• अनुवाद करें: |
मुख्य समाचार

निःस्वार्थ बुद्धि और ईमानदारी से देशहित में किया जाने वाला प्रत्येक कार्य संघ का ही कार्य है – डॉ. मोहन भागवत जी

  • Share:

  • facebook
  • twitter
  • whatsapp

राजकोट, 19 जनवरी।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने आज राजकोट के सेवा भारती भवन में सौराष्ट्र-कच्छ की युवा प्रतिभाओं के साथ संवाद किया। सरसंघचालक जी ने कहा कि “जब युवा विभिन्न क्षेत्रों में देश के लिए कार्य करते हैं, तब उनके मन में ‘देश क्या है’ इसकी स्पष्ट कल्पना होनी चाहिए। अतीत में इस स्पष्ट विचार के अभाव या इसके धुंधला पड़ने के कारण ही देश गुलाम बना था। हमारा देश चैतन्यमय है, हम इसे भारत माता कहते हैं; यह केवल भूमि का एक टुकड़ा नहीं है। इसका विभाजन नहीं हो सकता, यह भावना से जुड़ा है”।

संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार द्वारा संघ स्थापना से पूर्व किए मंथन का उल्लेख करते हुए संघ की स्थापना की पृष्ठभूमि स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि संघ संपूर्ण हिन्दू समाज को संगठित करने के लक्ष्य के साथ कार्यरत है।

उन्होंने कहा, “जैसे ब्रिटेन में ब्रिटिश और अमेरिका में अमेरिकन रहते हैं, वैसे ही हिन्दुस्तान में रहने वाले ‘हिन्दू’ हैं। भारत और हिन्दुस्तान अलग नहीं, एक ही हैं। भारत एक स्वभाव है और हिन्दू भी एक स्वभाव है। मिल-जुलकर, साथ मिलकर एकता के साथ चलने का स्वभाव ही ‘हिन्दू’ है”।

उन्होंने कहा कि हमारी भावना ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की रही है। सनातन, भारतीय, इंडिक, आर्य और हिन्दू – ये सभी समान नाम हैं, लेकिन ‘हिन्दू’ शब्द सरल है और आसानी से समझ में आता है।

आज देश में हिन्दू समाज को आत्म-विस्मृत (अपनी पहचान भुलाने) करने के लिए चल रहे षड्यंत्रों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि हिन्दू आदिकाल से, परंपरा से इस भूमि पर रह रहे हैं और देश को शक्तिशाली व विकसित बनाने की जिम्मेदारी पूरे समाज की है। इसलिए, संपूर्ण हिन्दू समाज को एकजुट कर, गुणवत्ता का निर्माण कर और विश्व कल्याण के लिए देश को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से संघ निरंतर कार्य कर रहा है।

उन्होंने कहा कि संघ शाखा के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण, श्रेष्ठ और निष्ठावान स्वयंसेवक तैयार करता है। ऐसे स्वयंसेवक समर्पण भाव से समाज के विभिन्न क्षेत्रों में सेवा कार्य करते हैं। लेकिन इसके अलावा भी संघ का कार्य है। केवल उन्हें देखकर संघ के कार्य का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। संघ को समझने के लिए संघ में ही आना होगा। देश का भाग्य बदलने के लिए पूरे समाज की सक्रियता आवश्यक है और समाज में आचरण का परिवर्तन भी जरूरी है। चूंकि सभी लोग शाखा में नहीं आ सकते, इसे ध्यान में रखते हुए संघ ने ‘पंच परिवर्तन’ का विचार प्रस्तुत किया है — सामाजिक समरसता; कुटुंब प्रबोधन; पर्यावरण: पानी बचाएं, प्लास्टिक हटाएं, पेड़ लगाएं; स्व-बोध और स्वदेशी; नागरिक कर्तव्य, इन पांच क्षेत्रों में कोई भी नागरिक छोटे-बड़े कार्य करके देशहित में योगदान दे सकता है।

कार्यक्रम के अंत में युवाओं ने संघ और देशहित से संबंधित प्रश्न पूछे। सरसंघचालक जी ने विभिन्न उदाहरणों के साथ युवाओं की जिज्ञासाओं का समाधान किया। एक प्रश्न के उत्तर में कहा कि “संघ को जानना है तो विकिपीडिया न पढ़ें, संघ-साहित्य पढ़ें। दूसरों के प्रोपेगेंडा के आधार पर संघ को नहीं समझा जा सकता। यदि आप उत्कृष्ट तरीके से, निःस्वार्थ बुद्धि और ईमानदारी से देशहित में कोई काम करते हैं, तो संघ मानता है कि आप संघ का ही काम कर रहे हैं”।

कार्यक्रम में मातृशक्ति जागरण का संकल्प व्यक्त किया गया। इस अवसर पर सौराष्ट्र प्रांत के संघचालक मुकेशभाई मलकाण सहित अन्य वरिष्ठ कार्यकर्ता उपस्थित रहे।

राजकोट, 19 जनवरी।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने आज राजकोट के सेवा भारती भवन में सौराष्ट्र-कच्छ की युवा प्रतिभाओं के साथ संवाद किया। सरसंघचालक जी ने कहा कि “जब युवा विभिन्न क्षेत्रों में देश के लिए कार्य करते हैं, तब उनके मन में ‘देश क्या है’ इसकी स्पष्ट कल्पना होनी चाहिए। अतीत में इस स्पष्ट विचार के अभाव या इसके धुंधला पड़ने के कारण ही देश गुलाम बना था। हमारा देश चैतन्यमय है, हम इसे भारत माता कहते हैं; यह केवल भूमि का एक टुकड़ा नहीं है। इसका विभाजन नहीं हो सकता, यह भावना से जुड़ा है”।

संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार द्वारा संघ स्थापना से पूर्व किए मंथन का उल्लेख करते हुए संघ की स्थापना की पृष्ठभूमि स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि संघ संपूर्ण हिन्दू समाज को संगठित करने के लक्ष्य के साथ कार्यरत है।

उन्होंने कहा, “जैसे ब्रिटेन में ब्रिटिश और अमेरिका में अमेरिकन रहते हैं, वैसे ही हिन्दुस्तान में रहने वाले ‘हिन्दू’ हैं। भारत और हिन्दुस्तान अलग नहीं, एक ही हैं। भारत एक स्वभाव है और हिन्दू भी एक स्वभाव है। मिल-जुलकर, साथ मिलकर एकता के साथ चलने का स्वभाव ही ‘हिन्दू’ है”।

उन्होंने कहा कि हमारी भावना ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की रही है। सनातन, भारतीय, इंडिक, आर्य और हिन्दू – ये सभी समान नाम हैं, लेकिन ‘हिन्दू’ शब्द सरल है और आसानी से समझ में आता है।

आज देश में हिन्दू समाज को आत्म-विस्मृत (अपनी पहचान भुलाने) करने के लिए चल रहे षड्यंत्रों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि हिन्दू आदिकाल से, परंपरा से इस भूमि पर रह रहे हैं और देश को शक्तिशाली व विकसित बनाने की जिम्मेदारी पूरे समाज की है। इसलिए, संपूर्ण हिन्दू समाज को एकजुट कर, गुणवत्ता का निर्माण कर और विश्व कल्याण के लिए देश को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से संघ निरंतर कार्य कर रहा है।

उन्होंने कहा कि संघ शाखा के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण, श्रेष्ठ और निष्ठावान स्वयंसेवक तैयार करता है। ऐसे स्वयंसेवक समर्पण भाव से समाज के विभिन्न क्षेत्रों में सेवा कार्य करते हैं। लेकिन इसके अलावा भी संघ का कार्य है। केवल उन्हें देखकर संघ के कार्य का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। संघ को समझने के लिए संघ में ही आना होगा। देश का भाग्य बदलने के लिए पूरे समाज की सक्रियता आवश्यक है और समाज में आचरण का परिवर्तन भी जरूरी है। चूंकि सभी लोग शाखा में नहीं आ सकते, इसे ध्यान में रखते हुए संघ ने ‘पंच परिवर्तन’ का विचार प्रस्तुत किया है — सामाजिक समरसता; कुटुंब प्रबोधन; पर्यावरण: पानी बचाएं, प्लास्टिक हटाएं, पेड़ लगाएं; स्व-बोध और स्वदेशी; नागरिक कर्तव्य, इन पांच क्षेत्रों में कोई भी नागरिक छोटे-बड़े कार्य करके देशहित में योगदान दे सकता है।

कार्यक्रम के अंत में युवाओं ने संघ और देशहित से संबंधित प्रश्न पूछे। सरसंघचालक जी ने विभिन्न उदाहरणों के साथ युवाओं की जिज्ञासाओं का समाधान किया। एक प्रश्न के उत्तर में कहा कि “संघ को जानना है तो विकिपीडिया न पढ़ें, संघ-साहित्य पढ़ें। दूसरों के प्रोपेगेंडा के आधार पर संघ को नहीं समझा जा सकता। यदि आप उत्कृष्ट तरीके से, निःस्वार्थ बुद्धि और ईमानदारी से देशहित में कोई काम करते हैं, तो संघ मानता है कि आप संघ का ही काम कर रहे हैं”।

कार्यक्रम में मातृशक्ति जागरण का संकल्प व्यक्त किया गया। इस अवसर पर सौराष्ट्र प्रांत के संघचालक मुकेशभाई मलकाण सहित अन्य वरिष्ठ कार्यकर्ता उपस्थित रहे।