अयोध्या, उत्तर प्रदेश
अयोध्या का दीपोत्सव केवल आस्था और परंपरा का उत्सव नहीं, बल्कि
स्थानीय लोगों के लिए रोजगार और आत्मनिर्भरता का भी एक बड़ा अवसर बन रहा है। जी
हां, सीएम योगी आदित्यनाथ के इस महत्वाकांक्षी आयोजन से कुम्हार परिवारों
की पारंपरिक कला को नई पहचान मिल रही है। लाखों दीयों के ऑर्डर मिलने से उनकी
आमदनी बढ़ रही है और गांवों में रोजगार के नए रास्ते खुल रहे हैं। अब कई युवा
दूसरे शहरों में काम तलाशने के बजाय अपने गांव में रहकर ही मेहनत और हुनर के दम पर
आजीविका कमा रहे हैं।
बता दें, अयोध्या धाम के पास स्थित जयसिंहपुर
गांव के बृज किशोर प्रजापति के परिवार को इस बार एक लाख दीये बनाने का ऑर्डर मिला
है। वहीं, गांव के राजेश प्रजापति को दो लाख दीये
तैयार करने का काम मिला है। कुम्हार परिवारों के अनुसार, सामान्य
दिनों में उनकी कमाई सीमित रहती है, लेकिन
दीपोत्सव के दौरान बड़े ऑर्डर मिलने से अच्छी आमदनी का अवसर मिलता है। इससे उनके
परिवारों की आर्थिक स्थिति मजबूत होने की उम्मीद है।
दीपोत्सव से मिल रहे अवसरों ने कुम्हार परिवारों को आधुनिक तकनीक
अपनाने के लिए भी प्रेरित किया है। इलेक्ट्रिक चाक की मदद से अब कम समय में अधिक
दीये बनाए जा रहे हैं। जयसिंहपुर, विद्याकुंड और सोहावल के ड्योढ़ी गांव
में परिवार के सदस्य मिट्टी तैयार करने, दीये
बनाने और उन्हें सुखाने में जुटे हैं। इससे पारंपरिक कला को बढ़ावा मिलने के साथ
उत्पादन क्षमता भी बढ़ रही है।
दीपोत्सव के आयोजन में राम की पैड़ी पर 30 लाख दीये जलाने का लक्ष्य
रखा गया है। अवध विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. बिजेंद्र सिंह के अनुसार, 15
लाख दीये गोदाम में पहुंच चुके हैं और प्रतिदिन छह लाख दीयों की आपूर्ति की जा रही
है। आयोजन के लिए 55 हजार लीटर सरसों के तेल की व्यवस्था की जा रही है। साथ ही, करीब
35 हजार स्वयंसेवकों की भागीदारी और 56 घाटों तक दीये पहुंचाने की तैयारियां भी की
जा रही हैं।
अयोध्या का दीपोत्सव भारतीय संस्कृति और परंपरा को भव्य रूप देने के
साथ स्थानीय कारीगरों के हुनर को भी आगे बढ़ा रहा है। कुम्हार परिवारों के लिए यह
आयोजन अतिरिक्त कमाई, गांवों में रोजगार और नई पीढ़ी को
पारंपरिक कला से जोड़ने का माध्यम बन रहा है। मिट्टी के दीयों से रोशन होने वाली
रामनगरी के साथ उन परिवारों के जीवन में भी उम्मीद की नई रोशनी पहुंच रही है, जिनकी
मेहनत इस उत्सव को खास बनाती है।



