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भारतीय संविधान एवं नागरिक कर्त्तव्य: अतीत की विरासत, वर्तमान की चुनौतियां एवं भविष्य की संभावनाओं का सेतु

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भारतीय संविधान एवं नागरिक कर्त्तव्य: अतीत की विरासत, वर्तमान की चुनौतियां एवं  भविष्य की संभावनाओं का सेतु

भारत केवल भौगोलिक सीमाओं में बंधा हुआ राष्ट्र नहीं है, बल्कि यह एक जीवंत सभ्यता, बहुरंगी संस्कृति और लोकतांत्रिक चेतना का विराट संगम है। इस विशाल राष्ट्र को एक सूत्र में बांधने वाला सबसे सशक्त सूत्र है, भारतीय संविधान। संविधान केवल कानूनों का संकलन नहीं, बल्कि यह भारत की आत्मा, उसकी आकांक्षाओं और उसके नागरिकों के सपनों का दस्तावेज है। इसी संविधान की आधारशिला पर नागरिकों के अधिकारों के साथ-साथ कर्त्तव्यों की भी परिकल्पना की गई है। वर्तमान समय, जब समाज तीव्र परिवर्तन, तकनीकी उछाल, वैचारिक टकराव और नैतिक चुनौतियों से गुजर रहा है, तब भारतीय संविधान और नागरिक कर्त्तव्यों की प्रासंगिकता और भी अधिक गहन हो जाती है।

26 जनवरी 1950 को लागू हुआ भारतीय संविधान विश्व का सबसे विस्तृत लिखित संविधान है। यह न केवल शासन व्यवस्था की संरचना तय करता है, बल्कि नागरिकों और राज्य के बीच संबंधों की मर्यादा भी निर्धारित करता है। संविधान की प्रस्तावना-”हम भारत के लोग“  इस बात का उद्घोष है कि सत्ता का मूल स्रोत जनता है। संप्रभुता, समाजवाद, पंथनिरपेक्षता और लोकतंत्र जैसे मूल्य संविधान को केवल एक विधिक ग्रंथ नहीं, बल्कि नैतिक और वैचारिक मार्गदर्शक बनाते हैं।

आज के समय में, जब लोकतंत्र के मूल्य वैश्विक स्तर पर चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, भारतीय संविधान एक सशक्त ढाल के रूप में खड़ा दिखाई देता है। स्वतंत्र न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका के बीच संतुलन, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता का अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता,ये सभी प्रावधान आज भी भारत को एक जीवंत लोकतंत्र बनाए हुए हैं।

बदलते समय में संविधान की जीवंतता: संविधान की सबसे बड़ी विशेषता उसकी लचीलापन है। संशोधन की प्रक्रिया के माध्यम से यह समय की आवश्यकताओं के अनुसार स्वयं को ढालने की क्षमता रखता है। डिजिटल युग में निजता का अधिकार हो या सामाजिक न्याय की अवधारणा, संविधान ने नए संदर्भों में स्वयं को प्रासंगिक सिद्ध किया है। यह दर्शाता है कि संविधान कोई जड़ दस्तावेज नहीं, बल्कि एक जीवंत ग्रंथ है, जो समाज के साथ-साथ विकसित होता है।

आज जब सामाजिक असमानता, आर्थिक विषमता और पहचान की राजनीति जैसे प्रश्न उभर रहे हैं, संविधान का समानता और न्याय का सिद्धांत हमें यह स्मरण कराता है कि भारत की आत्मा समावेशन में निहित है, विभाजन में नहीं।

भारतीय संविधान का भाग 4अ जिसमें नागरिक कर्त्तव्यों का उल्लेख है, प्रायः अधिकारों की चमक में उपेक्षित रह जाता है। किंतु वास्तविक लोकतंत्र अधिकारों और कर्त्तव्यों के संतुलन से ही पुष्ट होता है। केवल अधिकारों की मांग और कर्त्तव्यों की उपेक्षा समाज को स्वार्थी और विघटनकारी बना सकती है।

भारतीय संविधान में निहित प्रमुख नागरिक कर्त्तव्य: वर्तमान में कुल 11 मौलिक कर्त्तव्य हैं जो निम्नलिखित है-

 1. संविधान, उसके आदर्शों और संस्थाओं का सम्मान करना, तथा राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान का आदर करना।

2. स्वतंत्रता संग्राम के उच्च आदर्शों का पालन करना।

3.भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करना।

4.देश की रक्षा करना और आवश्यकता पड़ने पर राष्ट्रीय सेवा करना।

5.सभी भारतीयों में सद्भाव और भाईचारे की भावना को बढ़ावा देना, तथा महिलाओं की गरिमा के विरुद्ध प्रथाओं का त्याग करना।

6.समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण करना।

7. प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और संवर्धन करना। वन, झील, नदी, वन्यजीव आदि की रक्षा करना और जीवों के प्रति करुणा रखना।

8.वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और सुधार की भावना का विकास करना।

9.सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना और हिंसा से दूर रहना।

10.व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों में उत्कृष्टता के लिए प्रयास करना, ताकि राष्ट्र निरंतर प्रगति करंे।

11. 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों को शिक्षा के अवसर प्रदान करना (माता-पिता/अभिभावकों का कर्त्तव्य)।

भारतीय संविधान ने अधिकारों को सुनिश्चित करके नागरिकों को सशक्त बनाया है, किंतु कर्त्तव्यों के माध्यम से उन्हें उत्तरदायी भी बनाया है। एक जागरूक नागरिक वही है जो अपने अधिकारों के प्रति सजग हो और अपने कर्त्तव्यों के प्रति प्रतिबद्ध। जब नागरिक मतदान करता है, कानून का पालन करता है, कर देता है और सामाजिक सौहार्द बनाए रखता है, तब लोकतंत्र केवल व्यवस्था नहीं, बल्कि संस्कृति बन जाता है।

आज के समय में जब व्यक्तिगत हित अक्सर सामूहिक हित पर हावी होते दिखते हैं, संविधान हमें यह याद दिलाता है कि राष्ट्र पहले है, व्यक्ति बाद में। यही भावना भारत को विविधताओं के बावजूद एक बनाए रखती है।

आज का भारत युवाओं का भारत है ऊर्जा, आकांक्षा और संभावनाओं से भरा हुआ। किंतु सोशल मीडिया के युग में अफवाहें, नकारात्मकता और असहिष्णुता भी तेजी से फैलती हैं। ऐसे समय में नागरिक कर्त्तव्य हमें संयम, विवेक और जिम्मेदारी की सीख देते हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उपयोग करते समय यह स्मरण आवश्यक है कि हमारी वाणी समाज को जोड़ने वाली हो, तोड़ने वाली नहीं।

पर्यावरण संरक्षण का कर्त्तव्य आज केवल नैतिक आग्रह नहीं, बल्कि अस्तित्व का प्रश्न बन चुका है। जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और संसाधनों के अंधाधुंध दोहन के बीच संविधान द्वारा प्रदत्त पर्यावरणीय चेतना अत्यंत प्रासंगिक हो उठती है। नागरिक यदि अपने कर्त्तव्यों को समझें, तो स्वच्छ भारत, हरित भारत और स्वस्थ भारत केवल नारे नहीं, बल्कि यथार्थ बन सकते हैं।

भारतीय संविधान एक प्रकाश स्तंभ है, जो अतीत की विरासत, वर्तमान की चुनौतियों और भविष्य की संभावनाओं के बीच सेतु का कार्य करता है। नागरिक कर्त्तव्य उस प्रकाश को दिशा देते हैं, ताकि लोकतंत्र केवल अधिकारों की मांग तक सीमित न रह जाए, बल्कि जिम्मेदार सहभागिता का उत्सव बन सके।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भारतीय संविधान और नागरिक कर्त्तव्यों की प्रासंगिकता पहले से कहीं अधिक है। यह हमें न केवल एक अच्छे नागरिक, बल्कि एक संवेदनशील मनुष्य बनने की प्रेरणा देता है। यदि हम संविधान की आत्मा को समझें और कर्त्तव्यों को जीवन में उतारें, तो भारत न केवल विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र, बल्कि सबसे सशक्त और नैतिक लोकतंत्र भी बन सकता है। यही संविधान की सच्ची विजय और नागरिक चेतना की सार्थकता है।


लेखक झम्मन लाल पी.जी. कॉलेज हसनपुर, अमरोहा के अंग्रेजी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर है।