उत्तराखण्ड में मुस्लिम महिलाओं की ढाल और आवाज बन चुका है UCC- अतिया साबरी
कल्पना कीजिए उस महिला की, जिसे एक दिन अचानक यह कहकर रिश्ते से बाहर कर दिया जाए कि अब वह बीवी नहीं रही। और साथ फिर भी रहना है तो हलाला करना होगा। हलाला मतलब गैर मर्द के साथ रात गुजारना । न कोई सुनवाई, न कोई सुरक्षा और न ही भविष्य की कोई गारंटी। वर्षों तक कई मुस्लिम महिलाएं तीन तलाक, तलाक-ए-बिद्दत और हलाला जैसी कुप्रथाओं के बीच इसी डर और असुरक्षा के साथ जीती रहीं।
लेकिन अब तस्वीर बदलती दिखाई दे रही है। नई पीढ़ी सवाल पूछ रही है, महिलाएं खुलकर बोल रही हैं और कानून भी उनके साथ खड़ा नजर आ रहा है। यही वजह है कि समान नागरिक संहिता यानी UCC आज मुस्लिम महिलाओं के लिए केवल कानूनी शब्द नहीं, बल्कि सुरक्षा कवच और बराबरी की आवाज बनती जा रही है।
एक महिला जिसने सिस्टम को चुनौती दी
अतिया साबरी इस परिवर्तन की सबसे मजबूत आवाजों में एक नाम है। सुल्तानपुर की रहने वाली अतिया साबरी वही महिला हैं, जिन्होंने तीन तलाक के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट तक निर्णायक लड़ाई लड़ी। यह केवल व्यक्तिगत संघर्ष नहीं था, बल्कि उन लाखों महिलाओं की लड़ाई थी, जो वर्षों से चुप रहकर अन्याय सहती रही थीं।
अतिया साबरी का कहना है कि जब 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक और तलाक-ए-बिद्दत को असंवैधानिक घोषित कर दिया और 2019 में केंद्र सरकार ने इसे दंडनीय अपराध बना दिया, तो फिर हलाला जैसी प्रथा का कोई औचित्य नहीं बचता।
उनका आरोप है कि कुछ असामाजिक तत्व आज भी कानून और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को दरकिनार कर हलाला के नाम पर महिलाओं का शोषण कर रहे हैं।
यूथ क्यों जुड़ रहा है इस मुद्दे से?
आज की Gen-Z और युवा पीढ़ी समानता, स्वतन्त्रता और सम्मान की भाषा समझती है।
वे धर्म से पहले इंसानियत और अधिकारों की बात करना चाहते हैं।
यही कारण है कि मुस्लिम युवा पूछ रहे हैं कि अगर संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है, तो उनके समुदाय में महिलाओं के अधिकार अलग क्यों हों?
अगर बेटियां पढ़ सकती हैं, नौकरी कर सकती हैं और देश चला सकती हैं, तो उन्हें अपने वैवाहिक जीवन में समान सुरक्षा क्यों न मिले?
यही कारण है कि UCC की बहस अब केवल राजनीति तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह मुस्लिम महिलाओं के सम्मान और समानता का मुद्दा बन चुकी है।
उत्तराखण्ड बना परिवर्तन की शुरुआत!
सीएम पुष्कर सिंह धामी द्वारा उत्तराखंड में UCC लागू किए जाने के बाद हलाला से जुड़ा पहला मामला हरिद्वार में दर्ज हुआ।
हरिद्वार जिले के बुग्गावाला थाने में एक महिला की शिकायत पर उसके पति और ससुराल वालों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया। यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि पहले कई महिलाएं डर, सामाजिक दबाव और बदनामी के कारण शिकायत तक दर्ज नहीं करा पाती थीं।
अब कानून के कारण महिलाओं में यह भरोसा पैदा हो रहा है कि उनकी आवाज सुनी जाएगी।
महिला सशक्तिकरण केवल भाषण नहीं, सुरक्षा भी है
हम अक्सर महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं। कॉलेजों में सेमिनार होते हैं, सोशल मीडिया पर पोस्ट लिखे जाते हैं, लेकिन असली सशक्तिकरण तब होता है जब -
• महिला बिना डर के अपनी बात कह सके
• कानून उसके साथ खड़ा हो
• उसे समान अधिकार मिले
• उसके आत्मसम्मान की रक्षा हो
UCC को समर्थन देने वाले लोग मानते हैं कि यह कानून मुस्लिम महिलाओं को वही सुरक्षा और समानता देने की दिशा में एक कदम है।
'पूरे देश में लागू हो UCC'
अतिया साबरी का कहना है कि तीन तलाक, तलाक-ए-बिद्दत और हलाला का उल्लेख पूरी कुरान में कहीं नहीं मिलता। इसके बावजूद सदियों से इन प्रथाओं के नाम पर महिलाओं पर अत्याचार होते रहे हैं।
यही वजह है कि अतिया साबरी पूरे देश में UCC लागू करने की मांग कर रही हैं। अतिया हलाला के खिलाफ पहला मुकदमा दर्ज होने पर कहती हैं- ‘मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री का आभार व्यक्त करती हूँ। साथ ही अपील करती हूँ कि यूसीसी जल्द पूरे भारत में लागू कर हलाला जैसी कुप्रथा को खत्म किया जाए, जिससे महिलाओं को जागरूक कर इस कुप्रथा और अत्याचार से बचाया जा सके।‘
UCC पर बहस जारी रह सकती है, अलग-अलग विचार हो सकते हैं, लेकिन एक बात तो स्पष्ट है कि अब महिलाएं चुप नहीं रहना चाहतीं। वे बराबरी चाहती हैं। सम्मान चाहती हैं। सुरक्षा और न्याय चाहती हैं।



