• अनुवाद करें: |
मुख्य समाचार

संघ केवल एक संगठन नहीं, बल्कि एक अनुभूति का विषय है – सुनील आंबेकर जी

  • Share:

  • facebook
  • twitter
  • whatsapp

रांची

भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIM) परिसर में प्रमुख जन गोष्ठी का आयोजन किया गया। इसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर जी मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे। कार्यक्रम में समाज के विभिन्न क्षेत्रों – शिक्षा, प्रशासन, चिकित्सा, मीडिया एवं सामाजिक जीवन – से जुड़े प्रबुद्धजन सम्मिलित हुए।

गोष्ठी का प्रारंभ दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ, जिसके पश्चात अतिथियों का स्वागत एवं परिचय कराया गया। प्रांत संपर्क प्रमुख ने कहा कि संघ शताब्दी वर्ष के अवसर पर समाज के विभिन्न वर्गों के बीच सार्थक संवाद स्थापित करना समय की आवश्यकता है, ताकि राष्ट्र निर्माण में सभी की सक्रिय सहभागिता सुनिश्चित हो सके।

सुनील आंबेकर जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्षों की यात्रा, उसकी कार्यपद्धति, विचारधारा एवं समाज में उसकी भूमिका पर प्रकाश डाला। 1925 में विजयादशमी के पावन अवसर पर एक छोटे से प्रयास के रूप में प्रारंभ हुआ संघ आज एक विशाल सामाजिक-सांस्कृतिक शक्ति के रूप में विकसित हो चुका है।

उन्होंने कहा कि संघ के 100 वर्ष पूर्ण होने के साथ ही पूरे देश में उसके कार्य और विचार को लेकर व्यापक चर्चा हो रही है। पहले जहाँ संघ के बारे में जानकारी सीमित दायरे में ही रहती थी, वहीं आज समाज का सामान्य नागरिक भी संघ के सकारात्मक पक्ष को जानने और समझने के लिए उत्सुक है। उन्होंने कहा कि संघ केवल एक संगठन नहीं है, बल्कि यह एक अनुभूति का विषय है। उन्होंने वर्तमान सरसंघचालक के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि संघ को शब्दों में पूर्ण रूप से व्यक्त करना कठिन है, इसे अनुभव के माध्यम से ही समझा जा सकता है। संघ संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी के जीवन और उनके राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत व्यक्तित्व का विस्तृत वर्णन किया। बाल्यकाल से ही उनके मन में देशभक्ति की भावना प्रबल थी। उन्होंने अंग्रेजों के शासनकाल में भारतीय समाज और संस्कृति पर पड़े प्रभाव को निकट से देखा और अनुभव किया, जिससे उनके मन में राष्ट्र के पुनर्निर्माण का संकल्प जागृत हुआ।

हेडगेवार जी ने अपने जीवन के अनुभवों से यह निष्कर्ष निकाला कि भारत की पराधीनता का मुख्य कारण समाज की असंगठित स्थिति थी। जाति, पंथ, भाषा और क्षेत्र के आधार पर विभाजित समाज को संगठित किए बिना राष्ट्र की स्वतंत्रता और उन्नति संभव नहीं है। इसी विचार के आधार पर उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की, जिसका मूल उद्देश्य समाज को संगठित करना और राष्ट्र को सशक्त बनाना है।

संघ ने व्यक्ति निर्माण को केंद्र में रखा है। शाखा के माध्यम से अनुशासन, संस्कार, समर्पण और राष्ट्रभक्ति की भावना विकसित की जाती है। आज देशभर में हजारों शाखाएँ संचालित हो रही हैं, जो समाज में सकारात्मक परिवर्तन का माध्यम बन रही हैं। संघ ने हमेशा सामान्य व्यक्तियों की शक्ति पर विश्वास किया है। समाज परिवर्तन के लिए किसी विशेष वर्ग या व्यक्तियों पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि प्रत्येक नागरिक की सहभागिता आवश्यक है।

उन्होंने “पंच परिवर्तन” के संकल्प का विस्तार से उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि शताब्दी वर्ष के अवसर पर समाज के समक्ष पाँच महत्वपूर्ण विषयों को रखा है – कुटुंब प्रबोधन, सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण, स्व का बोध, नागरिक कर्तव्य बोध।

कुटुंब प्रबोधन के अंतर्गत परिवार को संस्कारों का केंद्र बनाने पर बल दिया गया है, जहाँ बच्चों में नैतिक मूल्यों और सामाजिक जिम्मेदारियों का विकास हो। सामाजिक समरसता के माध्यम से जाति और भेदभाव से ऊपर उठकर एकता और बंधुत्व की भावना को सुदृढ़ करने का आह्वान किया गया है।

वर्तमान समय में जीवनशैली को प्रकृति के अनुकूल बनाना अत्यंत आवश्यक है। जल, वन, भूमि और ऊर्जा के संतुलित उपयोग से ही सतत विकास संभव है। ‘स्व’ के बोध पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि अपनी भाषा, संस्कृति, परंपरा और जीवन मूल्यों के प्रति गर्व की भावना विकसित करना आवश्यक है। साथ ही नागरिक कर्तव्य बोध के अंतर्गत प्रत्येक व्यक्ति को अपने दायित्वों के प्रति सजग रहकर समाज और राष्ट्र के हित में कार्य करने का संकल्प लेना चाहिए।

उन्होंने कहा कि संघ केवल तात्कालिक मुद्दों पर कार्य करने वाला संगठन नहीं है, बल्कि यह दीर्घकालिक दृष्टि से राष्ट्र निर्माण में लगा हुआ है। संघ का कार्य शताब्दियों की योजना के साथ चलता है और इसका उद्देश्य एक सशक्त, संगठित और आत्मनिर्भर समाज का निर्माण करना है। प्रश्नोत्तर सत्र में उपस्थित जनों ने विभिन्न विषयों पर प्रश्न और सुझाव रखे। सुनील आंबेकर जी ने सभी प्रश्नों का उत्तर देकर जिज्ञासा समाधान किया।