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युवा शक्ति से समरस समाज की नई तस्वीर

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युवा शक्ति से समरस समाज की नई तस्वीर 

उत्तर प्रदेश के युवा भारतीय संस्कृति के समरसता, सेवा और राष्ट्रनिर्माण के आदर्शों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। वे जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्रीय भेदभाव से ऊपर उठकर शिक्षा, खेल, सामाजिक सेवा, पर्यावरण संरक्षण, रक्तदान, आपदा राहत तथा स्वच्छता अभियानों में सक्रिय भागीदारी निभा रहे हैं। राष्ट्रीय सेवा योजना, भारत स्काउट्स एवं गाइड्स तथा विभिन्न युवा संगठनों के माध्यम से वे समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर कार्य कर रहे हैं। अयोध्या में श्रीराम मंदिर से जुड़े सेवा कार्यों, प्रयागराज महाकुंभ में स्वयंसेवी सेवाओं तथा हर घर तिरंगा और मेरी माटी मेरा देश जैसे अभियानों में युवाओं की सहभागिता ने सामाजिक सद्भाव, राष्ट्रीय एकता और समरसता की भावना को सशक्त किया है। यही युवा शक्ति विकसित और समरस उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी आधारशिला है।

भारत की सांस्कृतिक चेतना का मूल आधार समरसता, सह-अस्तित्व और लोककल्याण की भावना है। हमारे ऋषि-मुनियों ने हजारों वर्ष पूर्व ही यह उद्घोष किया था-‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः’ अर्थात सभी सुखी हों और सभी निरोग रहें। इसी प्रकार ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का सिद्धांत सम्पूर्ण विश्व को एक परिवार मानने की प्रेरणा देता है। भारतीय संस्कृति में समाज का विकास तभी पूर्ण माना गया है, जब उसमें किसी भी प्रकार का भेदभाव, वैमनस्य अथवा असमानता न हो प्रत्येक व्यक्ति को सम्मान तथा समान अवसर प्राप्त हो। आज जब भारत विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब समरस समाज के निर्माण की आवश्यकता पहले से अधिक बढ़ गई है। इस लक्ष्य की प्राप्ति में उत्तर प्रदेश के युवाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह राज्य न केवल भारत की सर्वाधिक जनसंख्या वाला प्रदेश है, बल्कि सबसे बड़ी युवा शक्ति का भी प्रतिनिधित्व करता है।

भारतीय चिंतन में युवा केवल आयु का नहीं, बल्कि ऊर्जा, साहस, सेवा, त्याग और राष्ट्रनिर्माण का प्रतीक है। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि राष्ट्र का भविष्य उसके युवाओं के चरित्र और संकल्प पर निर्भर करता है। उत्तर प्रदेश के युवा शिक्षा, विज्ञान, कृषि, खेल, उद्यमिता, डिजिटल तकनीक, सामाजिक सेवा और सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से समाज को नई दिशा दे रहे हैं। यदि यह युवा शक्ति भारतीय जीवन मूल्यों से प्रेरित होकर कार्य करे, तो सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता दोनों सुदृढ़ होंगी।

समरस समाज का अर्थ केवल सामाजिक समानता नहीं है, बल्कि ऐसा समाज है जहाँ जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र और आर्थिक स्थिति के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव न हो। भारतीय संविधान में निहित न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के आदर्श इसी समरस समाज की स्थापना का मार्ग प्रशस्त करते हैं। भारतीय संस्कृति में यह भावना केवल सिद्धांत नहीं, बल्कि जीवन का व्यवहार रही है। भगवान श्रीराम ने वनवास के दौरान निषादराज गुह को गले लगाया, माता शबरी के प्रेम से अर्पित बेर स्वीकार किए तथा वानर-भालू समाज को अपने साथ लेकर धर्म की स्थापना की। इन प्रसंगों का संदेश स्पष्ट है कि भारतीय समाज का आधार जन्म नहीं, बल्कि मानवता, सदाचार और कर्तव्य है।

भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में लोकसंग्रह अर्थात सम्पूर्ण समाज के कल्याण के लिए कर्म करने का संदेश दिया। महात्मा गांधी ने सर्वाेदय के माध्यम से अंतिम व्यक्ति के उत्थान की बात कही। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने सामाजिक समानता और संवैधानिक अधिकारों को लोकतंत्र की आत्मा बताया, जबकि पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद ने व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र को एक-दूसरे का पूरक माना। इन सभी विचारों का मूल उद्देश्य समरस समाज की स्थापना था।

उत्तर प्रदेश संतों और महापुरुषों की भूमि रही है। संत कबीर ने जाति-पाँति के भेदभाव का विरोध करते हुए कहा कि मनुष्य की पहचान उसके कर्म और आचरण से होती है। संत रविदास ने ऐसे समाज की कल्पना की जहाँ किसी प्रकार का ऊँच-नीच न हो। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में लोकमंगल और सामाजिक समन्वय का संदेश दिया। इन संतों की शिक्षाएँ आज भी उत्तर प्रदेश के युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।

आज उत्तर प्रदेश के युवा अनेक ऐसे कार्य कर रहे हैं जो समरस समाज की भावना को व्यवहार में उतारते हैं। राष्ट्रीय सेवा योजना (एनएसएस), नेहरू युवा केंद्र, भारत स्काउट्स एवं गाइड्स तथा विभिन्न स्वयंसेवी संगठनों से जुड़े हजारों युवा गाँवों और शहरों में स्वच्छता अभियान, रक्तदान शिविर, साक्षरता अभियान, पौधरोपण, स्वास्थ्य जागरूकता, नशा मुक्ति और पर्यावरण संरक्षण जैसे कार्यक्रमों का संचालन करते हैं। इन अभियानों में समाज के प्रत्येक वर्ग की भागीदारी होती है। सेवा के समय किसी की जाति, धर्म या आर्थिक स्थिति नहीं देखी जाती, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति को समान सम्मान और सहयोग दिया जाता है। यही भारतीय समरसता का वास्तविक स्वरूप है।

कोविड-19 महामारी के दौरान उत्तर प्रदेश के युवाओं ने मानवता और सेवा का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया। अनेक स्वयंसेवी युवाओं ने अस्पतालों में रक्तदान किया, ऑक्सीजन सिलेंडर उपलब्ध कराए, गरीब परिवारों तक भोजन पहुँचाया, दवाइयों की व्यवस्था की तथा अकेले रह रहे बुजुर्गों की सहायता की। उस कठिन समय में सेवा करने वालों ने यह नहीं देखा कि सहायता पाने वाला व्यक्ति किस धर्म या जाति से है। उनके लिए प्रत्येक पीड़ित मानव सेवा का अधिकारी था। भारतीय संस्कृति के ‘नर सेवा ही नारायण सेवा’ का यह जीवंत स्वरूप समाज में समरसता की भावना को और अधिक मजबूत करता है।

प्रयागराज महाकुंभ जैसे विशाल धार्मिक आयोजन भी समरसता के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। यहाँ हजारों युवा स्वयंसेवक स्वच्छता, चिकित्सा सहायता, यातायात व्यवस्था, जल वितरण, खोया-पाया केंद्र और श्रद्धालुओं की सहायता में दिन-रात सेवा करते हैं। इसी प्रकार अयोध्या में श्रीराम मंदिर से जुड़े सेवा कार्यों में भी अनेक युवाओं ने श्रमदान, स्वच्छता, जनसहयोग और श्रद्धालुओं के मार्गदर्शन में योगदान दिया। इन कार्यों ने यह सिद्ध किया कि भारतीय संस्कृति में सेवा ही समाज को जोड़ने का सबसे प्रभावी माध्यम है।

डिजिटल युग में युवाओं की भूमिका और भी व्यापक हो गई है। सोशल मीडिया केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का सशक्त उपकरण भी है। उत्तर प्रदेश के अनेक युवा डिजिटल मंचों के माध्यम से रक्तदान अभियान चलाते हैं, प्रतियोगी परीक्षाओं की निःशुल्क तैयारी कराते हैं, गरीब विद्यार्थियों को ऑनलाइन पढ़ाते हैं, पर्यावरण संरक्षण का संदेश देते हैं और आपदा के समय राहत कार्यों के लिए जनसहयोग जुटाते हैं। इसके साथ ही उनकी यह जिम्मेदारी भी है कि वे फर्जी समाचार, अफवाह और सामाजिक वैमनस्य फैलाने वाली सामग्री से बचें तथा सत्य, संयम और जिम्मेदार संवाद को बढ़ावा दें।

ग्रामीण विकास के क्षेत्र में भी उत्तर प्रदेश के युवा उल्लेखनीय कार्य कर रहे हैं। अनेक युवा अपने गाँवों में पुस्तकालय स्थापित कर रहे हैं, डिजिटल शिक्षा केंद्र चला रहे हैं, महिला स्वयं सहायता समूहों को तकनीकी प्रशिक्षण दे रहे हैं, स्थानीय उत्पादों को ऑनलाइन बाजार से जोड़ रहे हैं तथा जैविक खेती और जल संरक्षण जैसे अभियानों को बढ़ावा दे रहे हैं। इससे केवल आर्थिक विकास ही नहीं होता, बल्कि समाज के विभिन्न वर्गों के बीच सहयोग, विश्वास और आत्मीयता भी बढ़ती है।

समरस समाज के निर्माण के लिए केवल सरकारी योजनाएँ पर्याप्त नहीं हैं। परिवार, विद्यालय, विश्वविद्यालय, धार्मिक संस्थाएँ, सामाजिक संगठन और मीडिया सभी को युवाओं के भीतर सेवा, संवेदना, अनुशासन और राष्ट्रभक्ति के संस्कार विकसित करने होंगे। शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि ऐसा नागरिक तैयार करना होना चाहिए जो अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने सामाजिक दायित्वों को भी समझे। जब युवा संविधान के मूल्यों और भारतीय संस्कृति के आदर्शों को व्यवहार में उतारेंगे, तभी समाज में स्थायी समरसता स्थापित होगी।

आज उत्तर प्रदेश विकसित भारत की यात्रा का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन रहा है। औद्योगिक विकास, स्टार्टअप, डिजिटल अवसंरचना, कौशल विकास और रोजगार के नए अवसर युवाओं को आगे बढ़ने का मंच प्रदान कर रहे हैं। अब आवश्यकता इस बात की है कि युवा केवल व्यक्तिगत सफलता तक सीमित न रहे, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति के उत्थान को भी अपना दायित्व समझें। सेवा, सद्भाव, सामाजिक न्याय, पर्यावरण संरक्षण और राष्ट्रीय एकता को अपने जीवन का उद्देश्य बनाकर ही वे भारतीय विचारधारा के वास्तविक प्रतिनिधि बन सकते हैं।

अंततः यह कहा जा सकता है कि समरस समाज का निर्माण भारतीय संस्कृति का शाश्वत आदर्श है और उत्तर प्रदेश के युवा इस आदर्श को साकार करने की सबसे बड़ी शक्ति हैं। जब युवा अपने जीवन में ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’, ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’, ‘नर सेवा ही नारायण सेवा’ और ‘लोकसंग्रह’ जैसे भारतीय जीवन-मूल्यों को अपनाकर समाज के प्रत्येक व्यक्ति के साथ समान व्यवहार करेंगे, तब समरस समाज का स्वप्न साकार होगा। उत्तर प्रदेश का युवा यदि सेवा को संस्कार, राष्ट्र को परिवार और मानवता को अपना धर्म मानकर आगे बढ़े, तो वह न केवल राज्य, बल्कि पूरे भारत को सामाजिक समरसता, राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की नई दिशा प्रदान कर सकता है।

लेखक आईआईएमटी कॉलेज ऑफ मैनेजमेंट के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर है।