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देश की समृद्ध जीवंत संस्कृतिक उत्सवों का फरवरी

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देश की समृद्ध जीवंत संस्कृतिक उत्सवों का फरवरी 

प्रकृति की अनोखी छटा बसंत आगमन से शुरु होती है। पूर्वोतर भारत में फरवरी तो पर्यटन का सीजन है। माघ मेला तो प्रयागराज में चल ही रहा है। र्तीथस्थल हमारी आस्था के केन्द्र हैं। यहां जाकर मानसिक संतोष मिलता है। देश के कोने कोने से तीर्थयात्री माघ मेला में आते हैं। सभी तीर्थ भी अपने राजा से मिलने प्रयागराज, माघ में आते हैं। इसलिए श्रद्धालु भी पौष पूर्णिमा से माघी पूर्णिमा तक यहां रहना, अपना सौभाग्य मानते हैं। एक ही स्थान पर समय बिताते हुए प्रदोष, माघी पूर्णिमा, गुरु रविदास जयंती, जानकी जयंती, छत्रपति शिवाजी जयंती, दयानंद सरस्वती जयंती मिलजुल कर मनाते हैं। 

वृंदावन बांके बिहारी मंदिर, शाह बिहारी मंदिर, मथुरा के श्री कृष्ण जन्मस्थान और बरसाना के राधा जी मंदिर में ठाकुर जी को बसंत पंचमी के दिन पीली पोशाक पहनाई जाती है और पहला अबीर गुलाल लगा कर होलिका दहन के लिए ढाड़ा गाड़ा जाता है और बसंत पंचमी से फाग गाने की शुरुआत होती है। देश विदेश से श्रद्धालु ब्रजमंडल की होली में शामिल होने के लिए तैयारी शुरु कर देते हैं। बसंत पंचमी से ब्रज में चलने वाले 40 दिन का उत्सव चल रहा है। खिचड़ी मेला गुरु गोरखनाथ जी के मंदिर गोरखपुर (जिले का नाम गुरु गोरखनाथ के नाम पर है) में मकर संक्राति से शुरू है जो एक महीने से अधिक समय फरवरी तक चलता है। किसान अपनी पहली फसल की खिचड़ी चढ़ाने के लिए लाइनों में लगे होते हैं। इस प्रसाद की खिचड़ी को मंदिर की ओर से बनाया जाता है और विशाल मेले के साथ, मंदिर में खिचड़ी का भंडारा चलता है। रविवार और मंगलवार के दिन खास महत्व होता है। मेले में झूले और हर तरह के सामान, खाने पीने की दुकाने लगी रहती हैं। गुरु गोरखनाथ के खिचड़ी मेले में कोई भूखा नहीं रह सकता। खिचड़ी का प्रसाद खाओ और मेले का आनन्द उठाओ। देश के बड़े आयोजनों में यह मेला है।

बूरी बूूट युलो बसंत के स्वागत में अरुणाचल प्रदेश की न्याशी जनजाति जो राज्य की प्रमुख स्वदेशी जनजातियों में से एक है, उसके द्वारा यह जीवंत आनंदमय उत्सव मनाया जाता है। यह उत्सव बसंत आगमन के स्वागत में, अपने पूर्वजों की आत्माओं के सम्मान करने, भरपूर्व फसल के लिए आशीर्वाद मांगने और अपनी सांस्कृतिक विरासत का जश्न मनाने के लिए उत्सव बसंत से शुरु होकर कई दिन तक चलता है। 

जैसलमेर मरु उत्सव 30 जनवरी से 1 फरवरी यह राजस्थान के सबसे लोकप्रिय त्यौहारों में से एक है जो जैसलमेर से 42 किमी दूर थार रेगिस्तान की चमकदार रेत पर मनाया जाता है। दुनियाभर से पर्यटक यहां रण उत्सव के जीवंत और रंगीन माहौल को अनुभव करने आते हैं।  

केरल में अदूर के प्राचीन श्री पार्थसारथी मंदिर में फरवरी को आयोजित दस दिवसीय सांस्कृतिक कार्यक्रमों का समापन है। जिसमें हाथियों के प्रर्दशन का नजारा प्रमुख है।

उदयपुर विश्व संगीत महोत्सव फरवरी  को राजस्थान के उदयपुर में तीन खूबसूरत जगहों पर दिन के अलग अलग मूड को ध्यान में रखकर संगीत का प्रदर्शन होगा।

माघ पूर्णिमा को काशी में जन्में संत रविदास जयंती (1 फरवरी) पवित्र नदी में स्नान करके उनके रचे पदों दोहों को कीर्तन में गाया जाता है। उनका जीवन बताता है कि भक्ति के साथ सामाजिक, परिवारिक कर्त्तव्यों को भी निभाना चाहिए। उनका कहना था कि ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’

ब्राह्मण मत पूजिए जो होवे गुणहीन

पूजिए चरण चंडाल के, जो होवे गुण प्रवीण

सूरजकुंड अन्तर्राष्ट्रीय शिल्प मेला 1 से 16 फरवरी में भारत के शिल्प और स्थानीय कलाओं का आनन्द उठाने के लिए लाखों लोग फरीदाबाद पहुंचते हैं। ओपन एयर थियेटर में सांस्कृतिक कार्यक्रमों को देखना और स्थानीय व्यंजनों का आनन्द उठाना सबको बहुत भाता है।

कश्मीर में शिवरात्रि 15 फरवरी का उत्सव तीन चार दिन पहले से और दो दिन बाद तक मनाया जाता है। नेपाल का पशुपतिनाथ मंदिर यह ऐसा स्थान है। जिसके विषय में यह माना जाता है कि यहां आज भी शिव की मौजूदगी है। पशुपतिनाथ को उनके भक्त भोलेनाथ, महादेव, रुद्र, पंचमुखी, प्रभु पशुपतिनाथ कहते हैं। यहां भी कई अनोखी बातें और परंपराएं जुड़ी हैं। भालेश्वर महादेवी काठमांडू की चंद्रगिरि पहाड़ियों पर स्थित हिन्दू मंदिर है। यह भगवान शिव को समर्पित है। गलेश्वर मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था के कारण, मुख्यमंदिर को दूसरे पशुपति के नाम से भी जाना जाता है। 

दक्षिण भारत आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और तेलंगाना के सभी शिव मंदिरों में श्रद्धालुओं की लाइने लगी रहती हैं। उज्जैन में महाकालेश्वर और जबलपुर तिलवाड़ा में जाना अपना सौभाग्य समझा जाता है। भगवान शिव की जटाओं से उनकी पुत्री माँ नर्मदा की उत्पत्ति हुई है। अमरकंटक में घूमते हुए माँ की कहीं भी जलधारा मिल जातीं थीं इसीलिये कहते हैं ‘नर्मदा के कंकर सब शिवशंकर’।

बांग्लादेश के चंद्रनाथ धाम जो चिटगांव के नाम से प्रसिद्ध है। वहां कहते हैं इस दिन अभिषेक करने से सुयोग्य पति पत्नी मिलते हैं। नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर में देश दुनिया से श्रद्धालु पहुंचते हैं।

‘शिवरात्रि’ का अर्थ है भगवान शिव की महान रात्रि सभी हमारे हिन्दू उत्सव दिन में मनाये जाते हैं। पर इस पर्व में रात्रि के चारों पहर अभिषेक होता है। एक साधारण इंसान शिव के 28 अवतार, शिवपुराण नहीं जानता, उसे बस ये पता है कि भोलेनाथ बहुत जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं। इसलिए जैसा सुनता देखता है, वही उसकी पूजा की विधि बन जाती है। जिसे वह श्रद्धा से करता है और श्रद्धा से बुद्धि को बल मिलता है। तुलसीदास ने भी लिखा है- शिवद्रोही मम दास कहावा सो नर सपनेहु मोहि नहिं पावा। 

नृत्य महोत्सव नाट्यांजलि यह तमिलनाडु के कई नटराज मंदिरों के प्रांगण में एक सप्ताह तक मनाया जाने वाला त्यौहार है। सबसे संुदर आयोजन मंदिरों के शहर चिदाबंरम में होता है।

नागौर महोत्सव (15 से 18) के अंत में यह भव्य पशु मेला के कारण भी राजस्थान के ससे जीवंत त्योहारों में है। चार दिन राजस्थानी संगीत, लोक नृत्य और स्थानीय व्यंजनों का आनन्द लिया जाता है। तरह तरह की प्रतियोगिताएं आयोजित की जातीं हैं। हस्तशिल्प और आभूषणों की जमकर खरीदारी होती है। तीन महीने का रन उत्सव तो चल ही रहा है। 

महानंदा नवमीं को उड़ीसा और पश्चिम बंगाल में महानंदा नवमी मनाई जाती है। हरसू ब्रह्मदेव जयंती (16 फरवरी) भी मनाई जायेगी।

 परियानमपेट्टा पूरम 17 फरवरी को केरल पलक्कड़ जिले में परियानमपट्टा मंदिर स्थित है। यहां वार्षिक पूरम उत्सव मलयालम महीने कुंभम में मनाया जाता है। इसमें तीन जुलूस आयोजित किये जाते हैं जिसमें सजे हाथी भाग लेते हैं। 

फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिप्रदा से शुरू होने वाली विश्व प्रसिद्ध 84 कोसी (252 किमी) नैमिशारण्य परिक्रमा चक्रतीर्थ या गोमती नदी में स्नान करके, गजानन को लडडू का भोग लगा कर यात्रा शुरु करते हैं। रोज आठ कोस पैदल चलते हैं। 15 दिन तक ये यात्रा चलती है। महर्षि दधीचि ने अपनी अस्थियां दान देने से पहले तीर्थो का दर्शन करने की इच्छा प्रकट की थी। इंद्र ने सभी तीर्थों को नैमिशारण्य में 5 कोस की परिधी में आमंत्रित कर स्थापित किया। महर्षि दधीचि ने सबके दर्शन करके शरीर का त्याग किया था। दूर दूर से श्रद्धालु परिक्रमा करने आते हैं। यात्रा में लोगों का प्यार और सहयोग बहुत मिलता है। भंडारा, चाय और पीने के पानी की व्यवस्था रहती है। रामचरितमानस में भी लिखा है

तीरथ वर नैमिश विख्याता, 

अति पुनीत साधक सिद्धि दाता। 

कृष्ण भगवान अति व्यस्त होने के कारण कई दिनों तक वे राधा जी से मिलने नहीं पहुंचे तो राधा जी बहुत उदास हो गईं। जिसका असर प्रकृति पर भी पड़ने लगा। हरियाली मुरझाने लगी। यह देख कृष्ण राधा से मिलने पहुंच गए। उन्हें देख राधा जी बहुत खुश हुई और गोपियां भी चहकने लगीं और प्रकृति भी खिल उठी। कृष्ण नेे राधा को छेड़ते हुए एक फूल तोड़ कर मारा। बदले में राधा जी ने भी फूल मारा। अब दोनों ओर से फूल एक दूसरे को मारे जाने लगे। इस खेल में ग्वाल गोपियां भी फूल खेलों प्रतियोगिता में शामिल हो गए। उस दिन फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीय तिथि थी। तब से इस दिन को फुलैरा दूज (19 फरवरी) के रूप में मनाया जाता है। मंदिरों को फूलों से सजाते हैं। इस दिन बिना मुहूर्त के शुभ काम किए जाते हैं। इसी दिन श्रीरामकृष्ण की 190वीं जयंती बेलूर मठ में मनाई जायेगी।      

51वें खजुराहों नृत्य महोत्सव 20 से 26 फरवरी को मध्य प्रदेश कला परिषद् द्वारा आयोजित नृत्य उत्सव में दुनियाभर से पर्यटक पहुंचते हैं। 

हर नदी वहां के स्थानीय लोगों के लिये पवित्र है और उनकी संस्कृति और उत्सवों से अभिन्न रूप से जुड़ी है। नदियों को मां कहा जाता है। जैसे मां निस्वार्थ संतान का पोषण करती है। वैसे ही नदी हमें देती ही देती है। जीवनदायनी नदियों को लोग पूजते हैं, मन्नत मानते हैं। वनवास के समय सीता जी ने भी गंगा मैया पार करने से पहले, उनसे सकुशल वापिस लौटने की प्रार्थना की थी। इसलिए जानकी जयंती (26 फरवरी) पर श्रद्धालु पवित्र नदी का पूजन भी करते हैं। यही हमारे उत्सवों की मिठास है जिसमें प्रकृति भी हमारे साथ है।