अयोध्या, उत्तर प्रदेश
अंतरराष्ट्रीय रामकथा
संग्रहालय को अहमदाबाद से एक अत्यंत दुर्लभ पांडुलिपि को संरक्षित करने का
प्रस्ताव प्राप्त हुआ है। बताया जा रहा है कि यह पांडुलिपि लगभग 200 वर्ष पुरानी
है और इसकी विशेषता यह है कि यह हस्तलिखित होने के साथ-साथ लिथोग्राफी तकनीक से
मुद्रित भी है। इस पांडुलिपि में गुजराती और अंग्रेजी भाषाओं में चौपाइयां, दोहे और श्लोक लिखे गए हैं। विशेषज्ञों
के अनुसार, लिथोग्राफी
विधा भारत में 19वीं शताब्दी के मध्य के आसपास प्रचलन में आई थी, जिससे इसकी प्राचीनता और अधिक
महत्वपूर्ण हो जाती है। संग्रहालय द्वारा इसकी प्रमाणिकता की जांच के बाद ही इसे
आधिकारिक रूप से स्वीकार किया जाएगा।
वहीं लखनऊ से भी एक
बुजुर्ग व्यक्ति ने अपने पास लगभग 150 वर्ष पुरानी रामचरितमानस की हस्तलिखित प्रति
होने का दावा किया है और उसे संरक्षित करने के लिए संग्रहालय से अनुरोध किया है।
इन दावों की सत्यता की जांच की जा रही है, ताकि वास्तविक और दुर्लभ पांडुलिपियों को ही संरक्षित किया जा
सके।
यह पूरा अभियान प्रधानमंत्री संग्रहालय के मार्गदर्शन में संचालित हो रहा है। इसके अंतर्गत रामकथा संग्रहालय में एक विशेष संग्रहण केंद्र स्थापित किया गया है, जिसका उद्देश्य देशभर में फैली प्राचीन पांडुलिपियों को एकत्रित करना, उनका संरक्षण करना और आमजन के लिए प्रदर्शित करना है।
अब तक संग्रहालय को
देश के विभिन्न हिस्सों से पांच-छह दुर्लभ पांडुलिपियों के प्रस्ताव प्राप्त हो
चुके हैं, जिनमें
रामायण और रामचरितमानस से संबंधित अत्यंत प्राचीन और महत्वपूर्ण प्रतियां शामिल
हैं। हालांकि, अभी
तक किसी भी पांडुलिपि को अंतिम रूप से स्वीकार नहीं किया गया है। सभी प्रस्तावों
की गहन जांच और प्रमाणिकता सुनिश्चित करने के बाद ही उन्हें संग्रहालय में स्थान
दिया जाएगा।



