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शाखा रूपी गंगा में उतरकर ही संघ को समझा जा सकता है - मुकुल कानिटकर जी

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 बलिया

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्थापना दिवस एवं विजयादशमी उत्सव के अवसर पर गुरुवार को बलिया नगर में पथ संचलन निकाला गया। पथ संचलन में बड़ी संख्या में स्वयंसेवकों ने पूर्ण गणवेश में घोष की धुन पर कदम मिलाते हुए अनुशासन, एकता, संगठन और समर्पण का संदेश दिया।

पथ संचलन चार स्थानों – टाउन हॉल परिसर, पशु चिकित्सालय, दयानन्द विद्या मंदिर (आर्य समाज रोड) तथा बिचला घाट स्थित श्री हनुमान मंदिर से एक साथ प्रारम्भ हुआ। विभिन्न मार्गों से होते हुए चारों संचलन शहीद पार्क चौक पर एकत्र हुए।

वीर लोरिक स्पोर्ट्स स्टेडियम में आयोजित बौद्धिक कार्यक्रम का शुभारम्भ कार्यक्रम अध्यक्ष अनुज सरावगी जी, मुख्य वक्ता मुकुल कानिटकर जी व अन्य अतिथियों ने भारत माता, माँ दुर्गा एवं भगवान श्रीराम के चित्र के सम्मुख दीप प्रज्ज्वलित कर किया।

अतिथियों के परिचय एवं एकलगीत के पश्चात मुकुल कानिटकर जी ने संघ एवं शाखा की भूमिका पर कहा कि जैसे गंगा में डुबकी लगाए बिना उसके पावित्र्य की अनुभूति नहीं हो सकती। गंगा को समझने के लिए उसमें उतरना पड़ता है। उसी प्रकार संघ को केवल पुस्तकें पढ़कर नहीं, बल्कि शाखा में आकर उसके संस्कारों एवं वातावरण को आत्मसात करके समझा जा सकता है। संघ को जानना है, तो शाखा रूपी गंगा में डुबकी लगानी ही पड़ेगी।

उन्होंने कहा कि पुस्तकें संघ का परिचय दे सकती हैं और संवाद जिज्ञासाओं का समाधान कर सकता है, लेकिन शाखा का प्रत्यक्ष अनुभव संघ के जीवन को निकट से समझने का अवसर देता है। शाखा केवल दैनिक गतिविधियों का केंद्र नहीं, बल्कि व्यक्ति निर्माण, अनुशासन, आत्मीयता, सेवा और सामूहिक उत्तरदायित्व विकसित करने का माध्यम है।

उन्होंने कहा कि संघ की सौ वर्षों की यात्रा इस विचार को रेखांकित करती है कि राष्ट्र का उत्थान केवल शासन अथवा व्यवस्थाओं के बल पर नहीं, बल्कि चरित्रवान व्यक्तियों, संगठित समाज और कर्तव्यनिष्ठ नागरिकों के सामूहिक प्रयासों से होता है। राष्ट्र की उन्नति के लिए प्रत्येक व्यक्ति का अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक होना आवश्यक है।

उन्होंने सामाजिक भेदभाव से ऊपर उठकर परस्पर आत्मीयता, समरसता और सहयोग का भाव विकसित करने पर बल दिया। उन्होंने कहा कि सेवा कार्यों के माध्यम से समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचना तथा नई पीढ़ी में संस्कार, स्वाभिमान और राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना जागृत करना समय की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा कि पथ संचलन केवल कदमताल का प्रदर्शन नहीं, बल्कि अनुशासन, एकता, सामूहिकता और राष्ट्र के प्रति समर्पण का प्रतीक है। स्वयंसेवकों की एकरूपता संदेश देती है कि व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर उठकर समाज एवं राष्ट्र के हित में कार्य करना ही संगठित जीवन का सार है।

उन्होंने कहा कि संघ का शताब्दी वर्ष आत्ममंथन के साथ भविष्य के लिए नए संकल्प लेने का अवसर है। प्रत्येक स्वयंसेवक को अपने आचरण, सेवा और सामाजिक सहभागिता के माध्यम से राष्ट्र जीवन में सकारात्मक परिवर्तन का वाहक बनना चाहिए। परिवार में संस्कार, समाज में समरसता, जीवन में अनुशासन और राष्ट्र के प्रति अटूट निष्ठा ही सशक्त भारत के निर्माण की आधारशिला हैं।