सहारनपुर, उत्तर प्रदेश
जहां एक ओर वैश्विक परिस्थितियों के
चलते गैस संकट की खबरें लोगों को चिंतित कर रही हैं, वहीं देश के
गांवों से आत्मनिर्भरता की प्रेरणादायक कहानियां सामने आ रही हैं। सीमित संसाधनों
में भी कैसे बड़ा समाधान निकाला जा सकता है, इसका बेहतरीन उदाहरण उत्तर प्रदेश के
सहारनपुर का एक किसान परिवार प्रस्तुत कर रहा है, जिसने गोबर गैस
के माध्यम से केवल अपनी रसोई को स्वावलंबी बनाया है, बल्कि पर्यावरण
संरक्षण और लागत बचत का भी मॉडल खड़ा किया है।
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच जहां
कई जगहों पर LPG गैस की किल्लत और एजेंसियों पर लंबी कतारें देखने को मिल
रही हैं, वहीं सहारनपुर के गांव भलस्वा में रहने वाले किसान रकम सिंह
सैनी का परिवार इन हालातों से पूरी तरह बेफिक्र नजर आता है।
जिला मुख्यालय से करीब 12 किलोमीटर दूर
स्थित इस गांव में रकम सिंह सैनी ने करीब 9 साल पहले मनरेगा योजना के तहत अपने घर
पर बायोगैस प्लांट लगवाया था। आज यही प्लांट उनके पूरे परिवार की रसोई का आधार बन
चुका है।
इस प्लांट में गाय के गोबर और पानी का
मिश्रण डालकर गैस तैयार की जाती है, जिससे रोजाना 6 से 8 घंटे तक चूल्हा
जलता है। इससे 8 से 10 लोगों का खाना आसानी से बन जाता है। रकम सिंह बताते हैं कि
रोज लगभग 12 से 15 किलो गोबर से तीनों समय का भोजन तैयार हो जाता है।
इस बायोगैस प्लांट की विशेषता यह है कि गैस बनने के बाद जो अवशेष
बचता है, वह जैविक खाद के रूप में खेतों में उपयोग किया जाता है।
इससे खेती की लागत घटती है और रासायनिक खाद पर निर्भरता कम होती है।
रकम सिंह के अनुसार, यह प्लांट लगभग बिना खर्च के चलता है और साल में केवल एक
बार इसकी सफाई करनी पड़ती है। इससे उनके घरेलू खर्च में कमी आई है और खेती भी अधिक
लाभकारी बन गई है।
परिवार की गृहिणी गीता सैनी बताती हैं कि पहले लकड़ी और भूसे से खाना बनाने में धुआं और परेशानी होती थी, लेकिन अब गोबर गैस से साफ-सुथरी रसोई में तेज आंच पर जल्दी खाना बन जाता है। LPG सिलेंडर अब उनके घर में 4 से 5 महीने तक चलता है और साल में केवल 2 से 3 सिलेंडर ही लगते हैं।
गीता सैनी इस गैस को प्यार से “जय ऊर्जा गैस” कहती हैं। उनका मानना है कि यह गैस LPG की तरह ही प्रभावी है और इससे बना खाना भी सुरक्षित और बेहतर होता है। रकम सिंह सैनी का कहना है कि आज जब दुनिया ऊर्जा संकट से जूझ रही है, ऐसे में गांवों के संसाधनों का सही उपयोग ही सबसे बड़ा समाधान है। उन्होंने किसानों से अपील की है कि वे बायोगैस प्लांट अपनाकर आत्मनिर्भर बनें और पर्यावरण संरक्षण में योगदान दें। उनका विश्वास है कि अगर हर गांव इस दिशा में पहल करे, तो देश ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ सकता है।



