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फाइल खुली तो खुलते गए राज: मजार, मदरसे और जमीन का पूरा हिसाब-किताब

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फाइल खुली तो खुलते गए राज: मजार, मदरसे और जमीन का पूरा हिसाब-किताब


उत्तराखंड के ऊंचे-नीचे इलाकों हो या समतल भूमि... पिछले कुछ वर्षों में जिन जगहों पर कभी सरकारी जमीन, वन भूमि या सड़क किनारे खाली जगह हुआ करती थी, वहां अचानक प्रकट हुईं कई मजारें अब प्रशासनिक फाइलों के सामने टिक नहीं पा रही हैं।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सरकार के अभियान के तहत राज्यभर में लगभग 600 अवैध मजारों पर कार्रवाई किए जाने का दावा है। कभी राजस्व विभाग के नक्शे खंगाले जा रहे हैं तो कभी वन विभाग की जमीन का रिकॉर्ड निकाला जा रहा है। नतीजा यह है कि वर्षों से चले आ रहे कई निर्माण अब जांच के घेरे में हैं।

आस्था अपनी जगह, लेकिन जमीन किसकी?

सरकार का संदेश स्पष्ट है- कार्रवाई किसी मत या समुदाय के विरुद्ध नहीं, बल्कि सरकारी और वन भूमि पर हुए अतिक्रमण के विरुद्ध है।

दिलचस्प बात यह है कि जब प्रशासन ने जमीन के रिकॉर्ड मिलाने शुरू किए तो कई ऐसी मजारें सामने आईं जिनका राजस्व रिकॉर्ड में कोई अस्तित्व ही नहीं मिला। 

'ऑपरेशन मजार'

वर्ष 2025 में उत्तराखंड सरकार ने वन भूमि, राजस्व भूमि और अन्य सरकारी जमीनों पर बने धार्मिक अतिक्रमणों का सर्वे शुरू कराया।

जांच के दौरान पता चला कि कई स्थानों पर बनी मजारों का न तो कोई राजस्व रिकॉर्ड था और न ही निर्माण की वैध अनुमति।

जुलाई 2025: एक साथ पांच मजारों पर बुलडोजर

3 जुलाई 2025 को ऊधम सिंह नगर जिले के कुंडेश्वरी क्षेत्र में प्रशासन ने एक साथ पांच अवैध मजारों को ध्वस्त कर दिया।

25 अप्रैल 2025: दून अस्पताल परिसर में मजार पर एक्शन

देहरादून स्थित दून अस्पताल परिसर में बनी अवैध मजार पर प्रशासन ने कार्रवाई की, और 25 अप्रैल 2025 की देर रात बुलडोजर चलाकर ध्वस्त कर दिया गया। मजार को सरकारी जमीन पर अवैध रूप से बनाया गया था।

25 अप्रैल 2026: किच्छा में मजार ध्वस्त

ऊधम सिंह नगर के बरेली-नैनीताल नेशनल हाईवे के बराबर मे बेनी नदी के समीप रेलवे भूमि पर बनी अवैध मजार पर बुलडोजर कार्रवाई की गई। इज्जतनगर रेलवे प्रशासन द्वारा मजार प्रबंधकों को पहले ही नोटिस जारी कर भूमि के दस्तावेज प्रस्तुत करने को कहा गया था। 26 मई 2023 और 18 सितंबर 2025 को दो बार नोटिस भी दिए गए थे। मगर जब कोई वैध कागजात नहीं दिखाए गए तो पीले पंजे ने इसे ध्वस्त कर दिया ।

मई 2026: गुलरभोज में मस्जिद और मजारों पर कार्रवाई

अप्रैल-मई 2026 के दौरान ऊधम सिंह नगर के गुलरभोज क्षेत्र में प्रशासन ने एक मस्जिद और दो मजारों पर बुलडोजर कार्रवाई की।

प्रशासन का दावा था कि निर्माण सरकारी भूमि पर किया गया था और आवश्यक अनुमतियां उपलब्ध नहीं थीं।

जून 2026: देहरादून में सरकारी जमीन पर बनी मजार हटाई

जून 2026 में देहरादून प्रशासन ने यमुना कॉलोनी में सरकारी भूमि पर बनी एक मजार को हटाया।

कार्रवाई के बाद अधिकारियों ने साफ कहा कि सरकारी भूमि पर किसी भी प्रकार का अतिक्रमण स्वीकार नहीं किया जाएगा, चाहे उसका स्वरूप कुछ भी हो।

मदरसों की जांच में निकले चौंकाने वाले आंकड़े

अगर मजारों पर कार्रवाई चर्चा में रही, तो मदरसों की जांच ने भी प्रशासनिक मशीनरी को व्यस्त रखा।

राज्यव्यापी सत्यापन अभियान में 200 से अधिक अपंजीकृत मदरसे चिन्हित किए गए। इनमें सबसे अधिक 129 मामले ऊधम सिंह नगर में मिले। देहरादून में 57 और नैनीताल में 26 मदरसे जांच के दायरे में आए।

अब तक 222 मदरसों को सील किए जाने की जानकारी सामने आ चुकी है।

जिलावार आंकड़े देखें तो-

हरिद्वार – 85 मदरसे सील

ऊधम सिंह नगर – 66 मदरसे सील

देहरादून – 44 मदरसे सील

नैनीताल – 24 मदरसे सील

पौड़ी गढ़वाल – 2 मदरसे सील

अल्मोड़ा – 1 मदरसा सील

बिजली, भवन और दस्तावेज... जांच में निकल रही हैं नई-नई परतें

जांच केवल पंजीकरण तक सीमित नहीं रही। कई स्थानों पर भवन मानकों, भूमि स्वामित्व, नक्शा स्वीकृति और बिजली कनेक्शन तक की जांच की गई।

कुछ मामलों में यह भी सामने आया कि संस्थान जिस श्रेणी में चल रहे थे, उनके कनेक्शन दूसरी श्रेणी में जारी थे। कहीं भूमि उपयोग का सवाल उठा तो कहीं निर्माण अनुमति का।

यानी मामला केवल इमारत का नहीं, बल्कि पूरे दस्तावेजी ढांचे का बन गया।

आखिर इतने साल तक सब चलता कैसे रहा?

यह पूरा अभियान एक बड़ा सवाल भी छोड़ रहा है।

यदि 600 से ज्यादा मजारें अवैध थीं, 200 से अधिक मदरसे अपंजीकृत थे और कई निर्माणों के पास वैध दस्तावेज नहीं थे, तो फिर वर्षों तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

क्या स्थानीय प्रशासन को जानकारी नहीं थी?

क्या विभागों ने रिकॉर्ड नहीं देखा?

या फिर फाइलें थीं, लेकिन उन्हें खोलने की जरूरत अब महसूस हुई?

यही वह सवाल है जिसका जवाब शायद सरकार से ज्यादा पुराने प्रशासनिक रिकॉर्ड दे सकते हैं।

अब नया नियम: पहले कागज, फिर निर्माण

उत्तराखंड में चल रही कार्रवाई का सबसे बड़ा संदेश यही है कि अब केवल निर्माण खड़ा कर देना पर्याप्त नहीं होगा।

प्रशासन जमीन का रिकॉर्ड देख रहा है, भवन अनुमति देख रहा है, पंजीकरण देख रहा है और आवश्यकता पड़ने पर बिजली कनेक्शन तक की जांच कर रहा है।

सरल शब्दों में कहें तो अब बुलडोजर से पहले फाइल चल रही है और फाइल में नाम नहीं मिला तो बुलडोजर की एंट्री हो रही है।