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आजादी का अमृत महोत्सव

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं युवाशक्ति

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·         अपनी युवा उर्जा का सही दिशा में अभिप्रेरण एवं उन्मुखीकरण कर भारत को विश्व गुरु बनाने में उपयोग करें।

·         भारत केवल भूगोल का टुकड़ा नहीं है, स्वभाव का नाम है और यह भाव सदैव जीवित रहेगा।

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार भारत, चीन से कुल जनसंख्या की तुलना में भले ही पीछे हो किन्तु, अब यह दुनिया में सबसे अधिक ‘युवा आवादी’ (10-24 वर्ष आयु) वाला देश है एवं जनांकिकी लाभांश के दौर से गुजर रहा है। किसी भी राष्ट्र के जीवन काल में यह दौर एक ही बार आता है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष के अनुसार 2050 के बाद भारत भी चीन, आसियान, यूरोपीय देशांे की तरह ‘एजिंग पापुलेशन’ के दौर में प्रवेश करने लगेगा। समाजशास्त्री ऐसा मानते हैं कि किसी भी राष्ट्र के लिए युवा न केवल नये विचार, ऊर्जा, शक्ति तथा साहस से ओत प्रोत होते हैं बल्कि, यदि इन्हें सही दिशा दिया जाय तो वे समाज व राष्ट्र में बहुत कम समय में अद्भुत परिवर्तन ला सकते हैं।

1925 में संघ की स्थापना के समय, पाश्चात्य शिक्षा एवं संस्कृति से अभिभूत होकर दुनिया द्वितीय औद्योगिकी क्रांति के दौर में प्रवेश कर रही थी। इस दौर में तार्किकता एवं वैज्ञानिकता के नाम पर, दुनियाभर की प्राचीनतम संस्कृतियों विशेषतौर पर भारतीय वैज्ञानिक जीवन पद्धति एवं जीवन मूल्यों को अवैज्ञानिक एवं पुरातनपंथी साबित करने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा था ताकि, पाश्चात्य संस्कृति एवं जीवन मूल्यों को वैज्ञानिक एवं आधुनिक साबित किया जा सके। इसके लिए ईसाई मिसनरियों, विदेशी विश्वविद्यालयों में पढ़े-लिखे एवं पाश्चात्य रंग में रंगे भारतीय युवाओं को देश में हीरो के रूप में ‘प्रोजेक्ट’ किया जा रहा था। यूरोपियों का विश्वास था कि अन्य देशो की तरह यदि भारतीय युवाओं को भी अपने गौरवशाली इतिहास, अपनी उत्कृष्ट संस्कृति एवं जीवन मूल्यों से दूर कर दिया जाय तो भविष्य में प्रतिरोध की संभावनायें समाप्त हो जायेगी एवं वे अनंतकाल तक देश में शोषण एवं शासन का क्रम जारी रख सकेंगे। यही कारण था कि 20वीं सदी के प्रारम्भ में ‘भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों से अभिप्रेरित’ देश भर में उठे राष्ट्रवादी आन्दोलन को उग्रवादी आन्दोलन साबित किया जाने लगा।

परमपूज्य डॉ हेडगवार जी अंग्रेजों की इस कुत्सित सोच को भापकर, युवाओं में अपने प्राचीन सांस्कृतिक गौरव को निरंतर स्मरण कराने, ‘स्वामी विवेकानंद’ को अपना आदर्श मानते हुए शाखा के माध्यम से इनको स्वस्थ, शक्तिशाली, एवं राष्ट्रीयता से ओतप्रोत नागरिक बनाने हेतु राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना की। अत्यल्प समय में ही इन्हीं संघ की शाखाओं से जहाँ एक ओर अनेकों युवा अपना जीवन, सुख, वैभव एवं सर्वस्व का परित्याग कर हिन्दू समाज में समरसता के माध्यम से एकीकरण एवं राष्ट्र के परम वैभव तक ले जाने के संकल्प के साथ ‘प्रचारक’ बने वहीं, अनेकों स्वयंसेवक सीधे स्वतन्त्रता संग्राम के नायक के रूप में उभरे। इसके अलावा स्वयंसेवक विभिन्न प्रकल्पों के माध्यम से समाज एवं राष्ट्र निर्माण के लिए कार्यकर रहे हैं। वास्तव में, जो क्रम 1925 से प्रारम्भ हुआ वह आज भी न केवल सतत रूप से जारी है बल्कि, उत्तरोतर प्रगति पर है। संघ प्रारम्भ से ही 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को विचारधारा से जुड़ने और उनमें देश प्रेम, राष्ट्रवाद की भावना भरने एवं उच्च सांस्कृतिक मूल्यों को संरक्षित करने के लिए “बालभारती” और “बाल गोकुल” कार्यक्रम चला रहा है जबकि विश्वविद्यालय और अन्य उच्च शिक्षा संस्थानों के युवाओं को संघ के प्रति आकर्षित करने के लिए कई संस्थान अन्य कार्यक्रम चला रहे हैं जिनमें अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् एव विवेकानंद केंद्र की भूमिका काफी महत्वपूर्ण है।

संघ विचारों को छात्रों में अनुप्राणित करने के उद्देश्य से अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी ) की स्थापना 9 जुलाई, 1949 को संघ कार्यकर्ता बलराज मधोक जी की अगुआई में की गयी। ज्ञान, शील और एकता के नारों को लेकर आगे बढ़ती विद्यार्थी परिषद न केवल भारत का बल्कि आज विश्व का सबसे बड़ा छात्र-संगठन है। विद्यार्थी परिषद् का मानना है कि, छात्रशक्ति ही राष्ट्रशक्ति होती है। स्थापना काल से ही इस संगठन ने छात्र हित और राष्ट्र हित से जुड़े प्रश्नों को प्रमुखता से उठाया है और देशव्यापी आंदोलनों का नेतृत्व किया है। इस संगठन नें भारत के व्यापक हित से सम्बद्ध समस्याओं की ओर बार-बार ध्यान दिलाया है। बांग्लादेशी अवैध घुसपैठ और कश्मीर से धारा 370 को हटाने के लिए विद्यार्थी परिषद् समय-समय पर आन्दोलन चलाता रहा है। बांग्लादेश को तीन बीघा भूमि देने के विरुद्ध परिषद् ने ऐतिहासिक सत्याग्रह किया था। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् शिक्षा के व्यवसायीकरण के खिलाफ बार-बार आवाज उठाती रही है। इसके अतिरिक्त अलगाववाद, अल्पसंख्यक तुष्टीकरण, आतंकवाद और भ्रष्टाचार जैसी राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के खिलाफ हम लगातार संघर्षरत रहे हैं। बिहार में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के नाम सबसे ज्यादा रक्तदान करने का रिकॉर्ड है। इसके अलावा वैसे निर्धन मेधावी छात्र, जो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिये निजी कोचिंग संस्थानों में नहीं जा सकते, उनके लिये स्वामी विवेकानंद निःशुल्क शिक्षा शिविर का आयोजन किया जाता है। भारत के अतिरिक्त अन्य देशों में काम हेतु हिन्दू स्वयंसेवक संघ नाम से संगठन काम कर रहे हैं जिसमें अनेकों युवा जुड़े हैं।

संघ द्वारा सन् 1963-64 का वर्ष सम्पूर्ण देश में स्वामी विवेकानन्द की जन्म शताब्दी के रूप में मनाया गया। इस अवसर पर गठित ‘विवेकानन्द शिला स्मारक समिति’ ने कन्याकुमारी स्थित उस ऐतिहासिक शिला पर, जहां स्वामी विवेकानन्द को तीन दिन तक ध्यान करने के बाद ‘मानव सेवा ही माधव सेवा’ के महान सत्य का साक्षात्कार हुआ था पर भव्य शिला स्मारक के निर्माण की योजना बनाई। स्मारक की स्थापना के बाद सेवा के संदेश को व्यावहारिक रूप देने के उद्देश्य से, रा.स्व.संघ के सरकार्यवाह रहे श्री एकनाथ रानाडे जी द्वारा ‘विवेकानन्द केन्द्र’ की स्थापना 1972 में की गयी। यह केंद्र आधुनिक परिप्रेक्ष्य में स्वामी जी के विचारों एवं उद्देश्यों को मूर्त्रूप देने के कार्य में संलग्न है।

सूचना एवं संचार क्रांति जिसे तृतीय औद्योगिक क्रांति कहा जाता है के दौर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पारंपरिक रूप से लोगों को खुद से जोड़ने के साथ-साथ अब आधुनिक दौर की जरुरतांे के अनुसार हाईटेक हो रहा है। वेबसाइट के माध्यम से अपनी पहुंच को व्यापक करने के अलावा आईटी पेशेवरों तथा शहरों में रहने वाले युवाओं को स्वयं से जोड़ रहा है। राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के सह सर कार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले जी ने 2016 में अपने भाषण में कहा कि, “वर्तमान माहौल के मद्देनजर अब संघ ‘गुणवत्ता सुधार’ की दिशा में काम कर रहा है। इसी कड़ी में संघ कई बदलाव कर रहा है ताकि युवा पीढ़ी अपनी आधुनिक जिंदगी के सपने के बीच देश के प्रति अपने कर्तव्य को न भूलंे और संघ के जरिए देश की परंपराओं से जुडे़ रहंे”। उन्होंने आगे बताया कि संघ की वेबसाइट पर ‘ज्वाइन आरएसएस’ नाम से एक कालम बनाया है जहां संघ से जुड़ने के इच्छुक लोग जाकर अपना नाम, पता, फोन नंबर और ईमेल दर्ज करा रहे हैं। फिर संघ का स्थानीय कार्यालय इन लोगों के बारे में देश भर में फैले स्वयं सेवकों को बताता है जो उनसे सीधे संपर्क करते हैं।

संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख श्रीमान मनमोहन वैद्य जी के अनुसार समाज में संघ का कार्य बढ़ा है। संघ कार्य के विस्तार में युवाओं की बड़ी भूमिका है। जॉइन आरएसएस के माध्यम से बड़ी संख्या में टेक्नोसेवी युवा संघ से जुड़ रहे हैं। जॉइन आरएसएस के माध्यम से जुड़ने वाले युवाओं की संख्या में 2015 की तुलना में 2016 में 48 प्रतिशत और 2017 में 52 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। यह सभी आंकड़े जनवरी से जून तक के हैं, जिनमें 20 से 35 आयु वर्ग के युवकों की संख्या अधिक है। 

कानपुर में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रांत प्रचारक वर्ग की वार्षिक बैठक (2016) में माननीय दत्तात्रेय होसबोले जी ने कहा कि संघ अब आईटी पेशेवरों को भी अपने से जोड़ रहा है क्योंकि, आईटी पेशेवर ही देश को एक विकसित राष्ट्र बनाएंगे इसलिए इन्हें देशभक्ति, सामाजिक समरसता और राष्ट्रवाद की भावना से उन्हें प्रेरित करना बहुत जरूरी है। आईटी पेशेवरों वाले शहरों के लिये साप्ताहिक कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। बड़े शहरों में फ्लैटों में रहने वाले लोगों के लिए भी संघ के लोग उनकी कालोनी के कम्युनिटी हाल में जाकर साप्ताहिक कार्यक्रम कर रहे हैं जिनमें उन्हें राष्ट्रवाद और सामाजिक समरसता के बारे में बताया जा रहा है। मार्च 2019 तक संघ द्वारा, देश भर में 37011 स्थानों पर 59266 शाखाएं चलाई जा रही थी। इसके अलावा 17229 साप्ताहिक मिलन और 8382 मासिक मिलन कार्यक्रम भी चलाए जा रहे थे। इसके अलावा संघ नें ग्राम विकास, कुटुम्ब प्रबोधन, पर्यावरण के प्रति जागरूकता और सामाजिक समरसता जैसी गतिविधियों से युवाओं को निरंतर जोड़ रहा है ताकि, भविष्य के भारत को निकट से जानकर उसके अनुसार अपनी सकारात्मक भूमिका सुनिश्चित कर सके। संघ के युवा कार्यकर्ताओं के प्रयासों से आज लगभग 450 गांवों में उल्लेखनीय बदलाव आया है।

भविष्य में युवाओं की भूमिका को रेखांकित करते हुए, मध्यप्रदेश में युवा सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए माननीय सरसंघचालक डा मोहन भागवत जी ने अपने उदबोधन में कहा कि, भारत केवल भूगोल का टुकड़ा नहीं है, स्वभाव का नाम है और यह भाव सदैव जीवित रहेगा।’’ उन्होंने आगे युवाओं का आह्वाहन करते हुए कहा कि ‘‘यदि आप राष्ट्र का उत्थान चाहते हैं तो आपको इसके लिए प्रयास भी करने होंगे। आज हर व्यक्ति सामने आकर नेता बनने का प्रयास करता है, यह ठीक नहीं है। कुछ लोग कभी सामने नहीं आते लेकिन वह नींव के पत्थर का काम करते हुए देश के हित में अपना जीवन लगा देते हैं। उनका नाम भी कोई नहीं जानता लेकिन उनके प्रयासों के कारण देश का नाम और ख्याति लगातार बढ़ रही है। आज हमें उन लोगों की पद्धति का अनुसरण करने का प्रयास करना चाहिए। हमारा व्यक्तित्व भी उन्हीं की तरह होना चाहिए। आज देश को नेता की नहीं नायक की आवश्यकता है।’’

निःसंदेह, भारत जनांकिकी लाभांश के दौर से गुजर रहा है तथा किसी भी राष्ट्र के जीवन काल में यह दौर एक ही बार आता है। भारत के नौजवान देश में ही नही पूरे विश्व में भारतीय ज्ञान, संस्कार एवं मूल्यों का डंका बजा रहे हैं। यह हमारे लिए एक महत्वपूर्ण अवसर है कि हम अपनी युवा उर्जा का सही दिशा में अभिप्रेरण एवं उन्मुखीकरण कर भारत को विश्व गुरु बनाने में उपयोग करें। इसके लिए निरंतर प्रयास कर अधिक से अधिक नवयुवकांे को अभिप्रेरणा एवं तपस्या स्थल ‘संघ की शाखाओं’ से जोड़ना होगा।  


(नोट : ये लेखक के निजी विचार है)