हिन्दू और हिन्दुत्व की अवधारणा सार्वकालिक और वैश्विक है – भय्याजी जोशी
रमेश पतंगे द्वारा लिखित ‘समाज संघटनेचा वारसा आणि संघ’ पुस्तक का विमोचन
पुणे, पश्चिम महाराष्ट्र।
विचारक एवं लेखक रमेश पतंगे द्वारा लिखित पुस्तक ‘समाज संघटनेचा वारसा आणि संघ’ के विमोचन समारोह में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारिणी के सदस्य भय्याजी जोशी ने कहा कि “हिन्दू और हिन्दुत्व की अवधारणा सार्वकालिक और वैश्विक है। उन्हें किसी संप्रदाय की संकुचित सीमा में बिठाना उचित नहीं है। हम वास्तव में कौन हैं, इस स्वत्व का बोध हिन्दुओं को हुआ तो समाज में व्याप्त सभी भेदभाव अपने आप समाप्त हो जाएंगे”।
उन्होंने कहा कि विदेशी आक्रमणों के कारण हम अपनी व्यापक जीवन दृष्टि भूल गए और संकुचितता में फंस गए। इस भूली हुई नींव को फिर से मजबूत बनाकर समाज में एकात्मता निर्माण करने का काम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कर रहा है।
पुस्तक विमोचन समारोह का आयोजन मंगलवार (26 मई) को भारत इतिहास संशोधक मंडल के वि. का. राजवाडे सभागार में किया गया था। भारतीय विचार साधना प्रकाशन ने समारोह का आयोजन किया, जिसमें भारत इतिहास संशोधक मंडल के अध्यक्ष प्रदीप तथा दादा रावत, भारतीय विचार साधना के अध्यक्ष डॉ. गिरीश आफळे और कार्यवाह काशीनाथ देवधर मंच पर उपस्थित रहे।
भय्याजी जोशी ने कहा, “रमेश पतंगे जैसे कर्मठ व्यक्ति ने संघ स्थापना की एक अलग और अध्ययनशील प्रस्तुति पुस्तक द्वारा की है। यह संदर्भ भविष्य में मार्गदर्शक साबित होंगे। हिन्दू कोई संप्रदाय नहीं, बल्कि एक जीवन दृष्टि है। इस पर आधारित जीवन मूल्य कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक सबके लिए एक जैसे हैं। हमारी भाषा, भगवान, तीर्थ स्थल और धर्म ग्रंथ किसी एक जाति के नहीं, बल्कि सबके हैं। ‘हम किसी एक विशिष्ट जाति के हैं’, इस संकुचित भावना के कारण ही समाज विभाजित हुआ। संकुचित संकल्पनाओं के कारण इस समाज रूपी इमारत का क्षरण रोकने का कार्य समय-समय पर संतों ने किया। वउसी विरासत को आगे बढ़ाते हुए डॉक्टर हेडगेवार ने संघ के माध्यम से ‘हम सब एक हैं’ की भावना समाज में स्थापित की।
उन्होंने कहा कि परस्पर पूरकता और परस्परावलंबन ही भारतीय चिंतन की नींव है। ‘भारत माता की जय’, इस एक घोषणा से सभी प्रांतीय व जातीय भेदभाव समाप्त हो जाते हैं। संघ समाज से अलग संगठन नहीं, बल्कि वह समाज का ही अंग है।
पुस्तक के लेखक रमेश पतंगे जी ने कहा कि “संघ शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में ‘आम्ही संघात का आहोत?’ पुस्तक प्रकाशित हुई। उसी के अगले हिस्से के रूप में इस पुस्तक का प्रकाशन हो रहा है। सामाजिक समरसता मंच का काम करते समय प्रदीर्घ पठन से संघ कार्य की व्याप्ति और गहराई से अवगत होता गया। भगवान बुद्ध ने जिस तरह भारतीय ज्ञानमार्ग पर चलते हुए ज्ञान प्राप्त कर सारनाथ में धम्मचक्र प्रवर्तन किया और गिने चुने लोगों के साथ संघ शुरू किया, वही समानता डॉ. हेडगेवार की संघ स्थापना में दिखती है। बुद्ध के बाद पैदा हुए खालीपन को आगे गोरखनाथ और वारकरी-धारकरी संप्रदाय ने दूर किया। वही वैचारिक यात्रा गुरु नानकदेव, स्वामी दयानंद, वीर सावरकर, डॉ. बाबा साहेब आंबेडकर से डॉ. हेडगेवार तक जारी रही। इस संपूर्ण वैचारिक परंपरा का दर्शन जन साधारण को हो, इसलिए इस पुस्तक का लेखन किया है।”
दादा रावत ने कहा, “आज के संघ विचार के पीछे प्राचीन विचार और प्रबोधन युग के विचार, दो मुख्य स्रोत हैं। हमारी यह परंपरा वारकरी और धारकरी परंपरा के कारण ही टिकी हुई है। इसी के बल पर हम 1000 वर्षों तक प्रदीर्घ संघर्ष कर पाए। हिन्दू समाज को दूरदर्शी विचार देने वाले महापुरुष प्राप्त होने के कारण ही हिन्दू समाज और हिन्दुत्व टिक पाया है। इन सभी महानुभावों के प्रयोगों और परंपराओं की बेहतरीन समीक्षा रमेश जी ने पुस्तक में की है।”



