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परंपरा छूती बाल सुलभ कहानी

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परंपरा छूती बाल सुलभ कहानी  

रामनगर सोसायटी का एक फ्लैट जो आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित था। इसमें रमेश जी और रत्ना देवी (दादाजी और दादीजी जी) थे। साथ ही उनका पुत्र और पुत्रवधू तथा दो बच्चे जो पौत्र तथा पौत्री थे। परिवार बड़े आनन्द पूर्वक अपने दिन गुजार रहा था।सोना और मोनू क्रमशः 10 और 8 की उम्र के थे। दादा, दादी के सरंक्षण में पल रहे बच्चे जीवन मूल्यों के अधिक निकट होते हैं सो ये बच्चे भी आदत अनुसार किसी अच्छे गुण के लिए अपने दादा, दादी से चर्चा जरूर करते 

सामान्य बच्चों की तरह ये भी दादी, नानी की कहानी से जुड़े थे। दिन हो या रात एक कहानी तो सुनते ही थे, और बाल मन से उसको अपनाने की भी कोशिश करते थे।

आज भी दादा, दादी नाश्ता कर लाबी में बैठे थे। दादाजी अखबार पढ़ रहे थे और दादीजी क्रोशिया और धागे से बुनाई कर रही थी। तभी दोनों बच्चे आपस में बतियाते हुए उनके पास आते हैं।

मोनू - दादाजी आज हमारी बात का विषय क्या रहेगा।

दादाजी अखबार मेज पर रखते हुए कहते हैं, हां, बताओ तो क्या नया चल रहा है। तभी उसे फोन पर पाकर देखते हुए कहते हैं,

 क्या तुम फोन के बिना जीवन की कल्पना आज-कल कर सकते हो।

नहीं दादाजी, मोबाइल तो आजकल के लिए जरूरी है। मोनू तपाक से बोला।

पर क्या बिना गूगल, यूं ट्यूब, के भी ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।

वह कैसे दादाजी, सोना पूजा की सजी थाल हाथ में लाते हुए उत्सुकता से बोली।

हमारी परंपराओं और कहानी के माध्यम से। पहले मोबाइल के साधन उपलब्ध नहीं थे। तब हम लोग इन्हीं परम्परागत कहानी के माध्यम से ज्ञान प्राप्त करते थे।

वो कैसे, दोनों एक स्वर में बोले।

अब दादी बोली तुमने (पूजा के थाल में दीया) घी, तेल का बनाया पर तुम्हें मालूम है, ये घी, तिल के तेल का ही दीया क्यों बनाते हैं। और पूजा मोमबत्ती से क्यों नहीं करते।

हां, हां दादी बताओं।

दादी क्रोशिया को सोचने की मुद्रा में लाते हुए बोली, पूजा आदिकाल से होती चली आ रही है। घी का दीपक जलाने से वातावरण में सात्विक तरंगें, उत्पन्न होती है तथा मन अपने आराध्य की तरफ जाता है। दिव्य ऊर्जा आती है, मन शांत होता है, सुख समृद्धि लाने के लिए भी शुद्ध घी का दीपक, शनि देव आदि की पूजा के लिए तिल का तेल या सरसों का तेल उत्तम होता है, मोमबत्ती के अंदर की असात्विक ज्वलनशील पदार्थ निकलते हैं जो वातावरण को स्वच्छ वायु नहीं प्रदान करते, और ये विदेशी परंपरा का द्योतक है। यह सब हमें परम्परा से ही पता चलता है और इतना ही नहीं परंपरा का हमारे जीवन में और भी महत्व है, दादाजी कुर्सी सीधी करते हुए बोले।

दादाजी, परंपरा हमारे लिए क्यों आवश्यक है कुछ और भी बताओ।

परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी से चली आ रही मान्यताओं, व्यवहार, रहन-सहन को दर्शाती है। यह अतीत के कार्य कलापों को वर्तमान से जोड़कर उनका मूल्यांकन करती है। परंपरा समुदाय की पहचान होती है, खान-पान, पहनावा, तीज त्यौहार से जड़ी होती है। परंपराएं एकाएक नहीं बदलती, पर समय और वस्तुस्थिति के अनुसार इसमें बदलाव आता है। यह सामाजिक दिशा देती है। लोगों में एकता और समरूपता लाती है।

भारत में ज्ञान और धार्मिक परम्परा चलन में है। लोग इनकी मान्यताओं के आधार पर चलते हैं।

 तभी सोना बोली उठी कि हमें परम्परा पालन करते हुए कोई कहानी सुनाओ।

भयी, कहानी सुनाने का काम तो तुम्हारी दादी करती है।

हां, हां दादी, सुनाओ न हमें इसके ऊपर कोई कहानी।

दादी क्रोशिया नीचे रखते हुए बोली, तुम अभी पूजा का थाल सजा कर लाई और आज ‘गुरु पूर्णिमा’ भी है, तो आज की कहानी गुरु, शिष्य परंपरा की सुनाती हूं।

  गुरु पूर्णिमा तो बच्चों तुम को मालूम ही है कि यह गुरु और शिष्य का त्योहार है बाकी गुरु पूर्णिमा की तरह इस बार भी सारे शिष्य अपनी सामर्थ्य अनुसार गुरु जी के लिए कोई न कोई उपहार लाए। इस दिन की ऐसी परम्परा ही है। माधव एक कोने में खड़ा रो रहा था।

दादी, माधव कौन था, रो क्यों रहा था। मोनू ने व्यग्रता से पूछा।

माधव बाकी शिष्यों की तरह एक शिष्य था गुरुजी का। पर वो बहुत गरीब था। अब सारे शिष्यों ने अपने-अपने उपहार गुरूजी को दे दिए। पर माधव के पास तो कुछ भी नहीं था, देने के लिए, तभी वह बाहर की ओर से भाग कर एक साफ ढेला मिट्टी का ले आया। और रोते हुए गुरूजी के चरणों में रख कर बोला, बस गुरु जी यही है।

फिर सोना उदास होते हुए बोली ‘दादी फिर क्या हुआ’।

दादी ने कहा, सारे शिष्य हंसने लगे और माधव का मजाक उड़ाते हुए बोले, ये तो मिट्टी है। इस पर गुरु जी ने उठकर रोते माधव को गले लगा लिया और कहा, आज का सबसे अच्छा उपहार ‘ये मिट्टी का ढेला ही है’।

मोनू फिर बोला, वह कैसे दादी।

शिष्य भी एक स्वर में गुरु जी से यही बोले।

तब गुरूजी ने बताया कि जो उपहार तुम लाए हो वह तो तुम्हारी तिजोरी से आए हैं, पर ये जो लाया है मेहनत, पूरी श्रृद्धा और लगन से लाया है। 

पर इससे परंपरा का पता कैसे चला, दादी, मोनू ने प्रश्न किया।

परंपरा का निर्वाह उसने माटी का ढेला लाकर दिया, क्यों कि भारत में मिट्टी को भारत मां माना गया है और मां का सम्मान हम पांव छूकर करते हैं। यही पूजनीय माटी वह गुरु के लिए लाया। अपने देश की माटी का सम्मान कर देश भक्ति परम्परा को निभाया। अहंकार का त्याग किया। धन से खरीदा उपहार कहीं न कहीं अहंकार को जन्म देता है। पूर्ण श्रद्धा से दे कर भाव परंपरा का निर्वाह किया। शबरी के बेर,  और सुदामा के तंदुल का उदाहरण है, जिसमें भाव प्रधान है 

और इसी परंपरा का निर्वाह करते हुए ‘गुरु शिष्य परंपरा’ का भी पता चलता है। गुरु को भगवान से भी ऊंचा स्थान दिया गया है। तभी तो इसी परंपरा के तहत् कहा गया है कि- 

गुरु, गोविंद दोउ खड़े, कांके लागूं पाय 

बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो मिलाय।

इससे हम ‘परंपरा संकल्प’ भी ले सकते हैं अपने से बड़ों का आदर करेंगे। रोज उठकर बड़ों के चरण स्पर्श करेंगे। किसी व्यक्ति की सहायता के लिए मना नहीं करेंगे 

मन में देश भक्ति की भावना रखेंगे। अभिमान की भावना नहीं रखेंगे। सबसे सहयोग से रहेंगे, संयमित व्यवहार करेंगे।

परंपराएं और कहानियां हमारी संस्कृति की रीढ़ होती है। परंपराओं का निर्वाह कहानियों के माध्यम से ही होता है। इससे हमें संस्कृति की प्रेरणा मिलती है। अपनी संस्कृति के बारे में पता चलता है।

ज्ञान में वृद्धि होती है एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचने का रास्ता है। रीति रिवाज और धार्मिक चीजों का पता चलता है, कहानियां परंपराओं की ‘सुरीली आवाज’ है। अगर कहानियां न हो तो परंपराएं इतिहास के नीचे दब कर खो जाएं। जिस पेड़ की जड़ें जितनी गहरी होती है, वह उतनी ही मजबूती से खड़ा रहता है, उसी तरह जो बच्चा परंपरा और बड़ों के संस्कारों से जुड़कर काम करता है, उतना ही सफल होता है।

दादी, आज की ये शिक्षा हम याद रखेंगे।