परंपरा और प्रगति के बीच संतुलन
उत्तर प्रदेश, भारत का सर्वाधिक जनसंख्या वाला ही नहीं, अपितु सर्वाधिक युवा आबादी वाला राज्य भी है। यह प्रदेश-भारतीय सभ्यता, संस्कृति, अध्यात्म और साहित्य की जीवंत धुरी भी है। अयोध्या, काशी, मथुरा, प्रयागराज, गोरखपुर और लखनऊ से आगरा तक फैली इसकी सांस्कृतिक चेतना हजारों वर्षों की ऐतिहासिक यात्रा का प्रतिफल है। इस पावन भूमि के वातावरण में वेदों की ऋचाएं घुली हुई हैं, तो यहां राम और कृष्ण की लीलाएं भी जीवंत हैं। इस धरती ने बुद्ध, महावीर और गुरू गोरक्षनाथ के संदेशों को आत्मसात किया तो कबीर, तुलसीदास, सूरदास, रहीम, भारतेंदु हरिश्चंद्र, प्रेमचंद, फिराक गोरखपुरी, बिस्मिल्लाह खान, बिरजू महाराज, सदी के महानायक अमिताभ बच्चन, अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला और लोक गायिका मालिनी अवस्थी जैसी प्रसिद्ध शख्सियतों की जन्मस्थली भी यही है। अमर शहीद राम प्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आज़ाद और अशफाकउल्ला खां के बलिदान की कहानियां भी यहां घर-घर में सुनी-सुनाई जाती हैं।
”जिस ओर जवानी चलती है, उस ओर जमाना चलता है“ आज यह सिर्फ नारा नहीं बल्कि सौ फीसदी हकीकत लगता है। शायद इसीलिए आज जब भूमंडलीकरण, डिजिटलीकरण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई का दौर, नौजवान होती पीढ़ी की सोच और जीवनशैली को तेजी से बदल रहा है, तब यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या उत्तर प्रदेश का नौजवान अपनी सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा हुआ है? या वह आधुनिकता की दौड़ में अपनी जड़ों से दूर होता जा रहा है? यह सवाल केवल संस्कृति का नहीं, बल्कि आने वाले दौर के भारत की पहचान का भी है।
सोलहवीं सदी में महाकवि तुलसीदास ने ”रामचरितमानस“ में लिखा - ”परहित सरिस धरम नहिं भाई। परपीड़ा सम नहिं अधमाई।।“ यह केवल धार्मिक शिक्षा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति के मूल जीवन-मूल्यों- सेवा, करुणा और सामाजिक उत्तरदायित्व का संदेश है। लगभग छह सौ साल बाद भी यही मूल्य आज के युवाओं के चरित्र निर्माण की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत बहुआयामी है। यहां गंगा-जमुनी तहजीब, कथक नृत्य, बनारसी संगीत परंपरा, लखनऊ की नवाबी संस्कृति, ब्रज की रासलीला, अयोध्या की रामलीला, प्रयागराज का महाकुंभ, वाराणसी की आध्यात्मिक परंपरा और आगरा की स्थापत्य कला एक साथ मिलकर भारतीय संस्कृति का विराट स्वरूप प्रस्तुत करती हैं। प्रदेश की भाषाई विविधता हिंदी, अवधी, ब्रज, भोजपुरी, बुंदेली, कन्नौजी और उर्दू इस सांस्कृतिक संपदा को और समृद्ध बनाती है।
डिजिटल युग में उत्तर प्रदेश का युवा अभूतपूर्व अवसरों के साथ आगे बढ़ रहा है। स्टार्टअप, सूचना प्रौद्योगिकी, पर्यटन, खेल, मीडिया और उद्यमिता के क्षेत्र में उनकी सक्रिय भागीदारी राज्य को नई पहचान दिला रही है। सोशल मीडिया ने बेशक उन्हें वैश्विक मंच दिया है, किंतु यही माध्यम उनकी सांस्कृतिक चेतना की परीक्षा भी ले रहा है। यदि डिजिटल मंचों का उपयोग केवल मनोरंजन तक सीमित रहे, तो विरासत से दूरी बढ़ेगी; जबकि यदि इन्हीं माध्यमों से लोककला, लोकभाषा, पारंपरिक संगीत और ऐतिहासिक धरोहरों का प्रचार-प्रसार किया जाए, तो यही तकनीक सांस्कृतिक पुनर्जागरण का माध्यम बन सकती है।
आज बहुत से युवा बनारसी बुनकरों, चिकनकारी, जरी-जरदोजी, टेराकोटा, काष्ठ शिल्प और स्थानीय उत्पादों को डिजिटल मंचों पर वैश्विक पहचान दिला रहे हैं। यह केवल रोजगार का साधन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संरक्षण का भी आधुनिक स्वरूप है। इसी दौर में क्षेत्रीय और स्थानीय पहचान पर विशेष जोर दिया जा रहा है। सरकार भी ‘एक जिला, एक उत्पाद’ (ओडीओपी) जैसी योजना चला रही है।
भारतेंदु हरिश्चंद्र ने लिखा था-”निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।“ यह पंक्ति आज भी उतनी ही सार्थक और प्रासंगिक है। यदि उत्तर प्रदेश का युवा अपनी मातृभाषा और स्थानीय बोलियों से दूर हो जाएगा, तो वह अपनी सांस्कृतिक स्मृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा खो देगा। निश्चित तौर पर अंग्रेज़ी और वैश्विक भाषाओं का ज्ञान आवश्यक है, लेकिन अपनी भाषा से आत्मीय संबंध बनाए रखना सांस्कृतिक आत्मविश्वास की पहली शर्त है।
संस्कृत साहित्य में भी कहा गया है- ”विद्वत्त्वं च नृपत्वं च नैव तुल्यं कदाचन। स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते।।“ तात्पर्य यह कि एक विद्वान और एक राजा की कभी तुलना नहीं की जा सकती। राजा केवल अपने ही देश में पूजा जाता है, जबकि विद्वान व्यक्ति को सभी जगह सम्मान मिलता है। यानी ज्ञान बहुत ज़रूरी है और वह बिना शिक्षा के संभव नहीं है। लेकिन यहां यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि शिक्षा केवल ज्ञान प्राप्ति की नहीं, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण की प्रक्रिया को भी रेखांकित करती है। प्रदेश के युवा यदि इस मूल्य-श्रृंखला को आत्मसात करें, तो वे आधुनिकता और परंपरा का संतुलित समन्वय स्थापित कर सकते हैं।
आज राज्य में युवाओं को सांस्कृतिक गतिविधियों से जोड़ने के लिए लगातार नई पहल की जा रही है। कॉलेजों में सांस्कृतिक क्लब, युवा सांस्कृतिक दूत और भजन क्लबिंग जैसी योजनाएं तथा विरासत संरक्षण संबंधी कार्यक्रम युवाओं को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं। इसी प्रकार पर्यटन और सांस्कृतिक विरासत को स्थानीय रोजगार तथा आर्थिक विकास से जोड़ने की दिशा में भी कार्य हो रहा है।
हालांकि चुनौतियां भी कम नहीं हैं। उपभोक्तावादी संस्कृति, त्वरित मनोरंजन, पश्चिमी जीवनशैली की अंधानुकरण प्रवृत्ति, लोक भाषाओं का घटता प्रयोग और पारंपरिक कलाओं के प्रति लगातार कम होती रुचि के कारण सांस्कृतिक संरक्षण के सामने गंभीर प्रश्न खड़े करती हैं। यदि नई पीढ़ी अपने इतिहास, साहित्य और सांस्कृतिक प्रतीकों से अपरिचित रह जाएगी, तो भविष्य की सांस्कृतिक निरंतरता कमजोर हो सकती है।
उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक शक्ति केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि भविष्य की संभावना भी है। धार्मिक पर्यटन, सांस्कृतिक पर्यटन, लोक कलाओं का संरक्षण, पारंपरिक शिल्प का डिजिटलीकरण और सांस्कृतिक उद्यमिता राज्य की अर्थव्यवस्था को भी नई दिशा दे सकते हैं। पिछले दिनों संपन्न हुआ प्रयाग महाकुंभ इसका शानदार उदाहरण है। प्रदेश को सांस्कृतिक पर्यटन के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं, जिनसे युवाओं के लिए नए अवसर उत्पन्न हो रहे हैं।
”हम कौन थे, क्या हो गए हैं और क्या होंगे अभी, आओ विचारें आज मिलकर ये समस्याएं सभी।” पिछली सदी के शुरुआती दशक में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त रचित ”भारत भारती“ की ये पंक्तियां आज भी प्रासंगिक हैं। प्रदेश के नौजवानों को इस पर चिंतन-मनन करना चाहिए। उन्हें यह समझना होगा कि सांस्कृतिक विरासत केवल स्मारकों, मंदिरों, मस्जिदों, किलों या संग्रहालयों में सुरक्षित नहीं रहती; वह हमारे व्यवहार, भाषा, साहित्य, संगीत, उत्सव, त्यौहार, परिवार और जीवन-मूल्यों में भी जीवित रहती है। प्रदेश का युवा यदि आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक सोच और वैश्विक दृष्टि के साथ अपनी सांस्कृतिक जड़ों को भी उतना ही सम्मान देगा, तभी वह सच्चे अर्थों में विकसित नागरिक कहलाएगा। आधुनिकता और परंपरा परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे की पूरक हैं। आवश्यकता इस संतुलन को समझने की है।
साल 1980 में प्रसिद्ध अमेरिकी लेखक एल्विन टॉफलर ने अपनी किताब ”द थर्ड वेव“ के जरिए दुनिया के सामने ”एम क्यूब“ यानी मनी, मसल, माइंड का नया सिद्धांत प्रतिपादित किया था। उन्होंने विस्तार से बताया था कि जिसने भी इन तीनों ( मनी, मसल, माइंड) में से किसी एक को भी साध लिया, वह दुनिया पर राज करेगा। आज लगभग पांच दशक बाद सूचना क्रांति के इस युग में माइंड यानी ज्ञान ही शक्ति का सबसे परिष्कृत और उच्चतम गुणवत्ता वाला स्वरूप बन गया है। हम पूरे विश्वास के साथ कह सकते हैं कि इस लिहाज़ से प्रदेश का नौजवान कहीं से कमतर नहीं है। सच कहें तो प्रदेश की युवा शक्ति इस कसौटी पर पूरी तरह खरी उतरी है।
युवाओं के हाथों में केवल अपने भविष्य की नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना की भी मशाल है। यदि यह पीढ़ी अपनी विरासत को समझकर आगे बढ़ेगी, तो उत्तर प्रदेश केवल आर्थिक या तकनीकी विकास का ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक नेतृत्व का भी अग्रदूत बनेगा। यही इस युग की सबसे बड़ी आवश्यकता और सबसे बड़ी उम्मीद है।
देश को सबसे ज्यादा प्रधानमंत्री देने वाला और सबसे ज्यादा एक्सप्रेस-वे वाला उत्तर प्रदेश आज युवाओं की ताक़त के बूते एक्सप्रेस की रफ्तार से विकास के नित नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है। वह दिन दूर नहीं जब लोग उत्तर प्रदेश को उत्कृष्ट प्रदेश के तौर पर जानेंगे।




