देहरादून, उत्तर प्रदेश
उत्तराखण्ड की समृद्ध लोकसंस्कृति, धार्मिक परंपराएं और लोक आस्था
आज भी लोगों को अपनी जड़ों से जोड़े हुए हैं। इन्हीं प्राचीन परंपराओं में शामिल
कत्यूरों की ‘बैसी’ एक बार फिर श्रद्धा और
भक्ति के माहौल के बीच आयोजित की जा रही है। लगभग 28 वर्षों बाद इस दुर्लभ देव
परंपरा के पुनः आयोजन से पहाड़ से लेकर भाबर तक भक्तिमय वातावरण देखने को मिल रहा
है।
बता दें, नैनीताल जिले के विजयपुर धनखल गांव में विशेष देव
अनुष्ठान के तहत सबसे पहले भगवान शिव, भूमि देवता और स्थानीय देवी-देवताओं की विधि-विधान से
पूजा-अर्चना की गई। इसके बाद बड़ी संख्या में श्रद्धालु देव डांगरों के साथ
रानीबाग स्थित चित्रशिलाघाट के लिए रवाना हुए। यहां गौला नदी में महास्नान किया
गया और शाम को कत्यूरी राजवंश की प्रथम महारानी जियारानी की जागर आयोजित हुई। इस
धार्मिक आयोजन में हल्द्वानी में रहने वाले कत्यूरी परिवारों के साथ पूर्व
केंद्रीय मंत्री और नैनीताल सांसद अजय भट्ट भी शामिल हुए।
धनखल गांव के कत्यूर खली और विजयपुर थान में 16 जुलाई से
शुरू हुई यह प्राचीन बैसी परंपरा 11 दिनों तक चलती है। इस अनुष्ठान में कत्यूर
समाज के सात गांव भाग ले रहे हैं। विशेष बात यह है कि अनुभवी साधकों के साथ बड़ी
संख्या में युवाओं ने भी कठोर नियमों का पालन करते हुए इस तपस्या और धार्मिक
परंपरा में भाग लिया है।
वहीं सातों गांवों से श्रद्धालु ढोल, दमाऊ, हुड़का और कांसे की थालियों की
मंगलध्वनि के बीच चित्रशिला के लिए रवाना हुए। देव अवतरण के बाद ग्रामीणों को
सुख-समृद्धि और खुशहाली का आशीर्वाद दिया गया। गौलानदी में महास्नान और महारानी
जियारानी की जागर के बाद देर रात श्रद्धालु वापस विजयपुर धनखल लौट आए।
लोकसंस्कृति और धार्मिक परंपराएं केवल आस्था का प्रतीक नहीं
होतीं, बल्कि वे नई पीढ़ी को अपनी
विरासत, इतिहास और सामाजिक एकता से
जोड़ने का सशक्त माध्यम भी हैं।



