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वर्तमान समय में शास्त्रार्थ की अपरिहार्यता

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वर्तमान समय में शास्त्रार्थ की अपरिहार्यता 

भारतीय सभ्यता की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषताओं में से एक उसकी समृद्ध ज्ञान परम्परा रही है। इस परम्परा में आध्यात्मिक चिन्तन के साथ ही दर्शन, तर्क, भाषा, साहित्य, राज्यशास्त्र, न्याय, चिकित्सा तथा जीवन के विविध आयामों पर गंभीर विमर्श और शास्त्रार्थ की समृद्ध परम्परा विकसित हुई। भारत में ज्ञान को स्थिर और प्रश्नातीत परमादेश के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि उसे निरन्तर विमर्श, परीक्षण और बौद्धिक अनुशीलन के माध्यम से समझने का प्रयास किया गया। इसी विमर्शपरक परम्परा का परिष्कृत और व्यवस्थित स्वरूप है - शास्त्रार्थ।  
28 जून 2026 के ‘मन की बात’ कार्यक्रम में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने शास्त्रार्थ को वाद, संवाद और मंथन की एक अनुशासित एवं ज्ञानोन्मुख प्रक्रिया के रूप में रेखांकित किया। उन्होंने इसे तकनीक-प्रधान युग में युवाओं को अपनी सांस्कृतिक एवं बौद्धिक जड़ों से जोड़ने का एक सशक्त माध्यम बताया तथा देश के विश्वविद्यालयों से आह्वान किया कि वे शास्त्रार्थ की इस पद्धति को शिक्षा व्यवस्था में समाविष्ट करने की संभावनाओं पर गंभीरतापूर्वक विचार करें।  
सामान्य धारणा में शास्त्रार्थ को प्रायः केवल वाद-विवाद, आध्यात्मिक बहस अथवा दार्शनिक प्रतिस्पर्धा के रूप में देखा जाता है, किन्तु वास्तव में यह भारतीय ज्ञानमीमांसा और तर्कपरम्परा का एक गम्भीर पद्धतिगत आधार है। इसका उद्देश्य केवल प्रतिपक्ष को पराजित करना नहीं था, बल्कि मित्रवत संवाद और सहभागी स्वरूप में विषय-वस्तु के प्रमाणिक स्वरूप तक पहुंचना था। ऋग्वेदकाल से ही शास्त्रार्थ की विधि का प्रयोग ज्ञान-सृजन, ज्ञानार्जन, बौद्धिक स्पष्टता, ज्ञान-परिष्कार, तत्त्वज्ञान- संक्षरण तथा ज्ञान के प्रचार-प्रसार आदि में होता रहा है। भारतीय ज्ञान-परम्परा में शास्त्रार्थ को संवाद-कौशल तथा ज्ञान- साधना के महत्त्वपूर्ण माध्यम के रूप में स्वीकार किया गया। शिक्षण एवं प्रशिक्षण की प्रक्रियाओं में शैक्षणिक संस्थानों में इसका व्यापक प्रयोग होता रहा है। साथ ही, शास्त्रार्थ ने भारतीय न्याय-प्रणाली, राजकीय निर्णय-प्रक्रिया तथा पंचायत जैसे मध्यस्थता मंचों को भी बौद्धिक आधार प्रदान किया है। आधुनिक ज्ञान-प्रणाली की दृष्टि से देखें तो शास्त्रार्थ में एक वैज्ञानिक शोध-पद्धति वैज्ञानिक पद्धति के प्रमुख तत्त्व - परिकल्पना, प्रमाण, तर्क, परीक्षण, खंडन, सत्यापन, वस्तुनिष्ठता, आगमन, निगमन, सामान्यीकरण आदि विद्यमान हैं। 
वैदिक आधार और संवाद की प्राचीन चेतना: शास्त्रार्थ की मूल प्रेरणा भारतीय वैदिक साहित्य में निहित है। ऋग्वेद में अनेक मन्त्र ऐसे हैं जो संवाद, सामूहिक चिन्तन और बहुविध विचारों की स्वीकृति का समर्थन करते हैं। ऋग्वेद का प्रसिद्ध मन्त्र- ”आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः“। यह उद्घोष करता है कि सभी दिशाओं से श्रेष्ठ और कल्याणकारी विचार हमारे पास आएं। यह केवल काव्यात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि भारतीय बौद्धिक दृष्टि का मूलभूत सिद्धान्त है। इससे स्पष्ट होता है कि भारतीय परम्परा में ज्ञान को किसी एक व्यक्ति, पंथ, दर्शन, पूजा-पद्धति, सम्प्रदाय या ग्रन्थ तक सीमित नहीं माना गया। वैदिक ऋषियों ने प्रत्येक विषय पर सम्यक्, समग्र, सर्वसमावेशी तथा बहुआयामी दृष्टि से विचार किया है। वे यह भली-भाँति जानते थे कि वायु के साथ प्रायः कूड़ा-करकट भी घर के भीतर प्रवेश कर जाता है। इसीलिए ऋग्वेद में ज्ञान के परीक्षण का स्पष्ट निर्देश है- 
सक्तुमिव तितउना पुनन्तो यत्र धीरा मनसा वाचमक्रत।       

जैसे सत्तु (जौ और चने के दानों को पीसकर बनाई गई आटा) छानकर तैयार की जाती है, जिससे तिनका और अन्य अशुद्धियां अलग हो जाती हैं, उसी प्रकार बुद्धिमान मित्रों की सभा में वाणी को छाना जाता है। वे अपनी बुद्धि का उपयोग करके वाणी से अशुद्धियों को हटा देते हैं और केवल वास्तविक ज्ञान को स्वीकार करते हैं। इस प्रकार, बुद्धिमान लोग मित्रवत् प्रकार से अपने मित्रों से ज्ञान ग्रहण करते हैं। ऐसी वाणी में कल्याणी, लक्ष्मी और नितारा निवास करती हैं। 
आधुनिक शिक्षा और बौद्धिक संरचना की चुनौती: वर्तमान में भारत में शिक्षा, प्रशिक्षण तथा पेशेवर व्यवहार में प्रयुक्त अधिकांश शोध-पद्धतियाँ, सिद्धांत और मॉडल विदेशी स्रोतों एवं प्रतिमानों पर आधारित हैं। यह आयातित बौद्धिक उत्पाद मुख्यतः यूरो-अमेरिकी विद्वानों द्वारा उनके समाजों और आवश्यकताओं के अनुरूप किए गए अनुभवजन्य अध्ययनों पर आधारित हैं, जो भारतीय सामाजिक- सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में प्रायः उपयुक्त नहीं होते। परिणामस्वरूप, शिक्षा का एक बड़ा भाग केवल प्रतिरूपों की पुनरावृत्ति तक सीमित हो जाता है और विद्यार्थियों की स्वतंत्र चिन्तन-क्षमता तथा रचनात्मकता बाधित होने लगती है। 
जब किसी समाज की शिक्षा व्यवस्था उसकी अपनी सांस्कृतिक और बौद्धिक परम्पराओं से कट जाती है, तब विद्यार्थी धीरे-धीरे अपने ही ज्ञान-संसार के प्रति उदासीन होने लगते हैं। विदेशी बौद्धिक दृष्टिकोणों के अत्यधिक प्रभाव से अनेक बार विद्यार्थियों में अपनी संस्कृति और राष्ट्र के प्रति हीन भावना विकसित हो जाती है तथा ”विदेशी मूल की श्रेष्ठता“ का भ्रम जन्म लेता है। यदि इस प्रवृत्ति को समय रहते संतुलित न किया जाए, तो यह भारतीय ज्ञान प्रणाली के प्रति अविश्वास अथवा उपेक्षा तक पहुंच सकती है। बीसवीं सदी से ही यह विषय राष्ट्रवादी विचारधारा के विद्वानों के चिंतन का प्रमुख विषय रहा है। इस संदर्भ में पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने देशानुकूलन और युगानुकूलन की अवधारणा प्रस्तुत की है। 
भारत की विशाल और समृद्ध ज्ञान-परम्परा के होते हुए भी यह एक विडम्बना है कि अंतरराष्ट्रीय बौद्धिक जगत में हमारी भूमिका प्रायः केवल एक उपभोक्ता तक सीमित दिखाई देती है। जबकि भारतीय परम्परा में संवाद, संचार, अर्थशास्त्र, तर्क, ज्ञानमीमांसा, मनोविज्ञान, भाषाशास्त्र, नैतिकता, विधायी कार्य, विधि-व्यवसाय, नीति-निर्माण, और समाज कार्य आदि के अत्यन्त विकसित सिद्धान्त विद्यमान रहे हैं। आवश्यकता इस बात की है कि इन सिद्धान्तों का समकालीन परिप्रेक्ष्य में पुनर्पाठ किया जाए और उन्हें शास्त्रार्थ की पद्धति के आलोक में सामाजिक और मानविकी विषयों में अनुसंधान हेतु नई पद्धतियों का विकास किया जाए। 
समकालीन समाज में शास्त्रार्थ की प्रासंगिकता: वर्तमान समय सूचना-विस्फोट, वैचारिक धु्रवीकरण और डिजिटल संचार का युग है। सामाजिक मीडिया और त्वरित संप्रेषण माध्यमों ने संचार को तीव्र तो बनाया है, किन्तु उसके साथ असत्य, भ्रम, प्रचार और भावनात्मक उकसावे की समस्या भी बढ़ी है। अनेक बार तथ्य और तर्क की अपेक्षा उत्तेजना और प्रचार अधिक प्रभावी दिखाई देते हैं। ऐसी स्थिति में शास्त्रार्थ की पद्धति अत्यन्त प्रासंगिक हो उठती है। 
शास्त्रार्थ हमें सिखाता है कि किसी भी निष्कर्ष तक पहुँचने से पहले प्रमाण, तर्क और बहुविध दृष्टिकोणों का परीक्षण आवश्यक है। यह संवाद में धैर्य, श्रवण और बौद्धिक विनम्रता का संस्कार विकसित करता है। आधुनिक शिक्षा के क्षेत्र में शास्त्रार्थ आलोचनात्मक चिन्तन को विकसित करने में अत्यन्त सहायक हो सकता है। यदि विद्यार्थियों को केवल सूचनाएं देने के स्थान पर प्रश्न, प्रतिप्रश्न और विमर्श की पद्धति से शिक्षित किया जाए, तो उनमें विश्लेषणात्मक क्षमता और स्वतंत्र चिन्तन का विकास होगा। इससे भाषण, लेखन और प्रस्तुति कौशल में भी वृद्धि होगी। 
मीडिया और पत्रकारिता के क्षेत्र में भी शास्त्रार्थीय दृष्टि उपयोगी है। राष्ट्र निर्माण और विकास में मीडिया की रचनात्मक भूमिका पर गंभीर विमर्श के लिए प्रमाणाधारित संवाद आवश्यक है। तथ्य-जांच, स्रोत-विश्लेषण, बहुपक्षीय दृष्टिकोण और उत्तरदायी अभिव्यक्ति। ये सभी शास्त्रार्थीय पद्धति के मूल तत्त्व हैं। कॉर्पाेरेट और जनसंपर्क क्षेत्र में कार्यरत पेशेवरों के लिए भी शास्त्रार्थ संवाद-कुशलता को विकसित करने का प्रभावी माध्यम बन सकता है। इससे तर्कपूर्ण प्रस्तुतीकरण, सक्रिय श्रवण और संतुलित संप्रेषण की क्षमता बढ़ती है, जो किसी भी पेशेवर वातावरण में अत्यन्त आवश्यक है। विधिक और न्यायिक क्षेत्र में शास्त्रार्थ की उपयोगिता और भी स्पष्ट दिखाई देती है। विधिक प्रारूपण, वाद-विवाद और न्यायशास्त्र में प्रमाण, तर्क और प्रतिवाद की जो संरचना दिखाई देती है, वह भारतीय शास्त्रार्थीय परम्परा के निकट है। सामाजिक कार्यकर्ताओं और जनसंगठनों के लिए भी शास्त्रार्थ उपयोगी सिद्ध हो सकता है। संवाद-कौशल में वृद्धि के माध्यम से वे समाज के विभिन्न वर्गों के साथ अधिक प्रभावी संप्रेषण स्थापित कर सकते हैं। यह पद्धति संघर्ष के स्थान पर संवाद, सहमति और सामाजिक समरसता के निर्माण पर बल देती है।
शास्त्रार्थ की तर्काधारित पद्धति युवाओं में तार्किक प्रतिरक्षा शक्ति और समालोचनात्मक चिन्तन का निर्माण कर सकती है। इससे वे किसी भी सूचना, दावे या विचार को बिना परीक्षण के स्वीकार करने के स्थान पर उसका विवेकपूर्ण विश्लेषण कर सकेंगे। इस प्रकार शास्त्रार्थ न केवल डिजिटल युग की चुनौतियों से निपटने में सहायक है, बल्कि सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने की दृष्टि से भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। 
आज आवश्यकता इस बात की है कि शास्त्रार्थ को केवल धार्मिक बहस या ऐतिहासिक परम्परा के रूप में न देखा जाए, बल्कि उसे एक तर्काधारित, प्रमाणसम्मत और नैतिक संवाद-पद्धति के रूप में पुनः समझा जाए। जब समाज संवाद खो देता है, तब वैचारिक संघर्ष और असहिष्णुता बढ़ती है; किन्तु जब संवाद तर्क, प्रमाण और सम्मान पर आधारित होता है, तब ज्ञान, सह-अस्तित्व और सामाजिक समरसता का विकास होता है। भारतीय शास्त्रार्थ इसी उच्च बौद्धिक संस्कृति का प्रतिनिधि है और आधुनिक विश्व को अधिक संतुलित, उत्तरदायी और विवेकपूर्ण संवाद की दिशा प्रदान कर सकता है।  

(सिद्धेश्वर शुक्ल हाल ही में प्रकाशित पुस्तक ‘शास्त्रार्थ इन इंडियाः मेथडोलॉजी एंड एप्लीकेशन्स’ के लेखक हैं।)