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धर्म, समाज, परिवार और प्रकृति से जोड़ते अप्रैल के पर्व और उत्सव

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धर्म, समाज, परिवार और प्रकृति से जोड़ते अप्रैल के पर्व और उत्सव 

गुनी उथिरम प्रमुख तमिल त्योहार 1 अप्रैल को मनाया जाएगा। यह तमिल महीने पंगुनी की पूर्णिमा को पड़ता है, जब उथिरम नक्षत्र संरेखित होता है। यह दक्षिण भारत, विशेषकर मुरुगन मंदिरों में भगवान मुरुगन और देवयानी के दिव्य विवाह के रूप में बहुत उत्साह से मनाया जाता है। इसलिए इसे ‘दिव्य मिलन’ का दिन माना जाता है। 

उत्तर पूर्व भारत के नागालैंड के मोन जिले में आओलिंग महोत्सव (1 से 6 अप्रैल या 2 से 7 अप्रैल) कोन्याक जनजातियों का पर्व है। ये अपना अधिकतर समय खेती करने और शिकार करने में बिताते हैं। हर साल वसंत को चिहिंत करने के लिए यह त्योहार मनाते हैं। हनुमान जन्मोत्सव (2 अप्रैल) को मंदिरों में सुदंरकाण्ड का पाठ और भण्डारे आयोजित किए जाते हैं।  

मोपिन महोत्सव (5 से 7 अप्रैल) अरूणाचल प्रदेश का आनन्दायक उत्सव है। यह फसल उत्सव एलॉन्ग, बसर और बामे के लोगों द्वारा मनाया जाने वाला उत्सव है। उस समय यहां का प्राकृतिक सौन्दर्य बहुत मनमोहक होता है।  

13 अप्रैल 1699 को श्री केसरगढ़ साहिब आनन्दपुर में दसवें गुरु गोविंद सिंह ने खालसा पंथ की स्थापना की थी इसलिए सभी गुरुद्वारों में वैसाखी समारोह मनाया जाता है। 

वरुथिनी एकादशी (13 अप्रैल) के दिन भगवान श्री हरिहर विष्णु की पूजा की जाती है। ऐसा मानना है कि कुरुक्षेत्र में सूर्यग्रहण के समय जो एक मन सोना दान करके पुण्य मिलता है, वही पुण्य इस दिन व्रत करने से मिलता है। श्री वल्लभाचार्य जयंती इस वर्ष उनका 547वां जन्मदिन है। वाराणसी में तेलगु ब्राह्मण परिवार में जन्में महापुरूष के लिए प्रचलित मान्यता है कि भगवान कृष्ण श्रीनाथ जी के रूप में इनके सामने प्रकट हुए थे।

वैसाखी उत्सव फसल कटाई के समय को दर्शाता है और ऐसा माना जाता है कि गंगा नदी वैसाखी को धरती पर अवतरित हुई थी इसलिए इस दिन गंगा स्नान का महत्व है जो नहीं पहुंच सकते, वे अपने आस पास बहने वाली नदी पर जाते हैं। पंजाब में वैसाखी के दिन नदियों के पास ही मेले लगते हैं। सुबह सपरिवार जो भी पास में नदी या बही होती है, वहां स्नान करते हैं। लौटते हुए जलेबी और अंदरसे खाते हैं। लोटे में नदी का जल, गेहूं की पाँच छिंटा (बालियों वाली डंडियां) घर लाकर उस पर कलेवा बांध कर मुख्य द्वार से लटका दिया जाता है और नदी के जल को पूजा की जगह रख दिया जाता है। स्कूलों में भी बाडियां (गेहूं की कटाई) की छुट्टियां हो जाती हैं। फिर सपरिवार कटाई में लग जाते हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बैसाख यानि अप्रैल में मनाया जाने वाला बिहू उत्सव है। इस समय बसन्त के कारण प्राकृतिक सौन्दर्य चारों ओर होता है। इसे रोंगाली बिहु या बोहाग बिहू (14 से 20 अप्रैल) भी कहते हैं। एक महीना रात भर किसी न किसी के घर बीहू नृत्य गाना होता है।

शाद सुक मिंसिएम उत्सव (14 अप्रैल) मेघालय का लोकप्रिय त्योहार है। जैसे भारत के अधिकतर हिस्सों में फसल कटाई की खुशी के पर्व हैं। उसी तरह खासी पुरूष और महिलाएं भी रेशमी कपड़ों में और गहनों से सजकर, पुरूष रेशमी धोती, बास्केट, पंख लगी पगड़ी और पारंपरिक आभूषण पहन कर साथ साथ नाचते हैं। 

 उत्तराखण्ड में बिखोती उत्सव मनाया जाता है जिसमें पवित्र नदी में स्नान करके राक्षस को पत्थर मारने की प्रथा है। 

यूनेस्को द्वारा 2016 में मानवता की सांस्कृतिक विरासत के रुप में दर्ज, पाहेला वैशाख (14 या 15 अप्रैल ) बंगाल, त्रिपुरा, बांगलादेश में उत्सव पर मंगल शोभा यात्रा का आयोजन होता है। झारखण्ड के आदिवासी, समुदाय के साथ सरहुल मनाते हैं और सरना देवी की पूजा करते हैं। उसके बाद से नया धान, फल, फूल खाते हैं और बीज बोया जाता है। यह माँ प्रकृति की पूजा और वसंत उत्सव है जो प्रजनन का भी संकेत देता है और शादी विवाह की शुरूआत होती है। 

 तमिल नववर्ष को पुथांडु उत्सव कहते हैं। तमिल महीने चितराई के पहले दिन पुथांडु, तमिल नाडु, पांडीचेरी, श्रीलंका, मलेशिया, सिंगापुर, मारीशियस में और विश्व में जहां भी तमिलियन हैं, मनाया जाता है। यह आमतौर पर 14 अप्रैल को पड़ता है। इस दिन को तमिल नववर्ष या पुथुवरुशम के नाम से भी जाना जाता है। 

चिथिराई महोत्सव, एक महीने 14,15  अप्रैल से मदुरै तमिलनाडु, मदुरै के प्रसिद्ध मंदिर में भगवान सुंदरेश्वर के साथ देवी मीनाक्षी के विवाह के उपलक्ष में मनाया जाता है। जोड़े की मूर्तियों को सजाए गए रथ में शहर के चारों ओर ले जाया जाता है। जिसका लोग बड़े उत्साह से स्वागत करते हैं।

केरल के कोल्लम में प्रसिद्ध कोल्लम पूरम उत्सव का आयोजन 15 अप्रैल को होने की संभावना है। यह केरल की संस्कृति का एक प्रमुख उत्सव है जो भव्य जुलूसों, पारंपरिक संगीत (पंचवाद्यम), और सजे हुए हाथियों के साथ मनाया जाता है, जो इस क्षेत्र का एक प्रमुख आकर्षण है। 

ऊटी का मरियम्मन मंदिर उत्सव आमतौर पर हर साल अप्रैल महीने में मनाया जाता है। 2026 के लिए विशिष्ट तिथियों की आधिकारिक घोषणा अभी लंबित है, लेकिन परंपरा के अनुसार यह मध्य अप्रैल 2026 के दौरान होने की उम्मीद है। 

अप्रैल पेनकुनी उत्सव यह तिरुवनंतपुरम में 24 मार्च से 2 अप्रैल तक चल रहा है। तमिलनाडु के अन्य क्षेत्रों में मरियम्मन उत्सवों की कुछ तिथियां घोषित हो चुकी हैं, जैसे ओझुगईमंगलम में 5 अप्रैल से 12 अप्रैल तक रथ उत्सव मनाया जाएगा। 

केरल का नववर्ष मलियाली महीने मेदान के पहले दिन विशु मनाया जाता है। आसपास के राज्यों के कुछ हिस्सों में भी मनाया जाता है। 14 या 15 अप्रैल को परिवार के साथ मनाते हैं। यह पर्व भगवान विष्णु और उनके अवतार कृष्ण को समर्पित है। इस दिन सार्वजनिक अवकाश होता है। पिछली फसल के लिए भगवान का धन्यवाद किया जाता है और धान की बुआई की जाती है। 

कदम्मनिता पदयानी (14 से 23 अप्रैल) यह त्यौहार केरल में राज्य की समृद्ध संस्कृति, कौशल, सजावट, परंपराओं और रंग का शानदार प्रर्दशन है।  

 भारतीय संविधान के पिता, भारत के महान व्यक्तित्व बाबासाहेब डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर का जन्मदिन 14 अप्रैल को धूमधाम से मनाया जाता है। कोल्लम पूरम, कोल्लम (15 अप्रैल) उत्सव की शुरुआत ‘चूटु वैपू’ अनुष्ठान से होती है, जिसमें मंदिर के पवित्र दीपक से आग जलाई जाती है और पारंपरिक ‘थप्पु’ वाद्ययंत्र बजाया जाता है। 

परशुराम जयंती 19 अप्रैल महर्षि के सम्मान में इस दिन को उच्च लक्ष्यों की प्राप्ति करने के लिए, जीवन की सुखसुविधाओं का त्याग करने के तरीके के रूप में मनाया जाता है। इसको अक्षय तृतीया भी कहा जाता है, जो नए प्रयास शुरू करने, व्यवसाय शरू करने, सोना खरीदने के लिए यह दिन बहुत शुभ होता है।

बसव जयंती (20 अप्रैल) लिंगायतों द्वारा पारंपरिक रूप से मनाई जाने वाली बसवन्ना की जयंती है जो 12वीं सदी के हिंदू कन्नड़ कवि और दार्शनिक शिव के अनुयायी थे। कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, तेलंगाना में मनाया जाता है। 

 गरिया पूजा (21 अप्रैल) त्रिपुरा में सात दिन तक चलने वाला यह उत्सव है। इसमें गरिया देवता की पूजा होती है जो पशुधन और धन की रक्षा करते हैं। इस दौरान भगवान गरिया को प्रसन्न करने के लिए बच्चे ढोल बजा कर नाचते गाते हैं। 

शंकराचार्य जयंती, महान संत प्रसिद्ध दार्शनिक, आदिशंकराचार्य का जन्म केरल के कलाडी क्षेत्र में हुआ था। उन्होंने अद्वैत वेदांत दर्शन के सिद्धांत पर चलकर, हिंदू संस्कृति को तब बचाया, जब हिंदू संस्कृति को संजोय रखने की ज़रूरत थी। रामानुज जयंती, रामानुजाचार्य प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय थे। इन्होंने उपनिषदों, ब्रह्म सूत्रों के दर्शन को मिश्रित किया और भक्ति परंपरा को एक मजबूत बौद्धिक आधार दिया। 

  22 अप्रैल को पर्यावरण सुरक्षा के सर्मथन में विश्व पृथ्वी मनाते हैं। गंगा सप्तमी का त्योहार 23 अप्रैल को गंगा नदी के पृथ्वी पर अवतरण के उपलक्ष्य में मनाया मनाया जाएगा। इस दिन गंगा स्नान और पूजा करना बेहद पवित्र माना जाता है। बगुलामुखी जयंती (24 अप्रैल) इन्हें मां पीताम्बरा या ब्रह्मास्त्र विद्या, आठवीं महाविद्या भी कहा जाता है। देवी की पीली पोशाक और पीला श्रंृगार होता है। तांत्रिक लोग इन्हें बहुत मानते हैं। पीताम्बरा पीठ, दतिया मध्य प्रदेश में और हिमाचल के बगुलामुखी मंदिर में मेला लगता है। सीता नवमी (जानकी जयंती 25 अप्रैल) को मनाई जाएगी। यह वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को पड़ती है, जो माता सीता के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाया जाने वाला एक अत्यंत पवित्र त्यौहार है। 30 अप्रैल को नरसिंह जयंती, छिन्नमस्ता जयंती मनाई जायेगी। फसल उत्सव, प्रेरणास्रोत महापुरुषों का जन्मदिन, पशुधन और पर्यावरण संरक्षण को विशेष दिनों में मनाना हमारे जीवन को खुशहाल बनाता है।