• अनुवाद करें: |
मुख्य समाचार

विकसित भारत की कल्पना में हमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, सभी के विकास के लिए विद्यार्थी तैयार करना है - दत्तात्रेय होसबाले जी

  • Share:

  • facebook
  • twitter
  • whatsapp

मुंबई

“विकसित भारत हेतु शिक्षा” पर आयोजित संगोष्ठी में शिक्षा, उद्योग एवं समाज के समन्वय पर हुआ मंथन

नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) में शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास एवं मुंबई विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में विकसित भारत हेतु शिक्षा विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी ने कहा कि ज्ञान, कौशल और चरित्र तीनों का समन्वय शिक्षा है। विकसित भारत की कल्पना में हमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, सभी के विकास के लिए विद्यार्थी तैयार करना है।

उन्होंने कहा कि आज जिन संस्थाओं ने प्रस्तुतियां दी हैं, वे समाज और शिक्षण संस्था के समन्वय का अच्छा उदाहरण हैं। आज संवादहीनता हो गई है, संवाद को हमें पुनः स्थापित करना है। हमने जो सीखा है, जैसे सीखा है, वैसे आज की पीढ़ी को नहीं सिखा सकते, उनके अनुसार हमें पद्धति निर्माण करनी होगी। राधाकृष्ण आयोग की रिपोर्ट के अंत में लिखा गया है कि हम एक फैक्ट्री नहीं बना रहे, हम एक सभ्यता बना रहे हैं, इसलिए अपने देश की सभ्यता के नाते हमें मानव और उससे जुड़े सभी पहलुओं पर कार्य करने की आवश्यकता है। विकसित भारत 2047 एक पड़ाव है, उसके बाद यात्रा रुक जाएगी, ऐसा नहीं है। हर नीति काल विशेष के लिए होती है, हमें अपने मूल को नहीं छोड़ना है तथा आवश्यकता अनुसार उसमें बदलाव करना है।


उन्होंने कहा कि विकसित भारत का निर्माण केवल आर्थिक समृद्धि से नहीं, बल्कि संस्कारित, चरित्रवान, आत्मविश्वासी और उत्तरदायी नागरिकों के निर्माण से होगा। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक विज्ञान के समन्वय पर आधारित शिक्षा व्यवस्था को समय की आवश्यकता बताते हुए शिक्षा, उद्योग, शासन और समाज के सभी घटकों से विकसित भारत-2047 के राष्ट्रीय संकल्प की सिद्धि के लिए मिलकर कार्य करने का आह्वान किया।

संगोष्ठी में देशभर के शिक्षाविदों, उद्योग जगत के प्रतिनिधियों, नीति-निर्माताओं, विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलपतियों, तकनीकी संस्थानों के निदेशकों, राज्यों के शिक्षा एवं कौशल विकास मंत्रियों तथा सामाजिक क्षेत्र के प्रबुद्धजनों ने सहभागिता कर विकसित भारत-2047 के निर्माण में शिक्षा की भूमिका पर व्यापक विचार-विमर्श किया।

कार्यक्रम का शुभारंभ माँ सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन कर किया गया। स्वागत उद्बोधन डॉ. पंकज मित्तल, अध्यक्ष शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास ने दिया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 भारतीय शिक्षा को वैश्विक नेतृत्व प्रदान करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है और उसके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए सभी हितधारकों की सहभागिता आवश्यक है।

गत वर्ष केरल के कोच्चि में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी के सान्निध्य में आयोजित ज्ञानसभा में देशभर के लगभग 500 प्रमुख शिक्षाविदों ने “विकसित भारत हेतु शिक्षा” विषय पर मंथन किया था। उसके पश्चात महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, दिल्ली सहित विभिन्न राज्यों में ज्ञानसभाओं का आयोजन हुआ। उसी श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए शिक्षा जगत के साथ-साथ उद्योग एवं आर्थिक क्षेत्र के नेतृत्व को एक मंच पर लाकर संवाद का आयोजन किया गया।

संगोष्ठी की प्रस्तावना में न्यास के राष्ट्रीय सचिव डॉ. अतुल कोठारी ने कहा कि विकसित भारत का लक्ष्य केवल आर्थिक प्रगति तक सीमित नहीं है, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा, नैतिक मूल्यों, पर्यावरणीय चेतना, नागरिक कर्तव्यबोध तथा कौशल आधारित शिक्षा के समन्वय से ही यह लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है। विकास के मायने केवल भौतिक संसाधन नहीं, आध्यात्मिक तथा चारित्रिक मूल्य भी महत्वपूर्ण है। सरकार और समाज एक गाड़ी के दो पहियों के समान हैं, दोनों को मिलकर ही कार्य करने की आवश्यकता है।


संगोष्ठी के प्रथम सत्र में विकसित भारत की दिशा में उल्लेखनीय कार्य कर रहे देश के चयनित संस्थानों ने अपने नवाचारों एवं कार्यों का प्रस्तुतीकरण किया। सत्र की अध्यक्षता नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के एमडी एवं सीईओ आशीष चौहान ने की।

द्वितीय सत्र में “विकसित भारत @2047 : शिक्षा, अनुसंधान, उद्योग एवं सामाजिक क्षेत्र की भूमिका” विषय पर विस्तृत चर्चा हुई। चर्चा में शिक्षा, अनुसंधान, उद्योग और समाज के समन्वित प्रयासों को विकसित भारत के लिए अनिवार्य बताया गया।

समापन उद्बोधन में सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी ने कहा कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ते हुए आधुनिक विज्ञान, नवाचार, अनुसंधान और कौशल विकास के साथ आगे बढ़ना होगा। शिक्षा, उद्योग, शासन और समाज के समन्वित प्रयास ही विकसित भारत-2047 के राष्ट्रीय संकल्प को साकार कर सकते हैं।


राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ। इसमें देशभर से लगभग 100 विशिष्ट आमंत्रित प्रतिनिधियों ने सहभागिता की और विकसित भारत के निर्माण में शिक्षा की भूमिका को लेकर अनेक सुझाव एवं संकल्प प्रस्तुत किए।