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देश में दलहन और तिलहन में आत्मनिर्भरता से ही संभव होगी किसान की आत्मनिर्भरता - भारतीय किसान संघ

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देश में दलहन और तिलहन में आत्मनिर्भरता से ही संभव होगी किसान की आत्मनिर्भरता - भारतीय किसान संघ

एकल फसल पद्धति से पर्यावरण और आर्थिक नुकसान; फसल विविधीकरण और गौ कृषि वाणिज्यमको बढ़ावा देने की मांग संसदीय स्थायी समिति द्वारा अनुशंसितजीन एडिटिंग’ (CRISPR) तकनीक पर पूर्ण रोक लगाने का आग्रह

माउंट आबू/ राजस्थान, 17 मई 2026

भारतीय किसान संघ ने माउंट आबू में दो दिवसीय अखिल भारतीय कार्यकारिणी बैठक में चर्चा व चिंतन के बाद केंद्र सरकार से देश में दलहन, तिलहन और खाद्य तेलों के उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए एक समग्र और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाने की मांग की है। वर्तमान में देश की आजादी के 78 वर्षों के बाद भी दलहन और खाद्य तेलों के लिए विदेशों पर निर्भरता एक गंभीर चिंता का विषय है, जो सीधे देश की खाद्य सुरक्षा और राष्ट्रीय संप्रभुता से जुड़ा हुआ है।

महामंत्री मोहिनी मोहन मिश्र ने कहा कि वर्तमान में प्रचलित एकल फसल पद्धतिजैव-विविधता, भोजन की विविधता और जलवायु के लिए पूरी तरह अनुपयुक्त और शोषणकारी साबित हो रही है। इसके विकल्प के रूप में मजबूत फसल विविधीकरण (अंतर्वर्ती खेती, मिश्रित खेती, फसल चक्र) और गौ कृषि वाणिज्यम’ (गाय आधारित कृषि) को अपनाना अनिवार्य है, जिससे भूमि की उर्वरता बनी रहे और किसानों की लागत कम हो सके। दो दिवसीय कार्यकारिणी बैठक में अंतरराष्ट्रीय महिला किसान वर्ष, संगठन विस्तार, आगामी सदस्यता अभियान, वैश्विक कृषि व्यापार, किसान व कृषि क्षेत्र की समस्याएं, स्वर्ण जयंती वर्ष आयोजन की तैयारी आदि विषयों पर भी चर्चा की गई।

किसान संघ ने रखी प्रमुख मांगें और सुझाव

100% खरीद की सुनिश्चितता: सरकार दलहन और तिलहन खाद्य तेल से संबंधित फसलों की 100% प्रतिशत खरीद की गारंटी दे। वर्ष 2016 में केवल दलहन की सीमित खरीद के कारण उत्पादन में भारी वृद्धि दर्ज की गई थी, जो इसका जीवंत उदाहरण है।

सीधे आर्थिक प्रोत्साहन: जीवंत मृदा, जलवायु परिवर्तन सहनशीलता और फसल विविधीकरण को अपनाने वाले किसानों के लिए सीधे आर्थिक प्रोत्साहन का प्रावधान उनके खातों में किया जाए।

पारंपरिक बीजों का संरक्षण: किसानों को हर वर्ष महंगे बीज खरीदने के कुचक्र से बचाने के लिए सामान्य प्रचलित प्रजनन विधि से विकसित उन्नत किस्मों और स्वदेशी बीजों के संवर्धन और संरक्षण को बढ़ावा दिया जाए।

पशुपालन को विशेष प्रोत्साहन: छोटे और मंझोले किसानों के लिए पशुपालन को विशेष रूप से प्रोत्साहित किया जाए। इससे देसी घी के रूप में खाद्य तेल का विकल्प मिलेगा और पशुओं के गोबर व मूत्र से प्राकृतिक व जैविक खेती को मजबूती मिलेगी।

जीन एडिटिंग (CRISPR) तकनीक का विरोध

भारतीय किसान संघ ने पार्लियामेंट स्टैंडिंग कमेटी (संसदीय स्थायी समिति) द्वारा फसल सुधार उपायों में प्रस्तावित जीन एडिटिंग (CRISPR) आधारित प्रणाली का कड़ा विरोध किया है और इसे रिपोर्ट से बाहर रखने का आग्रह किया है।

किसान संघ ने चेतावनी देते हुए कहा, “CRISPR जैसी तकनीक से फसलों के प्राकृतिक संसाधनों में ऐसा बदलाव हो सकता है, जिसे वापस सुधारना असंभव होगा। आनुवंशिक छेड़छाड़ से पारिस्थितिकी तंत्र और पर्यावरण का संतुलन बिगड़ने का खतरा है, जैसा पूर्व में पंजाब के मुक्तसर में बीटी कपास के प्रयोग के दौरान देखा जा चुका है, जिसने पूरी मंडी व्यवस्था और किसान की किसानी को अस्त-व्यस्त कर दिया था।

किसान संघ ने कहा कि देश को किसी भी विदेशी संस्था या असुरक्षित तकनीक के अंधानुकरण के बजाय अपनी परिस्थिति तंत्र और पारंपरिक कृषि पद्धतियों के अनुसार समाधान खोजने चाहिए। समय बचाने के बहाने जीन एडिटिंग द्वारा आनुवंशिक और जलवायु पारिस्थितिकी खेती के उपयोग से दूरगामी दुष्परिणाम सामने आ सकते हैं।