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परिवार व्यवस्था को अधिक संस्कारवान बनाने की आवश्यकता

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 परिवार व्यवस्था को अधिक संस्कारवान बनाने की आवश्यकता 

परिवार व्यवस्था भारतीय समाज का महत्वपूर्ण अंग है। यह समाज का मानवता को दिया हुआ अनमोल उपहार है। भारतीय परिवार संरचना जीवन जीने के मूल्यों को सिखाती है। परिवार की संरचना सनातन काल से चली आ रही है। पौराणिक काल से भारतीय परिवार संरचना एक संयुक्त परिवार की थी। लेकिन औद्योगीकरण और नगरीकरण के बाद ये संयुक्त परिवार बिखरने लगे और एकल परिवारों का ट्रेंड तेजी से बढा है। इसके चलते समाज में संस्कारहीनता सहित अनेक प्रकार की विकृतियां पैदा हो गई हैं। इसलिए यह समाज के बुद्धिजीवियों के लिए चिंतन का विषय बन गया है।

भौतिकतावादी चिन्तन के कारण समाज में आत्मकेन्द्रित व कटुतापूर्ण व्यवहार, असीमित भोग-वृत्ति व लालच, मानसिक तनाव, सम्बंध विच्छेद आदि बुराइयां बढ़ती जा रही हैं। छोटी आयु में बच्चों को छात्रावास अथवा डे बोर्डिंग में रखने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। परिवार के भावनात्मक संरक्षण के अभाव में नई पीढ़ी में एकाकीपन भी बढ रहा है। परिणामस्वरूप नशाखोरी, हिंसा, जघन्य अपराध तथा आत्महत्याएं चिन्ताजनक स्तर पर पहुंच रही हैं। परिवार की सामाजिक सुरक्षा के अभाव में वृद्धाश्रमों की सतत वृद्धि हो रही है।

भारत में परिवार संस्था का अस्तित्व अत्यन्त प्राचीन काल से रहा है। आर्यों के प्राचीनतम ग्रन्थ ऋग्वेद से इस संस्था के स्वरूप पर प्रकाश पड़ता है। पूर्व वैदिक काल में संयुक्त परिवार की प्रथा थी जिसमें माता-पिता, पति-पत्नी, भाई-बहन, पुत्र-पुत्री आदि के साथ ही साथ अन्य सम्बन्धी साथ-साथ रहते थे।

सामाजिक संस्थाओं में परिवार का विशेष स्थान है। यह प्राचीन जीवन की मूलभूत इकाई है। परिवार के माध्यम से ही मानव अपना विकास करता है। परिवार से ही समाज का निर्माण होता है तथा यही नागरिक जीवन की प्रथम पाठशाला है। कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो परिवार से संबद्ध न हो। हमारी आवश्यकताएं परिवार के माध्यम से ही पूरी होती हैं। परिवार के अभाव में समाज का अस्तित्व ही संभव नहीं है। परिवार मनुष्य के जीवन की रक्षा करता है और जीवन की विभिन्न आवश्यकताओं को पूरा करता है। समाज की निरंतरता परिवार के माध्यम से ही बनी रहती है।

गृह्य सूत्रों में बड़े-बड़े परिवारों का उल्लेख मिलता है। सभी सदस्य पिता की आज्ञा का पालन करते थे। पिता की मृत्यु के बाद उसका बड़ा पुत्र गृहपति बनता था। बौद्ध काल में भी संयुक्त परिवार की प्रथा थी जिसमें सबसे ज्येष्ठ आयु का व्यक्ति गृहपति बनता था। हालांकि कभी-कभी परिवार के सदस्य पिता की आज्ञा के विरुद्ध भिक्षु जीवन में प्रवेश कर जाते थे। बौद्धों तथा जैनों ने गृहत्याग तथा मठ जीवन का आदर्श सामने रखा। इससे संयुक्त परिवार की व्यवस्था को गहरा आघात पहुंचा। पुरुषों के साथ-साथ कभी-कभी स्त्रियां भी अपना परिवार छोड़कर भिक्षुणी बन जातीं तथा घर से दूर मठों में निवास करती थीं। ऐसी स्थिति में संयुक्त परिवार के टूटने का संकट उत्पन्न हो गया। हिन्दू शास्त्रकारों ने परिवार को व्यवस्थित रखने के उद्देश्य से अनेक नियमों का विधान प्रस्तुत किया। मनुस्मृति में इस प्रकार के विधानों का विस्तृत विवरण प्राप्त होता है।

भारत में संयुक्त परिवार के अंतर्गत तीन या चार पीढ़ियां शामिल होती हैं। सभी एक छत के नीचे रहते हैं, काम करते हैं, और सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों में सहयोग करते हैं। टाटा, बिड़ला और साराभाई जैसे कई प्रमुख भारतीय परिवार आज भी संयुक्त परिवार व्यवस्था बनाए रखते हैं और वे देश के कुछ सबसे बड़े वित्तीय साम्राज्यों को नियंत्रित करने के लिए मिलकर काम करते हैं।

भारतीय संयुक्त परिवार संरचना एक प्राचीन परिघटना है, लेकिन 20वीं सदी के अंत में इसमें कुछ बदलाव आया है। बड़े परिवारों को अंततः आधुनिक भारतीय जीवन के अनुकूल होने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। आधुनिक जीवन शैली, आधुनिक व्यवसाय और विश्वास अंततः समायोजित होने के लिए समस्याओं का सामना कर रहे हैं। संयुक्त परिवार अब शहरों में काफी दुर्लभ है।

आधुनिकीकरण और नगरीकरण का चक्र तेज होने के साथ ही एकल परिवार विकसित हुए हैं। भारतीय संयुक्त परिवार और भी बड़े हो गए और अंत में वे समय के साथ एक अपेक्षित चक्र से गुजरते हुए छोटी इकाइयों में परिवर्तित हो गए। कुछ सदस्यों को रोजगार के अवसरों के लिए गांव से शहर या एक शहर से दूसरे शहर में जाने के कारण एकल परिवारों का विकास हुआ है।

संयुक्त परिवार व्यवस्था के विघटन के लिए कई कारक जिम्मेदार रहे हैं। आधुनिकीकरण ने लोगों की अधिक गतिशीलता, और विभिन्न संस्कृतियों के लोगों के बीच अधिक बातचीत को जन्म दिया है, जिससे लोगों के मूल्यों और संस्कृति पर प्रभाव पड़ा है। उदाहरण के लिए मेट्रो शहरों में “लिव-इन रिलेशनशिप”, विवाह पूर्व एक नया चलन है बढ़ा है।

नए रोजगार और शैक्षिक अवसरों की तलाश में युवा पीढ़ी की बढ़ती गतिशीलता ने पारिवारिक संबंधों को कमजोर कर दिया है। इसने बच्चों, बीमारों और बुजुर्गों की देखभाल और पोषण इकाई के रूप में परिवार की धारणा को प्रभावित किया है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में महिला प्रधान परिवार इकाइयों में भी वृद्धि हुई है। इसका कारण यह है कि पुरुष अक्सर कार्य की खोज में पलायन करते हैं। युवा पीढ़ी, विशेष रूप से उच्च शिक्षा और नौकरियों वाले अब पारिवारिक हितों के लिए व्यक्तिगत हितों का त्याग करने में विश्वास नहीं करते हैं। यह विवाह प्रणाली में विशेष परिवर्तन आया है।

चूंकि महिलाएं अब पूर्व की अपेक्षा अधिक शिक्षित एवं आर्थिक रूप से स्वतंत्र हैं, इसलिए घरेलू निर्णयों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यहां वैश्वीकरण के प्रभाव को आईटी से संबंधित नौकरियों में उनके उत्कर्ष को देखा जा सकता है। महिलाएं इस क्षेत्र का एक बड़ा भाग हैं। शहरी क्षेत्रों में अच्छी तरह से नियोजित महिलाओं को आजीविका कमाने के साथ-साथ घर के कामों के दोहरे कर्तव्य को संभालने के लिए बढ़ते दबाव का सामना करना पड़ता है।

यही नहीं, विवाहित पुरुष और महिलाएं अपने रोजगार के कारण भिन्न स्थानों पर अलग-अलग रह रहे हैं। समाज में एकल माता-पिता भी पाए जाते हैं। न केवल वैवाहिक संबंध बल्कि माता-पिता-बच्चों के संबंधों में भी उल्लेखनीय परिवर्तन आया है। अधिकांश कामकाजी दंपति परिवारों में, माता-पिता अपने बच्चों से मिलने और बातचीत करने के लिए समय नहीं दे पाते हैं, क्योंकि बीपीओ, केपीओ और कॉल सेंटर की नौकरियों में रात की पाली में काम करना आम बात है।

आज परिवार व्यवस्था को जीवंत तथा संस्कारवान बनाए रखने के लिए गंभीर और सार्थक प्रयासों की आवश्यकता है। समाज के हर वर्ग का यह दायित्व है कि वह अपने दैनन्दिन व्यवहार व आचरण से यह सुनिश्चित करे कि वो परिवार को पुष्ट करने वाला, संस्कारित व परस्पर संबंधों को सुदृढ़ करने वाला हो। सपरिवार सामूहिक भोजन, भजन, उत्सवों का आयोजन व तीर्थाटन, मातृभाषा का उपयोग, स्वदेशी का आग्रह, पारिवारिक व सामाजिक परंपराओं के संवर्धन व संरक्षण का प्रयास करे। इससे परिवार सुखी व आनंदित होंगे। 

परिवार व समाज परस्पर पूरक हैं। समाज के प्रति दायित्वबोध निर्माण करने के लिए सामाजिक, धार्मिक व शैक्षणिक कार्यों हेतु दान देने की प्रवृत्ति को प्रोत्साहन एवं अभावग्रस्त व्यक्तियों के यथासंम्भव सहयोग के लिए तत्पर रहना हमारे परिवार का स्वभाव बने। चूंकि समाज का निर्माण परिवार से और समाज से राष्ट्र का निर्माण होता है, इसलिए परिवार का स्वस्थ एवं सशक्त होना आवश्यक है। इसलिए समाज के बुद्धिजीवी एवं युवा पीढ़ी की अहम जिम्मेदारी है कि वे अपनी इस अनमोल परिवार व्यवस्था को अधिक से अधिक सजीव, प्राणवान और संस्कारवान बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम उठाएं।