गणतंत्र का महापर्व
भारत की राजनैतिक परम्परा में गणतंत्र दिवस का उतना ही महत्व है जितना कि किसी व्यक्ति के जीवन में अन्नप्राशन संस्कार का होता है। कोई व्यक्ति मात्र जन्म लेने से ही अपना शारीरिक सौष्ठव और सुडौलता नहीं प्राप्त कर सकता है अपितु उसके लिए शरीर की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति से उसकी रुपरेखा की सुदृढ़ नीव रखी जाती है, उसी प्रकार भारत भी स्वतंत्रता-प्राप्ति मात्र से ही एक अनुकरणीय लोकतान्त्रिक गणतंत्र के रूप में परिवर्तित नहीं हो गया था। कहने को तो भारत के साथ ही पाकिस्तान भी एक राष्ट्र के रूप में जन्मा था किन्तु दोनों देशों की राजनैतिक प्रणालियों और परम्परों में जमीन आसमान का अंतर दृष्टिगोचर होता है। भारत के संपन्न राजनैतिक वैभव व अखंड लोकतंत्रतिक परंपरा के मूल में वस्तुतः गणतंत्र दिवस की समृद्ध थाती ही रही है। दूसरे शब्दों में, देश को स्वतंत्रता 15 अगस्त 1947 को मिली थी परन्तु इसकी राजनैतिक नवचैतन्यता को ठोस और सुदृढ़ आधार गणतंत्र दिवस के द्वारा ही प्रदान किया गया था।
इस सन्दर्भ में यह जानना रोचक रहेगा कि आखिर क्यों 26 जनवरी को ही संविधान को लागू करने का निर्णय लिया गया। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जब ब्रिटिश दासता से मुक्ति के लिए देश की आत्मा तड़पड़ा रही थी तो इसे स्वर देने के लिए कांग्रेस द्वारा समय-समय पर अनेक प्रस्ताव पारित किये गए थे। झेलम नदी के तट पर, लाहौर में कांग्रेस ने 26 जनवरी 1929 को देश की पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव पारित किया और अंग्रेजी हुकूमत से मांग की कि अब वे देश छोड़कर जाएं। इस से पहले कांग्रेस ने देश के लिए ‘डोमिनियन स्टेटस’ मांगा था जिसका अर्थ था कि भारत ब्रिटिश साम्राज्य का अंग बना रहेगा। ब्रिटेन की रानी भारत की भी साम्राज्ञी बनी रहेंगी और भारत केवल आतंरिक शासन हेतु ही स्वतंत्र होगा। इसी तर्ज पर कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड जैसे अनेक देश स्वतंत्र हुए किन्तु वे ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा बने रहे। किन्तु 26 जनवरी 1929 के दिन भारत ने तय किया कि अब उसे पूर्ण संप्रभु राष्ट्र से कम कुछ भी स्वीकार्य नहीं है। अतः जब स्वतंत्र भारत की संविधान सभा ने अथक परिश्रम के बाद 26 नवम्बर 1949 को संविधान को अंगीकार किया तो यह तय हुआ कि इस विशद संविधान का क्रियान्वयन 26 जनवरी 1950 से किया जायेगा जिससे कि 26 जनवरी की तिथि की ऐतिहासिकता बनी रहे। तदुपरांत 26 जनवरी को देश में गणतंत्र का महापर्व मनाया जाने लगा।
गणतंत्र दिवस के महापर्व को तीन निश्चित रूपों से प्रारूपित किया जा सकता है। प्रथम, गणतान्त्रतिक व्यवस्था को अंगीकार करके देश ने प्रतिस्थापित किया कि अब भारत का प्रत्येक नागरिक समान सम्मान और इज्जत से देश की राजनैतिक प्रक्रियाओं में प्रतिभागी बनेगा। पारम्परिक राजों-रजवाड़ों और अन्य कुलीन लोगों के लिए अब समाज में कोई विशिष्ठ स्थान नही रहेगा। भारतीय राज्य का मुखिया एक निर्वाचित राष्ट्रपति होगा न कि कोई खानदानी राजा या रानी। इन्ही संवैधानिक प्रावधानों का प्रतिफल है कि आज देश के शीर्ष राजनीतिक पदों पर विराजमान महानुभाव अत्यंत सामान्य और वंचित पारिवारिक पृष्ठभूमियों से आते हैं।
द्वितीय, भारतीय शासन व्यवस्था का स्वरुप लोकतंत्रतिक गणराज्य के रूप में प्रतिस्थापित किया गया है। इसका अर्थ यह है कि भारतीय शासन व्यवस्था की आत्मा यहाँ के सामान्य जनमानस में विराजमान होगी। वही भारत के भाग्यविधाता होंगे। इस लोकतांत्रतिक प्रक्रिया में व्यावहारिक पक्ष का निष्पादन समय-समय पर होने वाले चुनाव द्वारा किया जायेगा। अब पारम्परिक खानदानी शासकों की परंपरा के स्थान पर सामान्य लोगों के मध्य से निर्वाचित जन प्रतिनिधि ही शासन की बागडोर अपने हाथ में रखेंगे। किसी भी प्रकार की तानाशाही तथा अधिनायकवादी प्रवृतियों के लिए देश में कोई स्थान नहीं बचेगा। इस प्रकार लोकतांत्रात्रिक व्यवस्था भारत के करोङों लोगों में एक नयी राजनैतिक चेतना का संचार करेगीं और वे एक सुषुप्त जनमानस के स्थान पर एक चैतन्य राष्ट्र के जागृत नागरिक के रूप में शासन के विविध क्रियाकलापों में अपनी महती भूमिका का निर्वहन करेंगे।
तृतीय, गणतांत्रिक व्यवस्था के नाते भारतीय राजनैतिक व्यवस्था के दो अन्य वैशिष्ठ्य देश को विश्व में एक अनूठी और अनुकरणीय स्थान प्रदान करते हैं। पहला, देश में लोकतांत्रतिक गणराज्य की स्थापना के मूल में लोगों को उन मौलिक अधिकारों को अक्षुण रूप में प्रदान कराना था जिनके बिना सभ्य और सुसंस्कृत जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। जिन मौलिक अधिकारों के विचार को पश्चिम की देन माना जा रहा है और गैर-पश्चिमी देशों के नागरिकों को उनका अपात्र माना जा रहा है, वे सारे अधिकार भारत में प्राचीन काल से ही लोगों को सहज सुलभ हैं और वर्तमान समय में भी ये अधिकार भारत के नागरिकों को अक्षुण रूप में मिले हुए हैं। यह वास्तव में सम्पूर्ण विश्व के लिए एक आश्चर्य था कि कैसे भारत में मौलिक अधिकार अति सामान्य रूप से उपलब्ध हो गए जबकि अन्य पश्चिमी देशों में इनके लिए विराट जन आंदोलन चलाये गए। दूसरा, आधुनिक लोकतान्त्रिक गणतंत्रीय राजनैतिक प्रणालियों का वैशिष्ठ्य रहा है कि वहां पर देश के विविध सैन्य बल सदैव लोक-निर्वाचित सरकारों के अधीन रहे हैं। जिस देशों में ऐसे नहीं हो पाया उन देशों में लोकतान्त्रिक परम्परों का सतत अवमूल्यन होता रहा है और अंततः लोकतांत्रतिक शासन प्रणाली के स्थान पर सैनिक शासन की स्थापना हो जाती है। इस दृष्टि से भारत फिर से दुनिया के सामने एक अनुकरणीय उदाहरण बन कर उभरा और सिद्ध किया की भारत में लोकतांत्रतिक गणतंत्रीय मूल्य शाश्वत, पुरातन एवं चिरजीवी हैं।
देश में 26 जनवरी को प्रति वर्ष मनाया जाने वाला गणतंत्र महापर्व वास्तव में इन्हीं जीवंत लोकतान्त्रिक मूल्यों के पुनःस्मरण करने और इनके प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराने का उपक्रम है। कालांतर में गणतंत्र दिवस समारोह में अनेक ऐसे आयाम जुड़ते गए जिनसे इस महापर्व की छटा उत्तरोत्तर बढ़ती गयी। वर्तमान में गणतंत्र दिवस के अवसर पर राजपथ पर निकलने वाली सैन्य परेड देश की भौतिक शक्ति का शालीन प्रकटीकरण माना जाता है। इसी प्रकार इस अवसर पर उपस्थित रहने वाला किसी न किसी मित्र देश का राष्ट्राध्यक्ष इस बात का संकेत देता है कि शेष विश्व भारत की सैन्य शक्ति से भयभीत न होकर इस बात के लिए आश्वस्त रहता है कि भारत में शक्ति सदा सर्वदा शांति की स्थापना और लोक कल्याण के लिए सृजित की जाती रही है न कि किसी अन्य देश को आक्रांत करने के लिए।




