इंजीनियर प्रधान ने बदल दी गांव की तस्वीर, 214 घरों में जल रहे ‘बेफिक्री’ के चूल्हे
उत्तराखंड के हरिद्वार जिले की इब्राहिमपुर पंचायत आज ग्रामीण आत्मनिर्भरता, स्वच्छ ऊर्जा और जैविक खेती का प्रेरणादायी मॉडल बन चुकी है। इस बदलाव के केंद्र में हैं मैकेनिकल इंजीनियर और ग्राम प्रधान स्वामी घनश्याम, जिन्होंने बहुराष्ट्रीय कंपनी की नौकरी छोड़ गांव लौटकर विकास की नई कहानी लिख दी। उनके प्रयासों से पंचायत के 214 घरों में बायोगैस से चूल्हे जल रहे हैं और हलजौरा गांव लगभग एलपीजी मुक्त हो चुका है।
300 परिवारों वाली इस पंचायत में गोबर प्रबंधन और बढ़ती रसोई गैस लागत बड़ी समस्या थी। स्वामी घनश्याम ने इसे चुनौती नहीं, बल्कि अवसर के रूप में देखा। स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के तहत उन्होंने 45 घनमीटर क्षमता वाला सामुदायिक बायोगैस संयंत्र स्थापित कराया। इसके साथ ही 16 छोटे संयंत्र और 178 घरेलू बायोगैस इकाइयां भी लगवाई गईं। सामुदायिक संयंत्र में प्रतिदिन लगभग 900 किलो गोबर डाला जाता है, जिससे करीब 18 किलो गैस तैयार होती है। यही गैस ग्रामीण परिवारों की रसोई तक पहुंच रही है।
बायोगैस संयंत्र से निकलने वाली स्लरी का उपयोग किसान जैविक खाद के रूप में कर रहे हैं, जिससे खेती की लागत कम हुई और भूमि की उर्वरता बढ़ी है। गांव में स्वच्छता भी बेहतर हुई है और गोबर की समस्या समाप्त होने लगी है।
इब्राहिमपुर पंचायत ने खेती में भी नवाचार किया है। जंगल से सटे क्षेत्र में जंगली जानवर पारंपरिक फसलों को नुकसान पहुंचाते थे। इसके समाधान के लिए प्रधान ने ग्रामीणों को लेमनग्रास की खेती के लिए प्रेरित किया। आज 100 से अधिक किसान लगभग 400 बीघा भूमि पर लेमनग्रास उगा रहे हैं। पंचायत के संयंत्र में हर वर्ष करीब 20 टन तेल का उत्पादन हो रहा है, जिसकी बाजार में कीमत लगभग 1500 रुपये प्रति लीटर तक मिलती है। इससे किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इसके अलावा महिला स्वयं सहायता समूह मसाले, सरसों तेल, आटा, अचार, जूस और जैम तैयार कर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती दे रहे हैं।
स्वामी घनश्याम ने 2007 से 2015 तक मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी की, लेकिन समाजसेवा का भाव उन्हें गांव वापस ले आया। वर्ष 2016 में उन्होंने धन्वंतरि आश्रम ट्रस्ट की स्थापना की और गांव में गोशाला व वृद्धाश्रम शुरू किए। उनकी सेवा भावना को देखते हुए ग्रामीणों ने 2022 में उन्हें ग्राम प्रधान चुना।
इब्राहिमपुर का यह मॉडल साबित करता है कि तकनीक, सामुदायिक सहयोग और मजबूत इच्छाशक्ति से गांव आत्मनिर्भर बन सकते हैं।



