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आस्था के साथ सेवा का संकल्प, सास को कांवड़ में लेकर निकली बहू

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हापुड़, उत्तर प्रदेश

भारतीय संस्कृति में परिवार केवल रिश्तों का नहीं, बल्कि सेवा, सम्मान और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। हमारे संस्कार सिखाते हैं कि बड़ों की सेवा सबसे बड़ा धर्म है। हरिद्वार से सामने आई यह तस्वीर इन्हीं पारिवारिक मूल्यों और भारतीय संस्कृति की सुंदर झलक प्रस्तुत करती है।

जी हां, कांवड़ यात्रा को भगवान शिव के प्रति आस्था और गंगाजल लाने की परंपरा के रूप में देखा जाता है। लेकिन इस बार हरिद्वार से एक ऐसी तस्वीर सामने आई, जिसने लोगों का दिल जीत लिया। उत्तर प्रदेश के हापुड़ की रहने वाली पिंकी अपनी वृद्ध सास ऊषा देवी को विशेष कांवड़ में बैठाकर हरिद्वार से हापुड़ तक पैदल यात्रा कर रही हैं। ऊषा देवी की लंबे समय से गंगा स्नान और कांवड़ यात्रा करने की इच्छा थी। लेकिन अधिक उम्र और कमजोर स्वास्थ्य के कारण उनके लिए यह यात्रा करना संभव नहीं था।   परिवार में चार बेटे होने के बावजूद उनकी इस इच्छा को पूरा करने का जिम्मा उनकी बहू पिंकी ने उठाया.   

पिंकी सबसे पहले अपनी सास को हरिद्वार के हर की पैड़ी लेकर पहुंचीं, जहां उन्होंने विधि-विधान से गंगा स्नान कराया। इसके बाद विशेष रूप से तैयार कांवड़ में उन्हें बैठाकर हापुड़ तक की पैदल यात्रा शुरू की। यह यात्रा केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि सेवा और समर्पण का भी उदाहरण बन गई है। पिंकी का कहना है कि सास की सेवा करना उनके लिए बोझ नहीं, बल्कि सौभाग्य की बात है। उनका मानना है कि जिस तरह माता-पिता अपने बच्चों के लिए पूरी जिंदगी त्याग करते हैं, उसी तरह बुढ़ापे में उनकी सेवा करना परिवार का कर्तव्य है।

इस यात्रा में परिवार की सबसे छोटी सदस्य राधा भी अपनी दादी का पूरा साथ दे रही है। वह रास्ते भर कभी कांवड़ संभालने में मदद करती है तो कभी दादी का ध्यान रखती है। उसकी सेवा भावना और संस्कार देखकर लोग उसकी भी खूब सराहना कर रहे हैं। यात्रा के दौरान जहां-जहां से यह परिवार गुजर रहा है, वहां श्रद्धालु रुककर उनका अभिवादन कर रहे हैं। कई लोग पिंकी को आधुनिक श्रवण कुमार की संज्ञा दे रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी इस परिवार की सेवा भावना और संस्कारों की खूब चर्चा हो रही है।

यह यात्रा दिखाती है कि कांवड़ केवल गंगाजल लाने की परंपरा नहीं, बल्कि सेवा, त्याग, सम्मान और परिवार के प्रति जिम्मेदारी का भी संदेश देती है। पिंकी और उनकी बेटी राधा ने अपने व्यवहार से भारतीय संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों की एक प्रेरणादायक प्रेरणा प्रस्तुत की है। परिवार तभी मजबूत बनता है, जब उसमें सेवा, सम्मान और अपनापन जीवित रहता है। बड़ों का आदर और उनकी सेवा केवल कर्तव्य नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी पहचान है। यही कुटुंब प्रबोधन का संदेश है कि परिवार में प्रेम, संस्कार और जिम्मेदारी की भावना पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़े, तभी समाज और राष्ट्र भी मजबूत बनते हैं।