मुरादाबाद, उत्तर प्रदेश
जब खेती धीरे-धीरे बाजार पर निर्भर होती जा रही थी और किसानों को हर फसल के लिए नए बीज खरीदने पड़ रहे थे, तब कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्होंने अलग सोच अपनाई। ऐसे ही एक किसान थे मुरादाबाद के समाथल गांव के रघुपत सिंह, जिन्होंने आत्मनिर्भर खेती की मिसाल प्रस्तुत की। जी हां, रघुपत सिंह एक साधारण किसान थे, जिनके पास कम जमीन थी और खेती में लगातार नुकसान हो रहा था। उन्होंने समझ लिया कि अगर किसान अपने बीज खुद नहीं बचाएंगे, तो खेती मुश्किल होती जाएगी। इसी सोच के साथ उन्होंने अपने खेत को ही प्रयोगशाला बना लिया।
उन्होंने करीब 50 साल तक देसी और उन्नत बीजों को बचाने और विकसित करने का काम किया। खास बात यह थी कि वे ये बीज किसानों को निःशुल्क में देते थे। उन्होंने सब्जियों और दालों की कई नई किस्में तैयार कीं, जो आज भी कई किसान प्रयोग कर रहे हैं।शुरुआत में उन्हें कई बार असफलता मिली। बाजार से खरीदे गए बीज खराब हो जाते थे और नुकसान बढ़ता था। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। वे हर फसल में सबसे अच्छे पौधों को चुनते, उनसे बीज तैयार करते और अगले साल फिर वही बीज बोते। इस तरह धीरे-धीरे उन्होंने बेहतर बीज तैयार कर लिए।
उनकी मेहनत और
सोच की वजह से उन्हें मरणोपरांत पद्मश्री सम्मान देने की घोषणा की गई। यह सम्मान
सिर्फ रघुपत सिंह का नहीं, बल्कि उस सोच का है जो खेती को आत्मनिर्भर और
मजबूत बनाती है।



