• अनुवाद करें: |
विशेष

स्वास्थ्य, स्वच्छता और नागरिक अनुशासन सामूहिक कर्त्तव्य की भारतीय दृष्टि

  • Share:

  • facebook
  • twitter
  • whatsapp

स्वास्थ्य, स्वच्छता और नागरिक अनुशासन सामूहिक कर्त्तव्य की भारतीय दृष्टि 

स्वस्थ समाज की कल्पना केवल आर्थिक समृद्धि या तकनीकी प्रगति से पूरी नहीं होती, बल्कि उसका वास्तविक आधार स्वस्थ शरीर, स्वच्छ परिवेश और अनुशासित नागरिक जीवन में निहित होता है। भारतीय परंपरा में स्वास्थ्य को केवल रोगमुक्ति तक सीमित नहीं माना गया है, बल्कि उसे शारीरिक, मानसिक और नैतिक संतुलन के रूप में स्वीकार किया गया है। ”शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्“ का सूत्र हमें यह स्मरण कराता है कि धर्म, कर्त्तव्य और राष्ट्रसेवा सब कुछ स्वस्थ शरीर और स्वस्थ मन पर ही आधारित होता है। इसीलिए भारतीय सभ्यता में स्वास्थ्य, स्वच्छता और नागरिक अनुशासन को जीवन की नैतिक एवं आध्यात्मिक अनिवार्यताओं के रूप में स्वीकार किया गया है। हमारे प्राचीन ग्रंथ व्यक्ति के निजी आचरण से लेकर समाज और राज्य की व्यवस्था तक एक समग्र दृष्टि प्रदान करते हैं। आज के समय में, जब एक ओर स्वास्थ्य संकट, दूसरी ओर पर्यावरणीय असंतुलन और तीसरी ओर नागरिक अनुशासन की चुनौती हमारे सामने खड़ी है, तब यह दृष्टि और अधिक प्रासंगिक हो जाती है।

भारतीय दृष्टि में स्वास्थ्य का मूल आधार संतुलन है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण जीवनशैली के इसी संतुलन को योग और स्वास्थ्य का आधार बताते हैं। वे कहते हैं- ”युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु। युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा“ (अध्याय 6, श्लोक 17)। इसका आशय यह है कि जो व्यक्ति आहार, विहार, कर्म, निद्रा और जागरण सब में संतुलन रखता है, वही योगयुक्त होता है और वही दुःखों से मुक्त रहता है। यह श्लोक आधुनिक स्वास्थ्य विज्ञान में प्रचलित ”लाइफस्टाइल बैलेंस“ की संपूर्ण अवधारणा को अत्यंत सरल शब्दों में प्रस्तुत करता है। आज के समय में जब असंतुलित खानपान, अनियमित दिनचर्या और अत्यधिक तनाव से उत्पन्न रोग आम होते जा रहे हैं, तब गीता का यह संदेश एक व्यावहारिक मार्गदर्शन के रूप में सामने आता है।

गीता स्वास्थ्य और अनुशासन को आत्मानुशासन से जोड़ती है। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- ”उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।“(अध्याय 6, श्लोक 5)। अर्थात मनुष्य को स्वयं अपने प्रयास से ही अपना उत्थान करना चाहिए और स्वयं को पतन की ओर नहीं ले जाना चाहिए। यही आत्मानुशासन आगे चलकर नागरिक अनुशासन का रूप लेता है। आज यातायात नियमों का पालन करना, सार्वजनिक स्थानों पर स्वच्छता बनाए रखना और स्वास्थ्य संबंधी निर्देशों का अनुसरण करना ये सभी इसी आत्मानुशासन के आधुनिक और व्यवहारिक उदाहरण हैं।

रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास सामाजिक जीवन के केंद्र में ”परहित“ को स्थापित करते हैं। वे कहते हैं- ”परहित सरिस धरम नहि भाई।“ (उत्तरकाण्ड, दोहा 38)। इसका अर्थ है कि परोपकार से बढ़कर कोई धर्म नहीं है। स्वास्थ्य और स्वच्छता का पालन केवल आत्मरक्षा का विषय नहीं है, बल्कि यह समाज के हित में किया गया कार्य है। यदि कोई व्यक्ति सार्वजनिक स्थानों पर गंदगी नहीं फैलाता, स्वच्छता बनाए रखता है या बीमारी की स्थिति में सावधानी बरतता है, तो वह समाज के प्रति अपने धर्म का पालन करता है। हाल के समय में महामारी के दौरान मास्क पहनना, दूरी बनाए रखना और टीकाकरण कराना परहित की इसी भावना के समकालीन उदाहरण हैं।

रामचरितमानस में शरीर, मन, वाणी और कर्म चारों की शुद्धता पर विशेष बल दिया गया है। तुलसीदास कहते हैं- ”तनु मन बचन करम हितकारी।“ (बालकाण्ड)। यह पंक्ति स्पष्ट करती है कि स्वास्थ्य केवल शारीरिक नहीं होता, बल्कि मानसिक और नैतिक भी होता है। आज मानसिक स्वास्थ्य को लेकर बढ़ती जागरूकता इस शिक्षा की समकालीन पुष्टि करती है, क्योंकि यह स्वीकार किया जाने लगा है कि स्वस्थ मन के बिना स्वस्थ शरीर की कल्पना अधूरी है।

भारतीय परंपरा में स्वच्छता का संबंध केवल बाह्य सफाई से नहीं, बल्कि आंतरिक निर्मलता से भी है। तुलसीदास कहते हैं- ”निर्मल मन जन सो मोहि पावा।“ (उत्तरकाण्ड, दोहा 45)। अर्थात निर्मल मन वाला ही ईश्वर को प्राप्त करता है। यह निर्मलता हमें यह सिखाती है कि स्वच्छता केवल कर्मकाण्ड या औपचारिकता नहीं, बल्कि एक संस्कार है। आज स्वच्छ भारत जैसे अभियानों की मूल भावना भी यही है कि स्वच्छता को आदत और जीवनमूल्य बनाया जाए, न कि केवल सरकारी कार्यक्रम के रूप में देखा जाए।

वाल्मीकि रामायण में श्रीराम का जीवन नागरिक अनुशासन और मर्यादा का सर्वाेच्च आदर्श प्रस्तुत करता है। स्वयं श्रीराम को ”मर्यादा पुरुषोत्तम“ कहा गया है- ”रामो विग्रहवान् धर्मः।“ (अयोध्याकाण्ड, सर्ग 109)। इसका अर्थ है कि श्रीराम धर्म के साकार स्वरूप हैं। उनका जीवन यह शिक्षा देता है कि नियम, मर्यादा और अनुशासन का पालन कठिन परिस्थितियों में भी किया जाना चाहिए। वनवास जैसे कठिन काल में भी श्रीराम स्वच्छता, संयम और संतुलन का पालन करते हैं। यह आज के नागरिक जीवन के लिए भी एक प्रेरक आदर्श है कि परिस्थितियां चाहे जैसी हों, अनुशासन नहीं छोड़ा जाना चाहिए।

रामायण में रामराज्य का वर्णन एक ऐसे समाज के रूप में मिलता है जहां नागरिक स्वस्थ, सुखी और अनुशासित हैं- ”नाधिव्याधिजराग्लानि दुःखं नापि दारिर्द्यजम्।“ (उत्तरकाण्ड, सर्ग 128)। अर्थात रामराज्य में न रोग था, न मानसिक पीड़ा और न ही दरिद्रता। यह केवल काव्यात्मक कल्पना नहीं है, बल्कि यह संकेत करता है कि जब शासन, समाज और नागरिक अपने-अपने कर्त्तव्यों का ईमानदारी से पालन करते हैं, तो स्वास्थ्य और समृद्धि स्वाभाविक रूप से समाज में स्थापित हो जाती है।

श्रीमद्भगवद्गीता में समाज के प्रति उत्तरदायित्व को ”लोकसंग्रह“ कहा गया है-”लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्त्तुमर्हसि।“ (अध्याय 3, श्लोक 20)। अर्थात प्रत्येक कर्म समाज के हित को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। स्वास्थ्य, स्वच्छता और नागरिक अनुशासन तीनों ही लोकसंग्रह के अंग हैं। यदि कोई व्यक्ति केवल अपने लाभ के लिए प्रदूषण फैलाता है या नियमों का उल्लंघन करता है, तो वह लोकसंग्रह के सिद्धांत के विरुद्ध आचरण करता है।

समकालीन जीवन पर दृष्टि डालें तो शहरी क्षेत्रों में बढ़ता कचरा, प्रदूषण और यातायात अव्यवस्था नागरिक अनुशासन की कमी को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं। गीता का कर्मयोग और रामायण की मर्यादा दोनों मिलकर यह सिखाते हैं कि इन समस्याओं का स्थायी समाधान केवल बाहरी दंड या कानून से नहीं, बल्कि आंतरिक चेतना और संस्कार से संभव है।

आधुनिक समय में स्वास्थ्य को प्रायः व्यक्तिगत जीवनशैली तक सीमित कर दिया गया है- जैसे खानपान, व्यायाम, नींद और योग। निस्संदेह ये सभी आवश्यक हैं, परंतु स्वास्थ्य की वास्तविक परिभाषा तब पूर्ण होती है जब व्यक्ति अपने स्वास्थ्य के साथ-साथ समाज के स्वास्थ्य के प्रति भी संवेदनशील होता है। संक्रामक रोगों और महामारी के अनुभव ने यह स्पष्ट कर दिया है कि एक व्यक्ति की असावधानी पूरे समुदाय को प्रभावित कर सकती है। इसलिए स्वास्थ्य केवल ”मेरा शरीर“ नहीं, बल्कि ”हमारा समाज“ है।

भारतीय दृष्टि में स्वास्थ्य सेवा केवल सरकारी दायित्व नहीं है, बल्कि समाज की सामूहिक सहभागिता से जुड़ा विषय है। परिवार, मोहल्ला, विद्यालय और स्वयंसेवी संगठन सभी की भूमिका इसमें महत्वपूर्ण है। जब समाज स्वास्थ्य को सामूहिक दायित्व के रूप में स्वीकार करता है, तभी ”स्वस्थ भारत“ का स्वप्न साकार हो सकता है।

स्वच्छता भी इसी सामूहिक चेतना से जुड़ी हुई है। स्वच्छता का अर्थ केवल सड़क, नाली या घर की सफाई नहीं, बल्कि वह एक ऐसा संस्कार है जो व्यक्ति के आचरण, सोच और सार्वजनिक व्यवहार में झलकता है। आज गंदगी का मूल कारण संसाधनों की कमी से अधिक नागरिक चेतना की कमी है। सार्वजनिक स्थानों पर कचरा फैलाना, जल स्रोतों को प्रदूषित करना और सार्वजनिक सुविधाओं का दुरुपयोग ये सभी अनुशासनहीनता के उदाहरण हैं।

स्वच्छता अभियान तभी सफल हो सकते हैं जब प्रत्येक नागरिक यह समझे कि सार्वजनिक स्थान किसी ‘दूसरे’ का नहीं, बल्कि ‘हम सबका’ है। घर की सफाई के साथ-साथ सड़क, पार्क, कार्यालय और विद्यालय की स्वच्छता भी हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। स्वच्छ वातावरण रोगों की रोकथाम का सबसे सशक्त माध्यम है, इसलिए स्वच्छता को श्रम या औपचारिकता नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का आधार मानना होगा।

नागरिक अनुशासन किसी भी राष्ट्र की आत्मा होता है। अनुशासन का अर्थ दमन या भय नहीं, बल्कि स्वेच्छा से नियमों का पालन करना है। यातायात नियमों का पालन, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा, कतार में खड़ा होना और समय का सम्मान ये सभी छोटे-छोटे आचरण मिलकर राष्ट्र के चरित्र का निर्माण करते हैं। वास्तविक अनुशासन संस्कार से आता है, और वही स्वास्थ्य तथा स्वच्छता को स्थायी बनाता है।

भारतीय संस्कृति ‘मैं’ से ‘हम’ की यात्रा की संस्कृति है। जब व्यक्ति अपने आचरण को समाज के व्यापक हित से जोड़ता है, तभी स्वास्थ्य, स्वच्छता और अनुशासन प्रभावी बनते हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम इन मूल्यों को केवल नीतियों या अभियानों तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें अपने दैनिक जीवन का संस्कार बनाएं। स्वस्थ जीवनशैली और सार्वजनिक स्वच्छता को सामूहिक नागरिक कर्त्तव्य के रूप में अपनाकर ही हम एक सशक्त, समरस और आत्मनिर्भर भारत की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। यही भाव ‘व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण’ की भारतीय सोच को साकार करता है और यही स्वास्थ्य, स्वच्छता तथा नागरिक अनुशासन का वास्तविक उद्देश्य है।

निष्कर्ष: भारतीय परंपरा ने सदा यह स्वीकार किया है कि स्वस्थ शरीर और संतुलित मन के बिना न तो व्यक्ति अपने कर्त्तव्यों का निर्वहन कर सकता है और न ही समाज सुदृढ़ बन सकता है। गीता का संतुलन, रामचरितमानस का परहित भाव और रामायण की मर्यादा तीनों मिलकर यह सिखाते हैं कि व्यक्तिगत आचरण ही सामूहिक जीवन की दिशा तय करता है।

आधुनिक समय की चुनौतियां महामारी, पर्यावरण प्रदूषण, मानसिक तनाव और नागरिक अनुशासन की कमी यह संकेत देती हैं कि केवल कानून, योजनाएं या तकनीक पर्याप्त नहीं हैं। स्थायी समाधान तभी संभव है जब स्वास्थ्य, स्वच्छता और अनुशासन को बाहरी दायित्व नहीं, बल्कि आंतरिक संस्कार के रूप में स्वीकार किया जाए। जब नागरिक अपने स्वास्थ्य को समाज से, स्वच्छता को राष्ट्र से और अनुशासन को नैतिक कर्त्तव्य से जोड़कर देखता है, तब परिवर्तन स्वाभाविक हो जाता है।

अतः आवश्यकता इस बात की है कि हम भारतीय ग्रंथों में निहित इन मूल्यों को केवल पाठ या उपदेश के रूप में न रखें, बल्कि उन्हें अपने दैनिक जीवन में उतारें। स्वस्थ जीवनशैली अपनाना, सार्वजनिक स्वच्छता बनाए रखना और नागरिक अनुशासन का पालन करना ये तीनों मिलकर ”व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण“ की भारतीय अवधारणा को साकार करते हैं। यही सामूहिक कर्त्तव्य-बोध एक सशक्त, समरस और आत्मनिर्भर भारत की आधारशिला है, और यही इस विषय का वास्तविक निष्कर्ष है।

लेखक आईआईएमटी कॉलेज, ऑफ मैनेजमेंट, ग्रेटर नोएडा में सहायक प्राध्यापक है।