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पीरूल से आत्मनिर्भर बनी महिलाएं

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देहरादून, उत्तराखण्ड

उत्तराखण्ड की पहाड़ियां जहां एक ओर प्राकृतिक सुंदरता और पर्यटन के लिए प्रसिद्ध हैं, वहीं दूसरी ओर यहां के लोग अपनी मेहनत और नवाचार से चुनौतियों को अवसर में बदलने की मिसाल भी पेश कर रहे हैं। जंगलों में लगने वाली आग जैसी समस्या के बीच अब पीरूलसे रोजगार पैदा कर महिलाओं ने एक नई उम्मीद जगाई है। जी हां, 15 फरवरी से अब तक लगभग 230 से ज्यादा वनाग्नि की घटनाएं हो चुकी हैं, इन आग की घटनाओं का मुख्य कारण पीरूलयानी चीड़ के पेड़ों की सूखी पत्तियां होती हैं, जो बहुत जल्दी आग पकड़ लेती हैं। लेकिन अब इसी पीरूल को पहाड़ की महिलाएं अपने रोजगार का साधन बना रही हैं। वे इससे टी कोस्टर, मैट, गुड़िया, कीचेन और कई तरह के सुंदर हस्तशिल्प तैयार कर रही हैं।

जेपी मैठाणी, जिन्होंने 1996 में बॉटनी से एमएससी की, 1997 से पीरूल पर काम कर रहे हैं। उनका उद्देश्य था कि इस समस्या को कम करते हुए इससे आमदनी का जरिया बनाया जाए। आज वे करीब 29 महिलाओं के साथ मिलकर एक ग्रोथ सेंटर चला रहे हैं।

महिलाएं पहले जंगल से पीरूल इकट्ठा करती हैं, फिर उसे पानी में भिगोकर सुखाया जाता है। इसके बाद धागों और बुनाई की मदद से उससे अलग-अलग उत्पाद बनाए जाते हैं। इस पहल से न केवल जंगलों में आग का खतरा कम करने में मदद मिल रही है, बल्कि स्थानीय महिलाओं को रोजगार भी मिल रहा है। यह एक अच्छा उदाहरण है कि कैसे समझदारी और मेहनत से किसी समस्या को अवसर में बदला जा सकता है।