ऊर्जा संकट में स्वदेशी की जरूरत - डॉ. शशांक शर्मा
आज पूरी दुनिया एक गंभीर ऊर्जा संकट के दौर से गुजर रही है। ऊर्जा अब केवल विकास का साधन नहीं रही, बल्कि यह वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा का सबसे महत्वपूर्ण आधार बन चुकी है। पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस और कोयले जैसे पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों पर अत्यधिक निर्भरता ने विश्व को अस्थिर बना दिया है। अंतरराष्ट्रीय युद्ध, बढ़ता शहरीकरण, गांवों से पलायन और उपभोक्तावादी जीवनशैली ने इस संकट को और अधिक गहरा कर दिया है। भारत जैसे विकासशील देश के लिए यह संकट केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक, पर्यावरणीय और सांस्कृतिक चुनौती भी है। ऐसे समय में स्वदेशी और आत्मनिर्भरता की भावना ही स्थायी समाधान का मार्ग दिखाती है।
भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता देश है, लेकिन अपनी आवश्यकता का लगभग 85 से 89 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में होने वाला उतार-चढ़ाव सीधे भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है। रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया में तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति बाधित हुई, जिससे कच्चे तेल और गैस की कीमतों में भारी वृद्धि हुई। हाल के अंतरराष्ट्रीय तनावों के कारण भारत को अपने तेल आयात की रणनीति में लगातार बदलाव करना पड़ा है। ऊर्जा संकट का प्रभाव केवल ईंधन की कीमतों तक सीमित नहीं रहता। जब तेल महंगा होता है, तो परिवहन लागत बढ़ती है, खाद्य पदार्थ महंगे होते हैं, उद्योगों का उत्पादन खर्च बढ़ता है और महंगाई आम जनता पर बोझ बन जाती है। भारत का वार्षिक कच्चा तेल आयात वर्ष 2025 में लगभग 242 मिलियन टन तक पहुंच गया। यह स्थिति बताती है कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा अभी भी बाहरी परिस्थितियों पर अत्यधिक निर्भर है।
वर्तमान समय में बढ़ता शहरीकरण भी ऊर्जा संकट का एक प्रमुख कारण बन गया है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, भारत में शहरी आबादी तेजी से बढ़ रही है और आने वाले वर्षों में यह वृद्धि और अधिक होगी। गांवों से लोग रोजगार, शिक्षा और आधुनिक सुविधाओं की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। परिणामस्वरूप महानगरों में बिजली, पानी, परिवहन और ईंधन की मांग लगातार बढ़ रही है। बहुमंजिला इमारतें, वातानुकूलित कार्यालय, मॉल, मेट्रो और निजी वाहन ऊर्जा की अत्यधिक खपत करते हैं। एक अध्ययन के अनुसार, शहरीकरण बढ़ने के साथ ऊर्जा उपयोग और कार्बन उत्सर्जन में कई गुना वृद्धि होती है। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार भारत में वर्ष 2040 तक ऊर्जा की मांग लगभग दोगुनी हो सकती है। यदि यही उपभोक्तावादी मॉडल जारी रहा, तो ऊर्जा संकट और पर्यावरण संकट दोनों बढ़ेंगे। इसलिए स्वदेशी जीवनशैली केवल सांस्कृतिक विचार नहीं, बल्कि भविष्य की आवश्यकता बन चुकी है।
गांवों से पलायन केवल सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि ऊर्जा संकट से भी जुड़ा विषय है। भारतीय गांव परंपरागत रूप से आत्मनिर्भर रहे हैं। कृषि, पशुपालन, बायोगैस, लकड़ी, जैविक ईंधन और सामुदायिक जीवन गांवों की ऊर्जा व्यवस्था का आधार थे। लेकिन आधुनिक उपभोक्तावादी संस्कृति और केंद्रीकृत विकास मॉडल ने गांवों की अर्थव्यवस्था को कमजोर कर दिया। परिणामस्वरूप ग्रामीण युवा रोजगार के लिए शहरों की ओर जा रहे हैं। यदि गांवों में स्थानीय उद्योग, कुटीर रोजगार, सौर ऊर्जा और बायोगैस संयंत्र विकसित किए जाएँ, तो न केवल पलायन कम होगा, बल्कि ऊर्जा की विकेंद्रीकृत और टिकाऊ व्यवस्था भी विकसित होगी। भारत में गर्मी के बढ़ते प्रभाव और शहरी जीवनशैली ने बिजली की मांग को रिकॉर्ड स्तर तक पहुँचा दिया है। मई 2026 में भारत की बिजली मांग 270 गीगावॉट से अधिक दर्ज की गई, जो अब तक का उच्चतम स्तर है। लगातार बढ़ती बिजली मांग के कारण कई राज्यों में बिजली कटौती की स्थिति भी उत्पन्न हुई। यह स्पष्ट संकेत है कि यदि ऊर्जा संरक्षण और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर ध्यान नहीं दिया गया, तो भविष्य में संकट और गंभीर हो सकता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि भारत ऊर्जा के क्षेत्र में स्वदेशी और आत्मनिर्भरता की ओर बढ़े। स्वदेशी का अर्थ केवल देश में बनी वस्तुओं का उपयोग नहीं, बल्कि स्थानीय संसाधनों, स्थानीय तकनीकों और भारतीय जीवन मूल्यों पर आधारित विकास मॉडल अपनाना है। भारत के पास सूर्य, पवन, जल, कृषि अवशेष और जैविक संसाधनों का विशाल भंडार है। यदि इनका वैज्ञानिक और योजनाबद्ध उपयोग किया जाए, तो भारत विदेशी ईंधन पर निर्भरता को काफी हद तक कम कर सकता है। भारत में सौर ऊर्जा की अपार संभावनाएँ हैं। देश के अधिकांश भागों में वर्ष भर पर्याप्त धूप उपलब्ध रहती है। गांवों में सौर ऊर्जा आधारित सिंचाई, स्ट्रीट लाइट और घरेलू बिजली व्यवस्था विकसित की जा सकती है। इसी प्रकार गोबर गैस, बायोमास और कृषि अवशेषों से ऊर्जा उत्पादन ग्रामीण क्षेत्रों को आत्मनिर्भर बना सकता है। इससे पर्यावरण संरक्षण भी होगा और किसानों की आय में भी वृद्धि होगी। भारत सरकार ने वर्ष 2030 तक 500 गीगावॉट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता विकसित करने का लक्ष्य रखा है। यह लक्ष्य केवल ऊर्जा उत्पादन नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। गांवों में सौर ऊर्जा आधारित सिंचाई, बायोगैस संयंत्र, स्थानीय उद्योग और कुटीर रोजगार विकसित करके पलायन को रोका जा सकता है। इससे ऊर्जा की विकेंद्रीकृत व्यवस्था भी मजबूत होगी।
महात्मा गांधी ने ग्राम स्वराज और स्वदेशी को आत्मनिर्भर भारत का आधार माना था। भारतीय संस्कृति सदैव प्रकृति के साथ संतुलन और सहअस्तित्व की बात करती है। ”सादा जीवन, उच्च विचार“ तथा ‘अपरिग्रह’ जैसे भारतीय मूल्य आज ऊर्जा संरक्षण और सतत विकास के लिए अत्यंत प्रासंगिक हैं। ऊर्जा संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। यदि हम सार्वजनिक परिवहन का उपयोग बढ़ाएं, अनावश्यक बिजली खपत कम करें, साइकिल और पैदल चलने की संस्कृति अपनाएं तथा स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता दें, तो ऊर्जा बचत संभव है। ”नो पेट्रोल डे“ जैसे अभियान समाज में जागरूकता बढ़ाने के प्रभावी माध्यम बन सकते हैं।
अंततः कहा जा सकता है कि वर्तमान ऊर्जा संकट केवल ईंधन की कमी का संकट नहीं, बल्कि असंतुलित विकास मॉडल की चुनौती है। वैश्विक युद्ध, बढ़ता शहरीकरण और गांवों से पलायन ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है। यदि भारत स्वदेशी, आत्मनिर्भरता और सतत विकास के मार्ग को अपनाता है, तो वह न केवल ऊर्जा संकट से उबर सकता है, बल्कि विश्व को पर्यावरण संतुलन और मानव कल्याण का नया मार्ग भी दिखा सकता है। आज समय की मांग है कि ऊर्जा संरक्षण को जनआंदोलन बनाया जाए और स्वदेशी जीवनशैली को अपनाकर आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित भविष्य का निर्माण किया जाए।
लेखक - डॉ. शशांक शर्मा, असिस्टेंट प्रोफेसर, रसायन विज्ञान विभाग, शारदा विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा, उ. प्र.




