिटल युग में साइबर आचरण, सूचना की सत्यता और सोशल मीडिया पर मर्यादा भी इसी व्यापक नागरिक चेतना का आधुनिक रूप हैं।

भारतीय परंपरा में नागरिकता का केंद्र अधिकार नहीं, बल्कि कर्तव्य है। मनुस्मृति का प्रसिद्ध कथन, ”धारणाद् धर्म इत्याहुर्धर्माे धारयति प्रजाः।“ यह बताता है कि समाज को धारण करने वाला आचरण ही धर्म है। भारतीय संविधान के मौलिक कर्तव्य इसी विचार के आधुनिक रूप हैं। स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण, राष्ट्रीय एकता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण, ये सभी केवल संवैधानिक निर्देश नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा से निकले नागरिक मूल्य हैं। महात्मा गांधी ने इसी विचार को आधुनिक संदर्भ में सत्य, अहिंसा और स्वराज्य की अवधारणा के माध्यम से प्रस्तुत किया। उनके लिए स्वराज्य केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि आत्मसंयम और आत्मानुशासन था। उनका यह कथन कि ”कर्तव्यों का पालन ही अधिकारों की सबसे सशक्त सुरक्षा है“, जो कि आज के नागरिक विमर्श में अत्यंत आवश्यक हो जाता है। भारतीय संविधान के मौलिक कर्तव्य इसी परंपरा की आधुनिक अभिव्यक्ति हैं। आज ‘स्वच्छ भारत’, ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ और ‘डिजिटल इंडिया’ जैसे अभियानों की सफलता भी नागरिक कर्तव्यबोध पर ही निर्भर है। गुरुजी माधवराव गोलवलकर ने यह रेखांकित किया कि संविधान राष्ट्र की आत्मा नहीं, बल्कि राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना ही संविधान को प्राणवान बनाती है। उनका कथन, ”राष्ट्र एक जीवंत सांस्कृतिक इकाई है,“ आधुनिक नागरिकता में सांस्कृतिक एकात्मता की अनिवार्यता को रेखांकित करता है।

श्रीमद्भगवद्गीता, कर्मयोग के माध्यम से नागरिक जीवन को दिशा देती है, ”कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।“ यह श्लोक आज के प्रशासन, राजनीति और सामाजिक जीवन में अत्यंत प्रासंगिक है। जब नागरिक, अधिकारी और जनप्रतिनिधि फल-आसक्ति से ऊपर उठकर कर्तव्य करें, तभी भ्रष्टाचार, अनैतिकता और अवसरवाद पर अंकुश लगाया जा सकता है। ‘कर्तव्य पथ’ जैसी आधुनिक प्रतीकात्मक अवधारणाएँ भी इसी कर्मप्रधान नागरिक दृष्टि को रेखांकित करती हैं। महर्षि अरविंद ने भी भारत को एक जीवंत आत्मा मानते हुए कहा कि उसकी वास्तविक शक्ति उसकी आध्यात्मिक चेतना में निहित है। उनके अनुसार भारत का वैश्विक योगदान राजनीतिक प्रभुत्व नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों का प्रसार है। यही दृष्टि नागरिक को केवल उपभोक्ता या मतदाता नहीं, बल्कि नैतिक सहभागी बनाती है।

भारतीय ज्ञान परंपरा का केंद्रीय तत्व लोककल्याण है। ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ की भावना आज सतत विकास लक्ष्यों, सामाजिक न्याय और समावेशी विकास के रूप में प्रकट होती है। पं. दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानव दर्शन भी नागरिक जीवन के लिए संतुलित और समग्र दृष्टि प्रस्तुत करता है, जिसमें व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और प्रकृति के बीच सामंजस्य अनिवार्य है। यह दर्शन न तो व्यक्तिवाद की अति को स्वीकार करता है और न ही सामूहिकता के नाम पर व्यक्ति की उपेक्षा करता है। आर्थिक विकास तभी सार्थक है, जब वह अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे। यह विचार अंत्योदय की अवधारणा में दिखाई देता है, जो भारतीय चिंतन की ही आधुनिक अभिव्यक्ति है। नागरिक चेतना का अर्थ केवल अपने अधिकारों की रक्षा नहीं, बल्कि समाज के कमजोर वर्गों के प्रति संवेदनशीलता भी है।

वाल्मीकि रामायण में संकेत मिलता है कि रामराज्य में नागरिक स्वयं धर्मनिष्ठ थे, इसलिए शासन न्यायपूर्ण था। इसलिए रामायण में भी वर्णित रामराज्य को केवल आदर्श शासन नहीं, बल्कि आदर्श नागरिक समाज के रूप में भी देखा जाना चाहिए। आधुनिक लोकतंत्र में भी सुशासन का आधार केवल नीतियाँ नहीं, बल्कि नागरिक चरित्र है। यदि नागरिक कर-चोरी न करें, नियमों का पालन करें और सार्वजनिक संपत्ति को अपना मानें, तो शासन स्वतः सुदृढ़ हो जाता है।

भारतीय ज्ञान परंपरा में शिक्षा का उद्देश्य चरित्र-निर्माण रहा है। तैत्तिरीय उपनिषद् का आदेश, ”सत्यं वद। धर्मं चर।“ आज की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी ज्ञान के साथ मूल्य-बोध, कौशल और नागरिक जिम्मेदारी पर बल दिया गया है। शिक्षा केवल रोजगार का साधन न होकर जागरूक, संवेदनशील और उत्तरदायी नागरिक बनाने का माध्यम बने, यह विचार भारतीय परंपरा से पूरी तरह मेल खाता है।

पर्यावरण चेतना भारतीय नागरिक दृष्टि का अभिन्न अंग है। अथर्ववेद का कथन, ”माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।“ आज जलवायु परिवर्तन, जैव-विविधता हा्रस और प्रदूषण की वैश्विक चुनौतियों के संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक है। आधुनिक नागरिकता में पर्यावरण संरक्षण, ऊर्जा-संरक्षण और सतत जीवन-शैली अनिवार्य नागरिक कर्तव्य बन चुके हैं। भारतीय ज्ञान परंपरा प्रकृति के साथ सहअस्तित्व का जो संदेश देती है, वही आज की वैश्विक आवश्यकता है।

भारतीय सभ्यता में संवाद, सभा और सहभागिता की परंपरा रही है। यह परंपरा आधुनिक लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, बहस और असहमति के सम्मान के रूप में विकसित हुई है। आज जब समाज में ध्रुवीकरण और असहिष्णुता की चुनौतियां हैं, तब भारतीय ज्ञान परंपरा का ‘समन्वय’ और ‘सह-अस्तित्व’ का भाव नागरिक चेतना को संतुलन प्रदान करता है।

आधुनिक भारतीय विद्वानों ने भी इस परंपरा को समकालीन संदर्भों से जोड़ा। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने शिक्षा को आत्मा का प्रशिक्षण बताया और चेताया कि नैतिकता-विहीन शिक्षा नागरिक को अधूरा बना देती है। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने मूल्य-आधारित नागरिकता को महान राष्ट्र की पहचान कहा और विज्ञान तथा आध्यात्म के समन्वय को भारत की वैश्विक भूमिका का आधार माना। आचार्य विनोबा भावे का ”जय जगत“ का संदेश ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना को वैश्विक नागरिक चेतना से जोड़ता है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना अंतरराष्ट्रीय सहयोग, शांति और मानवता के विचार को बल देती है। वैश्विक संकट, वो चाहे महामारी हो, पर्यावरण हो या मानवीय संघर्ष, इन सभी में भारतीय दृष्टि समाधान और सहानुभूति का मार्ग दिखाती है। 

इस प्रकार भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक नागरिक जीवन परस्पर एक-दूसरे के पूरक हैं। संविधान, तकनीक और आधुनिक शासन नागरिकता को संरचना देते हैं, जबकि भारतीय ज्ञान परंपरा उसे नैतिक आत्मा प्रदान करती है। जब प्राचीन ज्ञान, जीवन दर्शन और आधुनिक नागरिक चेतना का संतुलित समन्वय होता है, तब नागरिक केवल अधिकार-सचेत नहीं, बल्कि कर्तव्यनिष्ठ, संवेदनशील और राष्ट्रनिर्माण में सहभागी बनता है। यही समन्वय भारत को न केवल एक सशक्त लोकतंत्र, बल्कि नैतिक नेतृत्व करने वाला राष्ट्र बनाता है।


लेखक ख्यातिप्राप्त शिक्षाविद, शैक्षिक प्रशासक, प्रोफेसर एवं राष्ट्रवादी चिन्तक और सरकार द्वारा ‘शिक्षक श्री’ पुरस्कार से विभूषित है।