उदयपुर
स्नातकोत्तर अध्ययन अधिष्ठाता कार्यालय द्वारा मोहनलाल सुखाड़िया
विश्वविद्यालय के बप्पा रावल सेमिनार हॉल, गेस्ट
हाउस में ‘शोध और भारत का पुनरुत्थान’ विषय पर व्याख्यान का आयोजन किया। कार्यक्रम
की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. कैलाश डागा ने की।
मुख्य वक्ता प्रज्ञा प्रवाह के
अखिल भारतीय सह संयोजक चंद्रकांत जी ने भारत की शिक्षा व्यवस्था, शोध दृष्टिकोण और औपनिवेशिक मानसिकता के प्रभावों पर गहन
विचार व्यक्त किए। उन्होंने मैकॉले की शिक्षा व्यवस्था के प्रभावों पर चर्चा करते
हुए कहा कि इस व्यवस्था ने भारतीयों की सोच और शोध दृष्टिकोण को प्रभावित किया।
संस्कृत के अध्ययन के लिए ब्रिटेन में बोडेन चेयर की स्थापना क्यों की गई थी और
किस प्रकार भारतीय ज्ञान परंपरा के संबंध में विभिन्न प्रकार की भ्रांतियां और गलत
धारणाएं प्रसारित की गईं। उन्होंने आर्य आक्रमण सिद्धांत को ऐसी ही एक ऐतिहासिक
गलत धारणा के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया।
चंद्रकांत जी ने औपनिवेशिक
मानसिकता को समझाने के लिए उदाहरण दिए। उन्होंने कहा कि ‘ब्लैक’ केवल एक रंग है, लेकिन ‘ब्लैकमेलिंग’, ‘ब्लैक
मार्केटिंग’ और ‘ब्लैक लिस्टिंग’ जैसे शब्दों में इसे नकारात्मक अर्थों से जोड़
दिया गया है। भाषा और विचारों के ऐसे प्रयोगों को भी व्यापक ऐतिहासिक और सामाजिक
संदर्भ में समझने की आवश्यकता है।
उन्होंने ‘धर्म’ और ‘रिलीजन’ के
बीच अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा कि धर्म किसी संकीर्ण धार्मिक पहचान का नाम नहीं, बल्कि जीवन का नैतिक मार्गदर्शक और नैतिक कसौटी है। उन्होंने
धर्मचक्र, धर्मशाला, धर्मकांटा, धर्मभाई
और धर्मबहन जैसे उदाहरण देते हुए कहा कि भारतीय परंपरा में धर्म जीवन के विभिन्न
क्षेत्रों में नैतिकता और कर्तव्यबोध से जुड़ा है। इसलिए धर्म को केवल ‘रिलिजन’ के
अर्थ में समझना उचित नहीं है।
चंद्रकांत जी ने कहा कि भारत
पिछले लगभग एक हजार वर्षों से विभिन्न प्रकार के आक्रमणों और चुनौतियों का सामना
करता रहा है। ऐसी परिस्थिति में भारतीयों में आत्मविश्वास का पुनर्निर्माण अत्यंत
आवश्यक है। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा और अतीत की उपलब्धियों को समझना
और उनका गौरव करना आवश्यक है, लेकिन
केवल अतीत का गौरवगान पर्याप्त नहीं है। भारत को वर्तमान शोध समस्याओं पर भी ध्यान
केंद्रित करना होगा और भारतीय दृष्टिकोण तथा भारतीय ज्ञान परंपरा से प्रेरित सोच
के साथ नए शोध की दिशा तय करनी होगी।
उन्होंने भारतीय और पश्चिमी
सामाजिक दृष्टिकोणों में अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा कि भारतीय समाज की सबसे छोटी
सामाजिक इकाई परिवार है, जबकि
पश्चिमी समाज में व्यक्ति को सबसे छोटी सामाजिक इकाई माना जाता है। उन्होंने कहा
कि भारतीय दर्शन में आनंद को मानव जीवन का अंतिम और सर्वोच्च लक्ष्य माना गया है।
कुलगुरु प्रो. कैलाश डागा ने कहा कि भारतीय दृष्टिकोण और वैश्विक समझ के समन्वय से विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए नए अवसर विकसित किए जा सकते हैं। कार्यक्रम के प्रारंभ में स्नातकोत्तर अध्ययन के अधिष्ठाता के. बी. जोशी ने समकालीन चुनौतियों के अध्ययन और समाधान मूलक विषयों पर शोध की आवश्यकता प्रतिपादित की।



